श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 485, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १२] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४६९
सुमन्त्रो राघवं नत्वा सेनया तं मृगं ययौ । तावच्छश्वत्पाषाणौघैर्गन्तुं न स क्षमः ॥६०॥ ततो राघवभीत्या स शनैः सैन्येन सम्पुरः । ययौ तावन्मृगोद्भूतैः पाषाणैस्ताडितोऽपतत् ॥६१॥ सुमन्त्रं पतितं दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत् । अयोध्यायां च सर्वत्र तद्भङ्गमिवाभवत् ॥६२॥ सुमन्त्रं पतितं श्रुत्वा पुत्राभ्यां रघुनन्दनः । सैन्येन प्रेषयामास शत्रुघ्नं तं मृगं पुनः ॥६३॥ ततस्तत्कौतुकं श्रुत्वा पौरनार्यः सहस्रशः । प्रासादशिखराङ्कारूढा उच्चांड्य च व्यलोकयन् ॥६४॥ तर्जन्या दर्शयामासुः प्रोत्थ्यश्वेति ता मिथः । वामहस्तं भ्रुवोः स्थाप्य रवितीक्ष्णनिवारकम् ॥६५॥ कुञ्चितानलकाम्नेत्रपतितान् करपल्लवैः । स्त्रियो निवार्य प्रासादात्पुरुषाञ्जसम्मुखान् ॥६६॥ निद्रासंभ्रान्तनयनान्नान्योन्यं दर्शयन्मृगम् । एवं तन्नगरं सर्वं चकितं चाभवत्तदा ॥६७॥ शत्रुघ्नोऽथ पुराद्वात्रात्सैन्येन निर्गतो बहिः । तावत्तद्रथवाहाश्च संस्थिता एव ते पथि ॥६८॥ ताडिता अपि सूतेन नोत्तस्थुस्तुरगोत्तमाः । कुशस्याथ लवस्यापि रथवाहास्तथैव च ॥६९॥ ताडिता रुरुमद्देन नोत्तस्थुः पथि संस्थिताः । आश्चर्यञ्च तदद्भुतं राघवाय न्यवेदयन् ॥७०॥ रामोऽपि श्रुत्वा चकितस्तदा चिन्तैश्चिन्तयन् । विचारः करणीयाऽत्र ह्यविचारोऽद्य नोचितः ॥७१॥ अन्यत्र कारणं किञ्चि-द्रष्टव्योऽद्य पुरोहितः । जानन्नपि स्मादावः स्वयं सर्वं तथापि सः ॥७२॥ मानुषं भावमाश्रित्य पुरोहितमथाद्वयत् । सोपि समागत्याशु धेन्वां मयां प्रययौ गुरुः ॥७३॥ प्रत्युद्गम्य गुरुं रामो दद्यावासनमुत्तमम् । ततः सम्पूज्य विधिवत्सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥७४॥ तच्छ्रुत्वा राघवं प्राह वसिष्ठो मुनिसत्तमः । वाल्मीकिम्प्वद्य प्रष्टव्यो येन ते चरितं कृतम् ॥७५॥ तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा वाल्मीकिं स समाह्वयत् । सोऽपि समागत्य शीघ्रे ययौ श्रीराघवं प्रति ॥७६॥
मृस्तकके मुखकाटनेके लिए भेजा। सुमन्त रामको प्रणाम करके उसमृगकी ओर वढे। किन्तु वहांसे थोड़ी दूरपर ही थे। इतनामें पत्थरोंका वर्षा होने लगी। जिससे उस मृगके पासतक नहीं पहुँच सके ॥ ५९ ॥ ६० ॥ लेकिन रामके भयसे सुमन्त पीछे न लौटकर आगे ही बढ़ते गये और उधरसे बराबर पत्थरोंकी वृष्टि होती रही। जिससे वे घायल होकर गिर पड़े ॥ ६१ ॥ सुमन्तको गिरते देखा तो सेनामें बड़ा कोलाहल होने लगा। सारे अयोध्यानवासियोंका वह एक अनहोना-सा बात मालूम पड़ा । ६२ ॥ सुमन्तको घायल सुना तो रामने अपने दोनो पुत्रोंके साथ एक बड़ी सेना भेजी ॥ ६३ ॥ इस कौतूहलको सुना तो नगरकी बहुत-सी स्त्रियाँ अपनी-अपनी अट्टालिकाओंपर चढ़कर मस्तक ऊँचा कर उस मृगको देखने लगीं और धूपके प्रकाशका निवारण करनेके लिए अपना बायां हाथ भौंहापर रख-रखकर एक दूसरेको उसपर उँगलियोंसे वह मृग दिखाने लगीं ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ नेत्रके सामने आये हुए केशोंको हटाती हुई वे स्त्रियाँ मकानकी छतों, कंगूरों और अटारियोंपर अधिक-से-अधिक संख्यामें एकत्र हो गयीं ॥ ६६ ॥ कितनोंकी आंखें उस मृगका निहारते- निहारते नींदका भ्रममें यांझिल हो गया। इस तरह उस समय सारा नगर विस्मित हो रहा था । ६७ ॥ उधर शत्रुघ्न अपनी सेना लेकर चले । नगरसे बाहर निकले ही थे कि उनके रथवाले घोड़े रास्तेमें बैठ गये और कोचवानके बार-बार मारनेपर भी नहीं उठे यही दशा कुश और लवके भी रथको हुई । उनके घोड़े भी रास्तेमें बैठ गये और कितने ही डंडे छानपर भी नहीं उठे तो वे सब लौटकर आश्चर्यके साथ रामके पास पहुँचे और यह हाल बताया ॥ ६८-७० ॥ यह सुना तो वे मनमे विचारने लगे कि इस विषयमे पूर्णतया विचार करके काम करनेकी आवश्यकता है आज अविचारित काम नहीं फलनेका है ॥ ७१ ॥ इसमे अवश्य कोई कारण है। अतः पहल पुरोहितको बुलाकर पूछ लेना जरूरी है। यद्यपि रामचन्द्रजी सब कुछ जानते थे, फिर भी मनुष्यभावसे उन्होंने पुरोहितको बुलवाया। रामके आज्ञानुसार तुरन्त गुरुजी राजसभामे जा पहुँचे। तब राम गुरुके आगे गये और एक उत्तम आसनपर बिठाकर पूजन करनेके अनन्तर सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ७२-७४ । यह सब सुनकर गुरु वसिष्ठने कहा कि इस विषयमें आप वाल्मीकिजीसे पूछ-ताछ करें तो अच्छा होगा। क्योंकि उन्होंने ही आपके चरित्रको बनाया है ॥ ७५ ॥ गुरुके आज्ञानुसार रामने वाल्मीकि