श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
४५८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३
भारवाहस्य हास्यं तन् स्मृत्वा प्रहसितं मया । तद्भूतवचनं श्रुत्वा भारवाहं तदा प्रभुः ॥४३॥
दर्शनीयं सदसि तमाह रघुनन्दनः । मा भीतिं भज प्रत्यक्षं सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः ॥४४॥
हेतुं किमर्थं हसितं त्वयाऽथ कथयस्व माम् । स भारवाहकश्चकितः शुष्ककंठोष्ठतालुकः ॥४५॥
वेपमानः स्खलद्वाचा राघव वाक्यमब्रवीत् । अयोध्यायाश्च सीमायामश्वत्थस्य मयाऽद्य हि । ४६॥
दृष्ट्वा प्रहसितं राजन् हेतुं हास्यं तथा श्रुतम् मद्दूर्वा तद्विद्रं स प्रभुः श्रुत्वा मुविस्मितः । ४७॥
दूतानुवाच भोऽगच्छध्वनेनेन सह वेगतः । यूयं गत्वाऽद्य द्रष्टव्यं किं सत्यं कथ्यते न वा ॥४८॥
अनेन भारवाहेन ते तथेति त्वरान्विताः । गत्वाऽश्वत्थमथोपरि दृष्ट्वातुस्ने स्मितं मुहुः ॥४९॥
तदाश्चर्यञ्च ते दूताः प्रहसंन्तोऽतिवेगवन्तः । अश्वत्थमद्रितं सर्वं गत्वा सर्वं न्यवेदयन् ॥५०॥
तद्भूतवचनं श्रुत्वा राघवश्चातिविस्मितः । राज्ये ममैतद्दुश्चिह्नं मे शिक्षा ले मुप्तमुत्थम् ॥५१॥
इति निश्चित्य मनसि दूताँश्चाज्ञापयन्तदा । छिद्यतां चलपत्रः स ममाज्ञाभङ्गकारकः ॥५२॥
तद्रामवचनादेव शतशोऽथ सहस्रशः । कुठारपाणयः शीघ्रमप्रययु दुर्द्रुमन्तदा । ५३।
हास्यमानं नगं दृष्ट्वा ते सर्वेऽतीव विस्मिताः । कुठारैरनं तदा छेत्तुमुद्यता राघवाज्ञया ॥५४॥
ताञ्छेत्तुकामान् सकलान् ग्राव्नान् स्वनिकट विधिः । क्षित्वाऽमन्त्रान्त समापोरात्स्वेध्वनिनर्र्तैः । ५५॥
उपलैश्छिन्नभिन्नाङ्गास्ते दूता लोहिताङ्किताः । कोलाहलं प्रकुर्वन्ता रामं द्रुतं न्यवेदयन् ॥५६॥
ततोऽतिविस्मितो रामः पुनर्दूतान् सहस्रशः । प्रेषयामास तं छेत्तुं धनुर्बाणसिधारिणः ॥५७॥
तेऽपि गत्वा नगं तेन ताड़िता उपलैर्दृढम् । छिन्नाङ्गा राघवं वेगात्सर्वं वृत्तं न्यवेदयन् ॥५८।
ततो रामोऽतिमक्रुद्धः सुमंत्र सेनया युतम् । प्रेषयामास तं वृक्षं छेत्तुं बुद्धिपुरःसरम् ॥५९।
हँसी आ गयी ॥ ३९-४१ ॥ पश्चात्कि सी बात सुनकर गमन सिपाहीसे पूछा कि तुम क्यों हँसे ? उसने कहा कि एक लकड़हारेका हँसना देखकर मुझे हँसी आ गयी । दूतका बात सुनकर रामने दूतों द्वारा लकड़हारको पकड़वा मगाया और उससे कहा कि किस प्रकारका भय न करके मुझ यह बतलाओ कि तुम काम्राश्चर्य क्यों हंस थे ? ॥ ४२-४५॥ वह उस नामका बात सुनकर चौकन्ना हो गया । उसके कंठ, ओष्ठ और तालू सूख गये, थरथर कांपन लगा और भयभीत हुए स्वरसे उसन उत्तर दिया कि अयोध्याके समीप ही एक पीपलका वृक्ष है। मैने बाजार आते समय उस वृक्षकी हंसी सुना और हंस पड़ा। नगरमें आया तो यहाँ भी एकाएक वह बात याद आ गयी और चेष्टा करके भी मे हंसीको नहीं रोक सका । उसकी यह बात सुनकर मुसकराते हुए रामचन्द्रजीने दूतोंको आज्ञा दी कि तुम लोग इसके साथ जाकर देखो कि यह जो कह रहा है, वह ठीक है या नहीं ॥ ४५-४८॥ उस भारवाहकके साथ-साथ दूत चले, पीपलके समीप गये और उसकी हंसी सुनी तो स्वयं खूब हंसे और लौटकर उसका वहाँका सच्चा वृत्तांत सुना दिया ॥ ४६॥ ५० ॥ दूतों-की बात सुनकर राम बहुत विस्मित हुए और सोचने लगे कि हमारे राज्यम यह एक बड़ा दुश्चिह्न उत्पन्न होकर मेरे शासनको ही लुप्त कर देना चाहता है। इस प्रकार विचार करके रामने दूतोंको आज्ञा दी कि उस पीपलके वृक्षको काट डालो। क्योंकि यह मेरी आज्ञा भङ्ग कर रहा है ॥ ५१॥ ५२ ॥ रामके आज्ञानुसार सैकड़ों हजारो व्यक्ति कुठार ललेकर उस वृक्षकी ओर चल पड़े । उस समय भी उस वृक्षका हंसन देखकर वे सब उसे काटनेको उद्यत हो गये । उनको देखकर बहुत उस वृक्षपरसे ही पत्थरके टुकड़े फेंक फेंककर मारन लगे । इस अपकारसे कितनों ही लोगोंका गहरी चोट आयी । रुधिरसे उनका शरीर भीग गया और चिल्लाते हुए उन्होंने रामके पास पहुंचकर वहाँका हाल बतलाया । ५३-५६ ॥ सो सुनकर रामको और भी आश्चर्य हुआ और फिर हजारो दूतांका वह वृक्ष काटनेके लिए भेजा । धनुष बाण एवं तलवार धारण किये हुए वे दूत जब वृक्षके पास पहुंचे तो फिर प्रयागे पत्थर फेंक फेंककर मारा, जिससे भिन्नमस्तक हो उन सबने लौटकर रामको यह समाचार सुनाया। ५७ ॥ ५८ ॥ सब रामने कुपित होकर बहुत सी सेनाके साथ
सर्गः १२] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४६९
सर्गः १२] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४६९
सुमन्त्रो राघवं नत्वा सेनया तं मृगं ययौ । तावच्छश्वत्पाषाणौघैर्गन्तुं न स क्षमः ॥६०॥ ततो राघवभीत्या स शनैः सैन्येन सम्पुरः । ययौ तावन्मृगोद्भूतैः पाषाणैस्ताडितोऽपतत् ॥६१॥ सुमन्त्रं पतितं दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत् । अयोध्यायां च सर्वत्र तद्भङ्गमिवाभवत् ॥६२॥ सुमन्त्रं पतितं श्रुत्वा पुत्राभ्यां रघुनन्दनः । सैन्येन प्रेषयामास शत्रुघ्नं तं मृगं पुनः ॥६३॥ ततस्तत्कौतुकं श्रुत्वा पौरनार्यः सहस्रशः । प्रासादशिखराङ्कारूढा उच्चांड्य च व्यलोकयन् ॥६४॥ तर्जन्या दर्शयामासुः प्रोत्थ्यश्वेति ता मिथः । वामहस्तं भ्रुवोः स्थाप्य रवितीक्ष्णनिवारकम् ॥६५॥ कुञ्चितानलकाम्नेत्रपतितान् करपल्लवैः । स्त्रियो निवार्य प्रासादात्पुरुषाञ्जसम्मुखान् ॥६६॥ निद्रासंभ्रान्तनयनान्नान्योन्यं दर्शयन्मृगम् । एवं तन्नगरं सर्वं चकितं चाभवत्तदा ॥६७॥ शत्रुघ्नोऽथ पुराद्वात्रात्सैन्येन निर्गतो बहिः । तावत्तद्रथवाहाश्च संस्थिता एव ते पथि ॥६८॥ ताडिता अपि सूतेन नोत्तस्थुस्तुरगोत्तमाः । कुशस्याथ लवस्यापि रथवाहास्तथैव च ॥६९॥ ताडिता रुरुमद्देन नोत्तस्थुः पथि संस्थिताः । आश्चर्यञ्च तदद्भुतं राघवाय न्यवेदयन् ॥७०॥ रामोऽपि श्रुत्वा चकितस्तदा चिन्तैश्चिन्तयन् । विचारः करणीयाऽत्र ह्यविचारोऽद्य नोचितः ॥७१॥ अन्यत्र कारणं किञ्चि-द्रष्टव्योऽद्य पुरोहितः । जानन्नपि स्मादावः स्वयं सर्वं तथापि सः ॥७२॥ मानुषं भावमाश्रित्य पुरोहितमथाद्वयत् । सोपि समागत्याशु धेन्वां मयां प्रययौ गुरुः ॥७३॥ प्रत्युद्गम्य गुरुं रामो दद्यावासनमुत्तमम् । ततः सम्पूज्य विधिवत्सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥७४॥ तच्छ्रुत्वा राघवं प्राह वसिष्ठो मुनिसत्तमः । वाल्मीकिम्प्वद्य प्रष्टव्यो येन ते चरितं कृतम् ॥७५॥ तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा वाल्मीकिं स समाह्वयत् । सोऽपि समागत्य शीघ्रे ययौ श्रीराघवं प्रति ॥७६॥
मृस्तकके मुखकाटनेके लिए भेजा। सुमन्त रामको प्रणाम करके उसमृगकी ओर वढे। किन्तु वहांसे थोड़ी दूरपर ही थे। इतनामें पत्थरोंका वर्षा होने लगी। जिससे उस मृगके पासतक नहीं पहुँच सके ॥ ५९ ॥ ६० ॥ लेकिन रामके भयसे सुमन्त पीछे न लौटकर आगे ही बढ़ते गये और उधरसे बराबर पत्थरोंकी वृष्टि होती रही। जिससे वे घायल होकर गिर पड़े ॥ ६१ ॥ सुमन्तको गिरते देखा तो सेनामें बड़ा कोलाहल होने लगा। सारे अयोध्यानवासियोंका वह एक अनहोना-सा बात मालूम पड़ा । ६२ ॥ सुमन्तको घायल सुना तो रामने अपने दोनो पुत्रोंके साथ एक बड़ी सेना भेजी ॥ ६३ ॥ इस कौतूहलको सुना तो नगरकी बहुत-सी स्त्रियाँ अपनी-अपनी अट्टालिकाओंपर चढ़कर मस्तक ऊँचा कर उस मृगको देखने लगीं और धूपके प्रकाशका निवारण करनेके लिए अपना बायां हाथ भौंहापर रख-रखकर एक दूसरेको उसपर उँगलियोंसे वह मृग दिखाने लगीं ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ नेत्रके सामने आये हुए केशोंको हटाती हुई वे स्त्रियाँ मकानकी छतों, कंगूरों और अटारियोंपर अधिक-से-अधिक संख्यामें एकत्र हो गयीं ॥ ६६ ॥ कितनोंकी आंखें उस मृगका निहारते- निहारते नींदका भ्रममें यांझिल हो गया। इस तरह उस समय सारा नगर विस्मित हो रहा था । ६७ ॥ उधर शत्रुघ्न अपनी सेना लेकर चले । नगरसे बाहर निकले ही थे कि उनके रथवाले घोड़े रास्तेमें बैठ गये और कोचवानके बार-बार मारनेपर भी नहीं उठे यही दशा कुश और लवके भी रथको हुई । उनके घोड़े भी रास्तेमें बैठ गये और कितने ही डंडे छानपर भी नहीं उठे तो वे सब लौटकर आश्चर्यके साथ रामके पास पहुँचे और यह हाल बताया ॥ ६८-७० ॥ यह सुना तो वे मनमे विचारने लगे कि इस विषयमे पूर्णतया विचार करके काम करनेकी आवश्यकता है आज अविचारित काम नहीं फलनेका है ॥ ७१ ॥ इसमे अवश्य कोई कारण है। अतः पहल पुरोहितको बुलाकर पूछ लेना जरूरी है। यद्यपि रामचन्द्रजी सब कुछ जानते थे, फिर भी मनुष्यभावसे उन्होंने पुरोहितको बुलवाया। रामके आज्ञानुसार तुरन्त गुरुजी राजसभामे जा पहुँचे। तब राम गुरुके आगे गये और एक उत्तम आसनपर बिठाकर पूजन करनेके अनन्तर सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ७२-७४ । यह सब सुनकर गुरु वसिष्ठने कहा कि इस विषयमें आप वाल्मीकिजीसे पूछ-ताछ करें तो अच्छा होगा। क्योंकि उन्होंने ही आपके चरित्रको बनाया है ॥ ७५ ॥ गुरुके आज्ञानुसार रामने वाल्मीकि
४७० आनन्दरामायणे [सर्गः १३
प्रत्युद्गम्य मुनिं रामो ददावासनमुत्तमम् । नत्वा सम्पूज्य विधिवत् सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥७७॥ ततो विहस्य वाल्मीकिः प्रोवाच रघुनन्दनम् । सर्वं वेत्सि भवान् राम किमर्थं मां तु पृच्छसि ॥७८॥ स्वचेत्पृच्छसि रामात्र मानुष्यं भावमाश्रितः । तर्हि ते कथयाम्यद्य शृणुष्व रघुनन्दन ॥७९॥ त्वयाऽत्र वर्जितं हास्यं त्वद्विद्या मर्कलर्जनैः हास्यकारीणि कर्माणि संत्यक्तान्यवनीतले ॥८०॥ विवाहादिसमुत्साहाः कथावार्त्तादिकौतुकम् । मङ्गलोन्माहगीतानि नृत्यं यज्ञादिसंक्रियाः ॥८१॥ यात्राः संस्तम्भरोन्माहास्त्यक्ताः पञ्चशतानि तु यद्यत्कर्म तोषकारि हास्यकारि च तन्नरैः ॥८२॥ एकसंवत्सरं नात्र क्रियते रघुनन्दन उन्माहदेवताः मत्तास्तथा कर्माङ्गदेवताः ॥८३॥ इन्द्रादिलोकपालाश्च दृष्ट्वा स्वांप प्ररोजनम् । तुम भूप्रां ततो गम तद्रूपं कथयन्विधिम् ॥८४॥ ततो विधिश्च तच्छ्रुत्त्वादसमर्थस्त्वायं निवेदितुम् । मयि कुटेशमामन्त्र्य योऽश्वत्थे सप्रवेशितः ॥८५॥ हितार्थं निर्जगाणां स सोऽद्य तिष्ठति पिप्पल त्राजकर्तृपद्रवान् राम छन्प्रुकमजु वशामनान् ॥८६॥ तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवः क्रोधमाययौ । अहमेवाद्य गच्छामि भारं पश्यामि ब्रह्मणः ॥८७॥ कथं नाम रघुश्रेष्ठः स्वशिक्षां परिवर्त्तयेत् । इत्युक्त्वाज्ञापयामास स्वांयां सेनां तदा प्रभुः ॥८८॥ ततस्तं बोधयामास वाल्मीकिर्मुनिसत्तमः । क्रोधं त्यज रघुश्रेष्ठ शृणुष्व वचनं मम । सच्चिदानन्दसम्पन्नस्त्वमानन्दघनो नृप ॥८९॥ भवाऽस्ति चरितं राम तव किञ्चित्पुत्रयोर्मुखात् । त्वयाऽपि यज्ञसमये श्रुतं यल्ललटे पुरा ॥९०॥ यस्य संश्रवणाद्ब्रह्मानन्दरूपी भवेन्नरः । हास्यं वस्त्वेति चेत्त्वाह ते च्छास्तं त्त्रिदम् ॥९१॥ न जनाः कीर्त्तयिष्यन्ति मुखरूपं स्मितं विना । अन्यत् किंचित् प्रवक्ष्यामि प्रभो ब्रूश तवग्रतः ॥९२॥ शतकोटिमितं तेऽत्र चरितं यन्मया कृतम् । पुरा त्वया विविक्तं यत् सर्वमे रघुनन्दन ॥९३॥
