भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्


राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्)

त्रयोदशः सर्गः

( राम द्वारा राज्यभरमें हास्यपर प्रतिबन्ध )

श्रीरामदास उवाच

अथैकदा रमाजानिः सुहृद्भिः सदसि स्थितः । वीजितश्चामरेणैव लक्ष्मणेनातिशोभितः ॥ १ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र पौरः कश्चिद्रमार्थितः । वाराङ्गनानां नृत्यादि दृष्ट्वा हास्यं चकार सः ॥ २ ॥
तद्धास्यं राघवः श्रुत्वा सस्मार पूर्वचेष्टितम् । लङ्कायां युद्धसमये रावणस्य शिरोऽपि खात् ॥ ३ ॥
रामबाणान्स्मृतिं लब्ध्वाऽस्माभिश्चेति विहस्य च । श्रीपादं वन्दनं कर्तुं पतन्ति स्म प्रभुं पुनः ॥ ४ ॥
तेषां विकरालतां दृष्ट्वा दंतादीनां रघूत्तमः मद्भक्षुं हि पुनर्यान्ति शिरांस्येतानि खादिति । ५ ॥
रामो भीत्या पुनस्तानि खे शिरांस्त्यक्षिपच्छरैः । एकोत्तरशतान्येव वारं वारं स्वरान्वितः । ६ ॥
तदृष्ट्वा राघवः स्मृत्वा किं दशास्यस्य वै शिरः समागतं सभामध्येत्येति पार्श्वेष्वलोकयत् ॥ ७ ॥
मायाविनो राक्षसाश्च सन्त्यत्रेति विचिन्त्य च । एवं यदा यदा हास्यं स शुश्राव रघूत्तमः ॥ ८ ॥


श्रीरामदासजी बोले—एक दिन रामचन्द्रजी अपने मित्रोंके साथ सभामें बैठे थे। उस समय रामपर चँवर चल रहे थे और लक्ष्मण रामके पास बैठे हुए थे। इसलिए रामकी शोभा कईगुना अधिक दिखायी दे रही थी ॥ १ ॥ इसी समय सभाका कोई नागरिक वेश्याओंका नृत्य देखकर जोरोंके साथ हँस पड़ा ॥ २ ॥ उस हास्यको सुना तो रामको उस समयकी एक बात याद आ गयी, जब वे लङ्कामें रावणके मस्तकोंको अपने बाणोंसे काटकर आकाशमें उड़ा देते थे तो वे मस्तक यह समझकर कि रामके बाणोंसे मेरी बुद्धि ठिकाने आयी है। इस भावसे हँसते हुए ऊपरसे फिर नीचे आकर रामके चरणोंमें लोटते हुए वन्दना करने लगते थे ॥ ३ ॥ ४ ॥ उनके दाँतों आदिकी विकरालता देखकर रामको यह ख्याल होता था कि ये मस्तक मुझे खाने आ रहे हैं। इस लिए उन्हें फिर बाणों द्वारा आकाशमें उड़ा दिया करते थे। यह उपाय रामको एक दो बार नहीं पूरे एक सौ एक बार करने पड़े थे ॥ ५ ॥ ६ ॥ उसी बातको स्मरण करके रामने सोचा कि कहीं रावणके मस्तक ही तो इस सभामें आकर अट्टहास नहीं मार रहे हैं। इस भावसे उन्होंने अपने आस-पास विस्मयभरे नेत्रोंसे देखा । ७ ॥ क्योंकि उनका ख्याल था कि राक्षस मायावी होते हैं, शायद यहाँ भी आ जायें तो क्या आश्चर्य है। इस तरह राम जब कभी किसीका हास्य सुनते