भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 479

सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४१३


ततो विप्रान्नृपान् वैश्यान् समाहूय रघूत्तमः ।
या यस्य दुहिता नारी या यस्य पुत्रपुत्रिका ॥ ९९ ॥
तस्मै तस्मै ददौ तां तामेवं सर्वा व्यसर्जयत् ।
वस्त्रालङ्कारभूषाद्यैः शोभयित्वा पृथक् पृथक् ॥ १०० ॥
ते विप्राद्याः पुनर्जाता मेनिरे निजबालिकाः ।
सतः स्वं स्वं पुरं नीत्वा भृशं वैश्याः प्रमोदिताः ॥ १०१ ॥
नृपपुत्रैर्विप्रपुत्रैस्तासां चक्रुः सुमङ्गलम् । रामप्रसादात्ताः प्रापुः पतिमग्र्यसुखं स्त्रियः ॥ १०२ ॥
ताश्चापि द्विजपुत्र्यस्तु पितृगेहमेव सर्वसु ।
निन्युः स्त्रीयायुषं तत्र व्रतचर्यादिभिः सुखम् ॥ १०३ ॥
विवाहकालानतिक्रमणात्न ता उद्वहिता द्विजैः ।
जन्मान्तरेण ता सर्वाः कृष्णः पत्नीः करिष्यति ॥ १०४ ॥
अथ रामः सुबाहोश्च पुत्रस्य मथुरां पुरीम् । विवाहार्थं सीतया स पौरांजनपदैर्ययौ । १०५॥
तत्र वैवाहिकं कर्म मपाद्य रघुनन्दनः । तस्थौ तत्र द्विपन्कालं मथुरायां यथासुखम् ॥ १०६॥
एकदा जानकीवाक्यात्कालिन्द्याः सङ्गमे शुभे । निशायां हेमपर्यङ्के सुखं सुष्वाप राघवः ॥ १०७॥
एतस्मिन्नन्तरे दासीर्दासान् दृष्ट्वा विनिद्रितान् ।
स्त्रीरूपेणाथ कालिंदी समांघ्रि संस्पृशच्छनैः ॥ १०८ ॥
ततो रामः प्रबुद्धाऽभूददर्श पुरतः स्थिताम् ।
सूर्यस्य तनयां पुण्यां कालिंदी कंजलोचनाम् ॥ १०९॥
दिव्यालङ्कारवस्त्राढ्यां दिव्यगन्धसुगन्धिताम् । नीलोत्पलदलश्यामां हेमकुंभपयोधराम् ॥ ११०॥
स्मिताननां सुरूपांरु किंकिणीजालमालिकाम् ।
केयूरकुंडलाढ्यां तां प्रोन्नत्तस्तनां वराम् ॥ १११॥

सैनिकोंको साथ लेकर अपने शिविरको लौट आये । इस प्रकार सात दिन वनमें रहते हुए अनेक तरहके सुखोंका उपभोग करके राम अपनी अयोध्यापुरीको लौट पड़े ॥ ९३ ॥ ९८ ॥ इसके अनन्तर दुन्दुभी द्वारा हरण की हुई उन कन्याओंको जो जिसकी पुत्री थी, उन-उन राजाओं, ब्राह्मणों तथा वैश्योंको बुलाकर दे दी और उन बालिकाओंको वस्त्राभूषणादिसे अलंकृत करके विदा कर दिया ॥ ९९ । १०० ॥ वे ब्राह्मणादिक अपनी कन्याओंका पुनर्जन्म मानकर रामके आज्ञानुसार अपन-अपन घरोंको ले गये और नृपों तथा वैश्योंने अच्छे वरोंके साथ उनका विवाह कर दिया । रामचन्द्रजीकी कृपासे उन सबको पतिके साथ विहार करनेका सुख प्राप्त हुआ ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ उनमेंसे जो ब्राह्मणों की कन्यायें थी, वे विवाहकाल व्यतीत हो जानेके कारण विवाह न करके यूं ही पिताके घरपर व्रत-उपवासादि करके अपना जीवन यापन करने लगीं । क्योंकि उनको यह विश्वास हो गया था कि दूसरे जन्ममें स्वयं श्रीकृष्णचन्द्रजी मेरे पति होंगे ॥ १०३ ॥ १०४ ॥ कुछ दिनों बाद सुबाहुका विवाह करनेके लिये रामचन्द्रजी सीताके साथ मथुरापुरी गये ॥ १०५ ॥ वहाँपर विवाहका सारा कार्य सम्पादन करके कुछ दिन मथुरामें ही रहे ॥ १०६ ॥ एक दिन सीताके कहनेसे रामचन्द्रजी यमुनाके तटपर सोये । उस समय वहाँके सब दासों और दासियोंको निद्रित देखकर एक स्त्रीका रूप धारण किये यमुना स्वयं रामके पास गयी और जोरसे उनका पैर पकड़ा ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ उसके ऐसा करनेपर रामचन्द्रजी जाग गये और सामने सूर्यकी पुत्री तथा कमलके समान नेत्रोंवाली कालिन्दीको देखा ॥ १०९ ॥ उस समय उसके शरीरमें दिव्य वस्त्राभूषण पडे थे । पैरोंमें सुन्दर नूपुर छनछना रहे थे । नील कमलकी पंखुड़ियोंके समान उसका रङ्ग था और सुवर्णकलशके समान उसके स्तन थे ॥ ११० ॥ मुस्कुराता हुआ मुख