का बुलवाया । यह सन्देश पाते ही वाल्मीकि रामके मिलनक चल दए ॥ ७६ ॥ तहाँ पहुंचतहीर रामन उठ- कर उनका अगवानी की और एक सुन्दर आसनपर बिठाकर पूजन किय । फिर जो कुछ वृत्तान्त बताना था, सो बताया ॥ ७७ ॥ यह सब सुना तो हंसकर वाल्मीकिने कहा- हे राम ! आपसे कुछ छिपा नहीं है, आप सब जानते हैं । फिर हमसे क्यों पूछते हैं ? ॥ ७८ । हाँ यदि मानवभावका आश्रय लेकर आप हमसे पूछते हैं तो बताता हूँ, सुनिए ॥ ७९ । आपने अपने राज्यमें हंसीको मनाही कर दी है। इससे सब लोगोंने ऐसे शुभ कार्योंका करना बन्द कर दिया है, जो हंसी-खुशीसे ही सम्पन्न होसकते हैं ॥ ८० । विवाह, कथावार्ता, खेल-तमाशे, नाच-गान, यज्ञादिक सत्क्रियाएं, यात्रा और सांवत्सरिक उत्सव आदि सब कामलोगोंने बन्द कर दिये हैं। कहनेका मतलब यह कि जितने कार्य हृदयको आनन्दित करनेवाले हैं, वे सब आज एक वर्षसे बन्द हैं । इससे व्याकुल होकर समस्त उत्साहदेवता, कर्माङ्गदेवता तथा इन्द्रादि लोकपाल भूमण्डलपर अपनी प्रजाको दुःखी होते देख ब्रह्माके पास गये और उन्हें अपना दुःख सुनाया ॥ ८१-८४ ॥ इसके बाद ब्रह्माजी आपसे कुछ कहने-सुननेमें असमर्थ होकर उस पीपल-वृक्षमें गुप्त रूपसे प्रविष्ट हो गये हैं। देवताओंकी कल्याण-कामनासे वे आज भी उसमें बैठे हुए हैं । जो कोई उस वृक्षको काटनेके लिये जाता है, वे उसपर पत्थर बरसाते हैं ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ मुनिराज वाल्मीकिके मुखसे यह हाल सुनकर रामको क्रोध आ गया और उन्होंने कहा कि आज मैं स्वयं जाकर ब्रह्माका पराक्रम देखता हूँ । रघुवंशका एक श्रेष्ठ क्षत्रिय अपने आदेशमें किसी प्रकार का उलट- फेर नहीं कर सकता। इतना कहकर रामने अपनी सेना तैयार करनेकी आज्ञा दी ॥ ८७ । ८८ । तब वाल्मीकि समझाने लगे—हे रघुश्रेष्ठ ! इस प्रकार क्रोध न करके मेरी बात सुनिये। आप साक्षात् सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म हैं और आपका चरित्र लोगोंको आनन्दित करनेवाला है। उस दिन ही बनाकर आपके पुत्रोंके मुखसे यज्ञशालामें सुनवाया था, उसे आपने भी सुना है। जिस जिसके सुनने मात्रसे मनुष्य आनन्दमग्न हो जाता है, ऐसे पुनीत चरित्रको लोग यदि आपने हंसीका नियम रक्खेंगे तो नहीं सुन सकेंगे। क्योंकि कथा सुनकर आनन्दको प्राप्त लोग हंसे बिना नहीं रह सकेंगे। इसके सिवाय हे प्रभो ! मुझे आपसे कुछ और भी कहना
सर्गः १३ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१
सर्गः १३ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१
भागाद्राङ्कतवर्णान्स्तद्वाग्रथाथाणान् प्रभो । सारं सारं प्रगृह्याथ यद्यद्रम्यं मनोरमम् ॥ ९४ ॥
कथानकं तेन तेन व्यासेन मुनिनाऽत्र हि । अष्टादश पुराणानि तथोपपुराणानि च ॥ ९५ ॥
कृतान्यन्येऽपि मुनयः षट्शास्त्रादीन्यनेकशः । अग्रे सर्वं करिष्यन्ति सारं रम्यं प्रगृह्य च ॥ ९६ ॥
ततोऽत्र श्लोकरूपं च यन्मया हरके वने । चतुर्दशवत्सरैश्च कैकेयीदुष्टभावतः ॥ ९७ ॥
कृतं चरित्रं सीताया विरहादि च गद्यत । तत्र किञ्चित्क्षेपभूतं हि चतुर्विंशत्सहस्रकम् ॥ ९८ ॥
तावन्मात्रं वदिष्यन्ति यद्वाल्मीकेः कृतं स्थिति । तन्मत्रं सकलं ज्ञात्वा भावि वृत्तं रघूत्तम ॥ ९९ ॥
श्लोकसङ्ख्यायोगश्च पूर्वमेव मयेरितः । युद्ध प्रयाने भातस्य श्लोकश्चैवोपरागके ॥ १०० ॥
रतिनिशायां श्रोतव्याऽऽनन्दरामायणं सदा । युद्धं ज्ञेयं भारतं हि रतिर्भागवतं स्मृतम् ॥ १०१ ॥
