भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 811 में से

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४६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

ददर्श सुमहच्छ्रेष्ठं स्पटंयततपां पतिम्। घनपादपमध्यस्थं सुतीर्थसलिलं शुभम् ॥८५॥ विशालं विकचाम्भोजमधुमत्तध्रुवद्रुतम् पद्मनीरत्नसंयुक्तं छन्नं मरकतैरिव ॥८६॥ स्वच्छन्दपुच्छलन्मत्स्यं स्वच्छं मानुषमना यथा। चलज्जलचराद्भिन्नवीचिराजिविराजितम् ॥८७॥ अन्तर्ग्राहगणक्रूरं खलानाभिव मानमम् कचिच्छेवालदुद्गम्यं कृपणस्येव मर्ददम् ॥८८॥ नानाविहङ्गसङ्घार्ति शमयन्तं दिवाऽनिशम्। उदारमिव सर्वस्वैरापन्नार्तिहरं महत् ॥८९॥ तपयंतं हिमाम्भोभिः क्षापदन्स्यनितनिभ्रं । दृष्ट्वं सवमनाथं हिमांशुमिव चाह्निकम् ॥९०। तं दृष्ट्वाऽभूत्सुसन्तुष्टः सीतया रघुनन्दनः । तत्र स्नात्वा सुखं रामः कृतपाध्याह्निकक्रियः ॥९१॥ भुक्त्वा बन्धुजनैः सर्वैराखेटाणसंवृतः। उवास सरसस्तीरे रम्या मकतपनकथाः ॥९२। सतः शरासनं बाणं कृत्वा रात्रीं स्थितान्नरीं । व्याधाः संधानपास्थाय रुरुधुः ककुमो पयः ।९३॥ एवं स्थितेषु वीरेषु वने विस्तार्य वागुराः। निद्रार्थ निर्गतं यूथं शूकराणां सरस्तटे ॥९४॥ चरित्वा सागसीकंदान् पपात व्याधमण्डले गत्वा विद्धास्तदाऽक्रीडा व्याधैश्च बहवो हताः ॥९५॥ क्षणेनैव वराहास्ते विद्धाः पेतुर्महीतले। तान्हत्वा तुमुलं नादं चक्रुर्वाधाः मुदान्विताः । ९६। धावन्तोऽपि मुदा तत्र मिलिता यत्र भूपतिः। तान्प्रदाय महैर्भूपः सेनानाथं ययौ पुनः ॥९७॥ एवं सप्तादिनान्येव स्थित्वा रामो वने सुखम्। भुक्त्वा नानाविधान् भोगान् सीतया सपुरा ययौ ।९८॥

गहराईसे समुद्रको मात कर रहा था, उसके आसपास घना वृक्षावली लगी हुई थी, स्थान-स्थानपर घाट बने हुए थे और पवित्र जल भरा था ॥८४॥ ८५॥ उसकी लम्बाई चौड़ाई का पार नहीं था खिले हुए कमलके फूलोंपर भौंर गुञ्जार रहे थे, फैले हुए पुरइनके बड़े बड़े पत्ते मरकतके समान सुन्दर लग रहे थे ॥८६॥ सज्जन प्राणीके मनकी तरह स्वच्छन्दतापूर्वक मछलियाँ खेल रही थीं। जलचर प्राणीगणके इधर-उधर चलनेके कारण बार-बार उसमें लहर उठ रही थी ॥८७॥ खल मनुष्यके हृदयके समान उसमें कितने ही घड़ियाल भरे थे। कहीं-कहीं कंजूस प्राणीके धनकी तरह सिवार भरा था, इससे उसमें प्रविष्ट होना दूभर लगता था ॥८८॥ दिनरात कितने ही पक्षी आकर अपनी थकावट दूर कर रहे थे। इससे वह सरोवर किसी ऐसे सज्जनके समान मालूम पड़ता था जो अपना सर्वस्व लुट कर गरीब तथा विपद्ग्रस्त जनोंका रक्षण तत्पर हो ॥८९॥ अपने ठंढे जलसे वह उसी तरह वनके जीवोंकी प्यास बुझा रहा था, जैसे चन्द्रमा दिन भरके परिश्रमसे दुःखी जनोंका समस्त पीड़ा रातमें हरण लिया करता है ॥९०॥ उस सरोवरको देखकर सीता तथा रामचन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। उसमें स्नान किया, मध्याह्न कालका नित्यनियम किया और भोजन किया। फिर सारे शिकारियोंके साथ लेकर उसी तड़ागके समीप डेरा डाल दिया और अनेक तरहकी कहानियाँ कहते-कहते समय काटने लगे ॥९१॥९२॥ जब रात्रिका समय हुआ तो बहेलियेगण अनेक सामान लेकर चारों ओरसे उस तड़ागको घेर लिया और रामचन्द्रजी अपना धनुष बाण ठीक करके एक वृक्षके ऊपर जा बैठे ॥९३॥ जब कि व्याध जाल बिछाकर तत्परताके साथ सरोवरके चारों तरफ बैठ गये और ठीक मध्या रातका समय हुआ, तब वनसे शूकरों-का एक यूथ आ पहुँचा ॥९४॥ तालाबमें उत्पन्न कन्द खाकर वह शूकरयूथ बहेलियोंके ऊपर टूट पड़ा। उस समय बहुतसे शूकरोंको रामचन्द्रजीने मार डाला और बहुतोंको बहेलियोंने समाप्त कर दिया ॥९५॥ क्षणभरमें वे सारे शूकर मार डाले गये। उनको मारनेके अनन्तर व्याधोंने प्रसन्नताका कोलाहल मचाया ॥९६॥ सब बहेलिये मारे शूकरोंको दौड़ते हुए उस स्थानपर पहुँचे जहाँ रामचन्द्रजी बैठे थे। तब राम उन सबोंको तथा

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