भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 484

४५८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३

भारवाहस्य हास्यं तन् स्मृत्वा प्रहसितं मया । तद्भूतवचनं श्रुत्वा भारवाहं तदा प्रभुः ॥४३॥
दर्शनीयं सदसि तमाह रघुनन्दनः । मा भीतिं भज प्रत्यक्षं सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः ॥४४॥
हेतुं किमर्थं हसितं त्वयाऽथ कथयस्व माम् । स भारवाहकश्चकितः शुष्ककंठोष्ठतालुकः ॥४५॥
वेपमानः स्खलद्वाचा राघव वाक्यमब्रवीत् । अयोध्यायाश्च सीमायामश्वत्थस्य मयाऽद्य हि । ४६॥
दृष्ट्वा प्रहसितं राजन् हेतुं हास्यं तथा श्रुतम् मद्दूर्वा तद्विद्रं स प्रभुः श्रुत्वा मुविस्मितः । ४७॥
दूतानुवाच भोऽगच्छध्वनेनेन सह वेगतः । यूयं गत्वाऽद्य द्रष्टव्यं किं सत्यं कथ्यते न वा ॥४८॥
अनेन भारवाहेन ते तथेति त्वरान्विताः । गत्वाऽश्वत्थमथोपरि दृष्ट्वातुस्ने स्मितं मुहुः ॥४९॥
तदाश्चर्यञ्च ते दूताः प्रहसंन्तोऽतिवेगवन्तः । अश्वत्थमद्रितं सर्वं गत्वा सर्वं न्यवेदयन् ॥५०॥
तद्भूतवचनं श्रुत्वा राघवश्चातिविस्मितः । राज्ये ममैतद्दुश्चिह्नं मे शिक्षा ले मुप्तमुत्थम् ॥५१॥
इति निश्चित्य मनसि दूताँश्चाज्ञापयन्तदा । छिद्यतां चलपत्रः स ममाज्ञाभङ्गकारकः ॥५२॥
तद्रामवचनादेव शतशोऽथ सहस्रशः । कुठारपाणयः शीघ्रमप्रययु दुर्द्रुमन्तदा । ५३।
हास्यमानं नगं दृष्ट्वा ते सर्वेऽतीव विस्मिताः । कुठारैरनं तदा छेत्तुमुद्यता राघवाज्ञया ॥५४॥
ताञ्छेत्तुकामान् सकलान् ग्राव्नान् स्वनिकट विधिः । क्षित्वाऽमन्त्रान्त समापोरात्स्वेध्वनिनर्र्तैः । ५५॥
उपलैश्छिन्नभिन्नाङ्गास्ते दूता लोहिताङ्किताः । कोलाहलं प्रकुर्वन्ता रामं द्रुतं न्यवेदयन् ॥५६॥
ततोऽतिविस्मितो रामः पुनर्दूतान् सहस्रशः । प्रेषयामास तं छेत्तुं धनुर्बाणसिधारिणः ॥५७॥
तेऽपि गत्वा नगं तेन ताड़िता उपलैर्दृढम् । छिन्नाङ्गा राघवं वेगात्सर्वं वृत्तं न्यवेदयन् ॥५८।
ततो रामोऽतिमक्रुद्धः सुमंत्र सेनया युतम् । प्रेषयामास तं वृक्षं छेत्तुं बुद्धिपुरःसरम् ॥५९।

हँसी आ गयी ॥ ३९-४१ ॥ पश्चात्कि सी बात सुनकर गमन सिपाहीसे पूछा कि तुम क्यों हँसे ? उसने कहा कि एक लकड़हारेका हँसना देखकर मुझे हँसी आ गयी । दूतका बात सुनकर रामने दूतों द्वारा लकड़हारको पकड़वा मगाया और उससे कहा कि किस प्रकारका भय न करके मुझ यह बतलाओ कि तुम काम्राश्चर्य क्यों हंस थे ? ॥ ४२-४५॥ वह उस नामका बात सुनकर चौकन्ना हो गया । उसके कंठ, ओष्ठ और तालू सूख गये, थरथर कांपन लगा और भयभीत हुए स्वरसे उसन उत्तर दिया कि अयोध्याके समीप ही एक पीपलका वृक्ष है। मैने बाजार आते समय उस वृक्षकी हंसी सुना और हंस पड़ा। नगरमें आया तो यहाँ भी एकाएक वह बात याद आ गयी और चेष्टा करके भी मे हंसीको नहीं रोक सका । उसकी यह बात सुनकर मुसकराते हुए रामचन्द्रजीने दूतोंको आज्ञा दी कि तुम लोग इसके साथ जाकर देखो कि यह जो कह रहा है, वह ठीक है या नहीं ॥ ४५-४८॥ उस भारवाहकके साथ-साथ दूत चले, पीपलके समीप गये और उसकी हंसी सुनी तो स्वयं खूब हंसे और लौटकर उसका वहाँका सच्चा वृत्तांत सुना दिया ॥ ४६॥ ५० ॥ दूतों-की बात सुनकर राम बहुत विस्मित हुए और सोचने लगे कि हमारे राज्यम यह एक बड़ा दुश्चिह्न उत्पन्न होकर मेरे शासनको ही लुप्त कर देना चाहता है। इस प्रकार विचार करके रामने दूतोंको आज्ञा दी कि उस पीपलके वृक्षको काट डालो। क्योंकि यह मेरी आज्ञा भङ्ग कर रहा है ॥ ५१॥ ५२ ॥ रामके आज्ञानुसार सैकड़ों हजारो व्यक्ति कुठार ललेकर उस वृक्षकी ओर चल पड़े । उस समय भी उस वृक्षका हंसन देखकर वे सब उसे काटनेको उद्यत हो गये । उनको देखकर बहुत उस वृक्षपरसे ही पत्थरके टुकड़े फेंक फेंककर मारन लगे । इस अपकारसे कितनों ही लोगोंका गहरी चोट आयी । रुधिरसे उनका शरीर भीग गया और चिल्लाते हुए उन्होंने रामके पास पहुंचकर वहाँका हाल बतलाया । ५३-५६ ॥ सो सुनकर रामको और भी आश्चर्य हुआ और फिर हजारो दूतांका वह वृक्ष काटनेके लिए भेजा । धनुष बाण एवं तलवार धारण किये हुए वे दूत जब वृक्षके पास पहुंचे तो फिर प्रयागे पत्थर फेंक फेंककर मारा, जिससे भिन्नमस्तक हो उन सबने लौटकर रामको यह समाचार सुनाया। ५७ ॥ ५८ ॥ सब रामने कुपित होकर बहुत सी सेनाके साथ