शेषभूतं चतुर्विंशत्सहस्रं शोक उच्यते । तव भाविबरेणैतदानन्दचरितं तव ॥ १०२ ॥
शतकोटिमितं पूर्वं यन्मयैव विनिर्मितम् । नवकाण्डमितं रम्यं षयुद्रादशसहस्रकम् ॥ १०३ ॥
नवोत्ताशतं सर्वं क्वचिन् स्थास्यति भूतले । तव भाविदरान्नाय न कोऽप्येनां मनोरमाम् ॥ १०४ ॥
अष्टोत्तरशतैः सर्गैर्निर्मितां मेरुणाऽन्विताम् । तव कीर्तनमालां नो खण्डयिष्यति भूतले ॥ १०५ ॥
नवकाण्डयुतं रम्यं दृष्टा स्तरणहेतवे । एतद्धि स्थापयिष्यति यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ १०६ ॥
यदा तत् खण्डितं पूर्वं व्यासेन मुनिना तत्र । शतकोटिमितं रामचरितं यन्मया कृतम् ॥ १०७ ॥
तदा किञ्चिद्धितं दृष्ट्वाहं तूष्णीमेव संस्थितः । भविष्यति कलौ मन्दमतयोऽल्पायुषो नराः ॥ १०८ ॥
न समर्था मम ग्रन्थं विमलं श्रोतुं कदापि हि । अतो व्यासेन मुनिना मत्कार्यं यत्पृथक् कृतम् १०९
सन्तस्याभिन्यहं मत्वा परां तृप्ति गतः प्रभो । अनस्त्वं प्रार्थयाम्यद्य नवकाण्डमितं त्विदम् ॥ ११० ॥
जानन्दरामचरितं न विरूपय राघव । वर्जयिष्यामि खेट्ठाख्यं तदा दुःखमय प्रभो ॥ १११ ॥
है। मैंने जो सौ करोड़ श्लोकोंमें आपके चरित्रका वर्णन किया है, उसे हे रघुनन्दन ! आप कुछ समय पहले कई भागोंम बाँट चुके हैं। ८२-६३ ॥ उनमेंसे जो भाग भारतवर्षके लिये चुना था, उसके सार अंशको लेकर जो कथानक अच्छे थे, सुननेमात्रसे समझमें आ जाते वा कानोंको प्रिय लगते थे, उन्हींके आधारपर व्यासदेवने अष्टादश पुराणों तथा उपपुराणोंको बना दिया है। इनके अतिरिक्त भी बहुतसे ऋषि उन्हींकी सहायतासे षट्शास्त्र आदि कितने ही शास्त्र बनायेंगे ॥ ९४-९६ ॥ कुछ ही समय बीतनेके बाद कैकेयीकी दुष्टतासे आपको चौदह वर्ष पर्यन्त जो दुःख झेलने पड़े थे, सीताके विरह आदिका दुःख जो चौबीस हजार श्लोकोंसे कुछ कम है, उतने ही चरित्रकी नींव मुझ वाल्मीकिका बनाया हुआ मानेंगे। इस भावी स्थितिको समझकर ही मैने आपके उतने श्लोकमय चरित्रको विशेष उत्साहके साथ लिखा है। सब लोगोंको चाहिये कि सबेरे युद्ध-चरित्र तथा दोपहरके बाद शोक-चरित्रका श्रवण करें युद्धचरित्रका मतलब महाभारत, रति-चरित्रका श्रीमद्भागवत तथा बाकी चौबीस हजार श्लोकोंका मतलब शोकचरित्र माना गया है। आपके भावी वरदानके प्रभावसे आपका यह आनन्दरामायण, सौ करोड़ श्लोकोंवाला मेरा बनाया रामचरित्र, नौ काण्डोंवाला द्वादश सहस्रात्मक रामचरित्र एवं एक सौ नौ श्लोकोंवाली रामायण ये सब पृथ्वीतलमें कही न कही रहेंगे ही। आपके भावी वरदानसे एक सुन्दर कीर्तनमाला, जिसमें १०८ सर्ग हैं, सुमेरुकी मनकासदृश अग्यसे लगी है, इसका कोई भी खण्डन नहीं कर सकेगा। इस नौ काण्डोंवाले चरित्रको लोग आपकी प्रसन्नताके लिए तबतक सम्हालेंगे, जब तक कि संसारमें सूर्य-चन्द्र विद्यमान रहेंगे ॥ ९७-१०६ ॥ मेरे बनाये सौ करोड़ श्लोकोंवाले रामचरित्रका खण्डन करके जब व्यासजीने १८ पुराण बनाये थे, तब उससे किसी प्रकारका कल्याण देखकर ही मैं चुप रह गया था। उस समय मेरे विचारमे आया कि आगे चलकर कलियुगमें लोग मन्दबुद्धि तथा अल्पायु होंगे। इस कारण वे मेरे इतने बड़े ग्रन्थको कभी नहीं सुन सकेंगे। व्यासजीने मेरे काव्यसे कथायें अलग करके जो पुराणोंको बनाया, सो बहुत अच्छा किया। इससे
४७२ आनन्दरामायणे [सर्गः १३
भविष्यति सुखवृद्धि र्चेतसाऽपि प्रमोदनम् । अभाने कथयन्त्येव येन ते शिक्षितं भुवि ॥११२॥ भविष्यति मृषा नैव येन दृष्टास्तु देवताः । भविष्यंति जनाश्चापि मम्यन्मत्कविता भवेत् ॥११३॥ जना हसंतु सर्वत्र दृष्टानां दशनं विना । आत्मवान्कश्चाद्य वस्त्रेण रुद्धा कौतुकदर्शनात् ॥११४॥ हास्यं लक्ष्मीसूचकं हि हसितं मंगलप्रदायकम् । धावन्यं हसितं चैतद्धस्यात्कृष्टं न किंचन ॥११५॥ नारी स्मितवदना यस्मिन्गेहे तन्मन्दिरं स्मृतम् । लक्ष्मीरूपाऽवस्थिताऽने तत्र निश्चय रघुनन्दन ॥११६॥ स एव पुरुषो धन्यो यस्य स्यान्न स्मिताननम् । स एव पुरुषो निन्द्यो यस्यास्यं क्रोधसंयुतम् । ११७॥ प्रमदा निन्दिता सापि यस्याः क्रोधयुतं मुखम् । गर्हयन्त्यत्रहास्यं हि सर्वदा ते मुनीश्वराः ॥११८॥ अतस्त्वां प्रार्थयाम्येतन्मानय त्वं वचो मम । न करोमि विधिर्गर्वं त्वां तातं वेद्मि राघव । ११९॥ जानयिष्यामि शरणं त्वाहं चतुराननम् । एवं वाल्मीकिरचनमंगीकृत्य रघूत्तमः ॥१२०॥ एवमस्त्विति तं प्राह मुनिं तष्ठ हसन्निव । तद्रामवचनं श्रुत्वा वाल्मीकिस्तुष्टमानसः ॥१२१॥ शिष्यं संप्रेष्य ब्रह्माद्यमानायामास पिप्पलात् । अश्वाः सर्वे समुत्तस्थुर्ययुस्ते नगरीं प्रति ॥१२२.। ययौ सैन्येन शत्रुघ्नो रामपार्श्वे स्थितोऽभवत् । रामपुत्रौ ययायातौ पितुरग्रे निषेद्तुः ॥१२३॥ रामाज्ञया मारवाहन्तो दन्त्यैर्मज्जनः । कुवेरेण सुधावृष्टिः सुमन्त्राद्याः सुजीविताः ॥१२४ । सुमन्त्राद्या राज्ञाऽऽत्मरक्षणं राघव ययुः । नत्वा रामं सुमंत्रः स रामपार्श्वे स्थितोऽभवत् । १२५॥ दृष्टः सुरैर्यावदिंद्रः प्राप्तं प्रणम्य स, गर्वं गत्वाऽब्रवीद्ब्रह्मा मया त्वदपराधितम् १२६॥ तत्क्षमस्व रघुश्रेष्ठ स्वस्वाभ्याः सर्वदा वयम् । पुराऽस्माकं हितार्थे हि त्वया रामावतीर्णते ॥१२७॥
मुझे बड़ी प्रसन्नता है, अर्थात् आज आप से प्रार्थना करता हूँ कि इस मेरे करवाएने आनन्दरामायणकी शोभा न बिगाड़िए, यदि आप इसके लिए न हँसा सजा तक तब तो बड़ा अनर्थ होगा। मेरी रामायण किसी कामकी नहीं रह जायगी इसीलिए मैं आपस कहता हूँ कि कोई ऐसा उपाय कीजिए, जिससे आपके आदेशकी विगा प्रज्ञाका कन्तर न घट और हनता तथा मनुषा की प्रसन्न रहे और मेरी कवित्व भी सन्द हो जाय १०७-११३ । लोग हँस सहा किन्तु उनके दाँतन दिखायी द। किसी कौतुकको देखकर यदि लोगोंको हँसा आ जाय तो कपडस मुंह रोक्कर हंसें ॥ ११४ ॥ क्योंकि हंसी लक्ष्मीमूलक है, हँसी सबको मुख देनेवाली वस्तु है और हंसी मंगलमयी मानी गयी है। कहनेका भाव यह कि हँसीसे बढ़कर कोई बात ही हीं नहीं ।। ११५ ।। जिस घरमे मुस्काती हुई नारी रहना है, वह घर देवालयके समान पवित्र होता है और लक्ष्मी वहाँपर ही निवास करती है। हे रघुनन्दन ! इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं है ॥ ११६ ॥ वही पुरुष धन्य है, जिसका मुखमण्डल सदा हसता हुआ दीखे और बही पुरुष अधम है, जिसका मुख सदा कोषमे युत्त रहे ॥ ११७॥ वह स्त्री भी निन्द्य है, जो सदा क्रोधयुक्त मुँह बनाये रहती है। बडे-बड़े मुनिगण आदि हास्यको सदासे निन्दा करते आय हैं ११८ ॥ बसअत मैं बापस प्रार्थना करता हूँ कि मेरी यह बात मान लीजिए बह्म किसी तरह अभिमान न करके आपको अपने पिताके समान मानते हैं । ११९ ॥ मैं स्वय जाकर ब्रह्माको आपका लज्जाब करूंगा वे आपसे क्षमा मांगेंगे । रामने वाल्मीकिके वाक्यगौरवको समझकर उनकी बात मान ली और कहा कि जैसा आप कहते हैं, वैसा ही होगा। रामकी स्वीकृति सुनकर वाल्मीकि परम प्रसन्न हुए और अपना एक शिष्य भेजकर उस पीपलपरसे ब्रह्माजीको बुलवाया । यह हो जानेपर शत्रुघ्न तथा लव-कुशके जो घोडे अबतक रास्तेमें बँधे थे, वे उठ खड़े हुए और अयोध्याको वापस चल दिये । शत्रुघ्न और लव-कुश भी अपनी सेना लिये हुए आये और रामके पास आकर बैठ गये ॥ १२०-१२३॥ रामकी आज्ञासे उन्होंने अस्त्रहारोंको छोड़ दिया । इन्द्रने आकर अमृतकी वर्षा की, जिससे सुमन्त्रादि जो योद्धा मूर्च्छित पड़े थे, वे सचेत हो गये ।। १२४ ।। इसके अनन्तर युद्धको छांटनेके लिए गद्दे हुए लोग रामके पास आये। सुमन्त्र रायके पास आकर बैठ गये। थोडी देर बाद देवताओंके साथ-साथ इन्द्र और ब्रह्मा भी रामकी सभामें आये और बैठ गये । रामको प्रणाम
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४७३
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४७३
अवताराश्च बहवो धृता नो रिपवो हताः। शंखासुरो वेदहर्ता मत्स्यरूपेण दारितः ॥१२८॥ तथाऽस्माकं सुधां दातुं मज्जंतं मंदराचलम् । दृष्ट्वा स कूर्मरूपेण त्वया पृष्ठे धृतो गिरिः ॥१२९॥ मत्पृथ्वीति स्पर्द्धमानं हिरण्याक्षं निहत्य च। त्वया वाराहरूपेण जलात्पृथ्वी समुद्धृता ॥१३०॥ प्रह्लादवचनात्स्तम्भादाविर्भूय त्वया पुरा। नरसिंहस्वरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥१३१॥ हृत्वा राज्यं हृतं दृष्ट्वा पुरा तु मघवतस्त्वया। बलिर्वामनरूपेण पाताले विनिवेशितः ॥१३२॥ नृपैरधर्मनिरतैरदृष्टा ध्यार्त्ता सुभृं पुरा। त्वयैकविंशद्वारं हि जामदग्न्यस्वरूपिणा ॥१३३॥ पितृवैरं पुरस्कृत्य निःक्षत्रो पृथिवी कृता। दशास्यकुम्भकर्णौ तौ रामरूपेण राक्षसौ ॥१३४॥ पत्नीवैरं पुरस्कृत्य त्वया दृष्टौ हताविह। उद्धारितौ तौ स्वगणौ द्विवारं देवशापतः ॥१३५॥ एकवारं पुनस्त्वग्रे त्वं तावेवोद्धरिष्यसि । तच्छ्रुत्वावचनं श्रुत्वा वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥१३६॥ सर्वं जानन्नपि ज्ञानान्मां प्रप्रच्छ तं विधिम् ॥१३७॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्धे रामहस्त्यप्रतिरोघो नाम त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥
चतुर्दशः सर्गः
( शंखचूड़िकी जन्मगाथा तथा बहुतेरे मंत्रोंका निरूपण )
श्रीरामदास उवाच
कौ गणौ देवशप्तौ तौ कथमद्धारितौ वद। पुरा द्विवारं रामेणाग्रे कथं वोद्धरिष्यति ॥१॥ तद्वसिष्ठवचः श्रुत्वा विधिः प्राह विहस्य तम्। सर्वं वेत्सि भवान् लोकान् ज्ञापितुं मां हि पृच्छसि ॥२॥ तदा वदाम्यहं सर्वं गणयोः शापकारणम्। एकदाऽथ महाविष्णुर्वैकुण्ठे रमया रहः ॥३॥ संस्थितश्च तदा द्वारि विष्णुं द्रष्टुं सुचेतसौ। तापसाश्विनीकुमारौ हि समाजग्मतुरुदगतौ ॥४॥
करनेके पश्चात् ब्रह्माने कहा—मैंने जो कुछ अपराध किया है, सो क्षमा करें । हे रघुकुलश्रेष्ठ ! आपका कर्त्तव्य है कि आप हमारी रक्षा करें। पहले भी आपने हमारी रक्षा करनेके लिए पृथ्वीतलपर कितने ही अवतार लेकर हमारे शत्रुओंको मारा है। वेदोंको चुरानेवाले शंखासुरको आपने मत्स्यका रूप धारण करके मारा था ॥१२८-१२९॥ हम सबोंको अमृत पिलानेकी इच्छासे, समुद्रमन्थनके समय जब मन्दराचल डूबा जा रहा था, तब कूर्मरूप धारण करके उसे अपनी पीठपर रखा था। "यह पृथ्वी मेरी है" इस प्रकार कहकर डींग मारनेवाले हिरण्याक्षको मारकर आपने वाराहरूप धारण करके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार किया ॥ १३० ॥ १३० ॥ प्रह्लादके वचनसे आप खम्भेसे प्रकट हुए और हिरण्यकशिपुका संहार किया। जब दैत्योंते इन्द्रसे राज्य छीन लिया था, तब आपने वामनरूप धारण करके भीख माँगी और बलिको पाताल लोक भेज दिया ॥१३१ १३२॥ जब इस पृथ्वीमण्डलमे पापी राजाओंका अत्याचार देखा तो परशुरामका रूप धारण करके पितृवैरके व्याजसे पृथ्वीको क्षत्रियविहीन कर दिया । रावण और कुम्भकर्णको आपने पत्नीवैरके बहाने यमपुर पहुँचाया। दो बार आपने देवताओंके शापसे अपने गणोंकी रक्षा की है और भविष्यमे फिर एक बार उनका उद्धार करेंगे। ब्रह्माकी बातको सुनकर सब कुछ जानते हुए भी वसिष्ठने ब्रह्माजीसे पूछा—॥ १३३-१३७ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्वित राज्यकांडे उत्तराद्धे त्रयोदशः सर्गः ॥१३॥
वसिष्ठजी कहने लगे—वे दोनों कौनसे गण थे, जिनको देवताओंका शाप प्राप्त हुआ था और रामने उनका उद्धार किया था और फिर भी उद्धार करेंगे, सो कहिए ॥ १॥ इस प्रकार वसिष्ठकी बातसुनकर ब्रह्माने हँसकर कहा—आप सब कुछ जानते हैं, किन्तु मुझे ज्ञान प्राप्त करानेके लिए मुझसे पूछ रहे हैं तो मैं भी उन गणोंके शापका कारण बतलाता हूँ। एक समय महाविष्णु एकान्तमें
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समागती देववैद्यौ तौ दृष्ट्वा द्वारगतौ । जयविजयात्मानौ तयोरग्रे बभूवतुः ॥ ६ ॥
ताभ्यां वैदौ तदा प्रोक्तौ विष्णुस्तिष्ठति वै रहः । नायं कालो दर्शनस्य तच्छ्रुत्वा प्रोचतुः सुरौ ॥ ६ ॥
अधुना द्रष्टुमिच्छामो विष्णुं कथयतां नरौ । तयोर्द्वियोगमनं युवां शृणुतं चेरितम् ॥ ७ ॥
इत्योर्वचनं श्रुत्वा तौ पुनः प्रोचतुर्गणौ । नगच्छावो महाविष्णुमस्मल्लक्ष्म्या रहःस्थितम् ॥ ८ ॥
एवं त्रिवारं ताभ्यां तौ प्रोक्तौ नैच्छतुर्गणौ । तदाऽश्विनीकुमारौ तौ प्रोचतुः क्रोधमूर्च्छितौ ॥ ९ ॥
आव्योर्वारणनं नैव युवाभ्यां हि श्रुतं गणौ । यतस्त्रिवारं तस्मात्तु युवां जन्मत्रयं भुवि ॥ १० ॥
कथयद्य न संदेहस्तच्छ्रुत्वा ह्यवरं तयोः । अथावति तयोः शापं ददतुर्देववैद्ययोः ॥ ११ ॥
विनापराधतः शापो यस्माद्दत्तस्तु चारयोः । एकवारं युवां क्वापि जन्मप्राप्स्यथु वै भुवि ॥ १२ ॥
एवं परस्परं शापं रुद्ध्वा हाहेति चक्रतुः । सदा कोलाहलश्चासीद्वाह्वायाम तान् हरिः ॥ १३ ॥
तद्वृत्तगसकलं श्रुतं प्रोचुस्ते जगदीश्वरम् । पश्चात्ते महताविष्णुं प्रार्थयामशुरादरात् ॥ १४ ॥
येन शीघ्रं विमुक्तिः स्यात्तन्नो वद महेश्वर ! ततः प्रोवाच तान् विष्णुर्मुक्तिः शीघ्रं शुभाऽत्र हि ॥ १५ ॥
मयि भक्त्या विरोधिन्या जायते नात्र संशयः । समञ्जस्यादरेणैव मद्भक्त्या जायते गतिः ॥ १६ ॥
युष्माकं रोचते या सा भक्तिः कार्याऽवनीतले । तद्विष्णोर्वचनं श्रुत्वा ते प्रोचुर्जगदीश्वरम् । १७ ॥
नोऽस्तु भक्त्या विरोघिन्या शीघ्रं नो दर्शनं पुनः । तथेत्युक्त्वा रमानाधस्तान् सर्वान् म व्यसर्जयत् १८ ॥
ते जन्मानि ततः प्रापुर्ब्रह्मर्ष्या सुनिनन्दनः । जयो जातो हिरण्याक्षो हिरण्यकशिपुस्तथा ॥ १९ ॥
बातोऽत्र विजयः पूर्वं तौ हतौ विष्णुना भुग । वाराहरूपिणाऽनेन हिरण्याक्षो विदारितः ॥ २० ॥
नरसिंहरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः । ततः पुनर्जन्म तौ हि द्वितीयं प्रत्यतुर्भुवि ॥ २१ ॥
लक्ष्मीके साथ बैठे थे। उसी समय उनके दर्शनार्थ अश्विनीकुमार वहाँ जा पहुँचे ॥ १-४ ॥ तब देववैद्योंको देखकर जय-विजय नामक दोनों द्वारपाल उनके सामने पहुँच और कहने लगे-इस समय भगवान् एकान्तमें हैं। अतएव आप लोग दर्शन नहीं कर सकेंगे। यह सुनकर वे दोनों देवता बोले-विष्णुभगवान्से जाकर कह दो कि हम अभी इसी समय आपका दर्शन करना चाहते हैं। देवताओ की बात सुनकर जय-विजयने कहा कि हम अभी उनके पास नहीं जायेंगे। वे लक्ष्मीके साथ एकान्तमें बैठे हैं ॥ ५-८ ॥ इस तरह तीन बार अश्विनीकुमारोंके कहनेपर भी जब जय-विजयने उनकी बात नहीं मानी तब क्रुद्ध होकर उन्होंने शाप देते हुए कहा कि तीन बार तुम लोगोंने मेरी बातका उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हें तीन बार पृथ्वीलोकमें जन्म लेना पड़ेगा । उनके इस शापको सुनकर जय विजयने भी अश्विनीकुमारोंको शाप देते हुए कहा कि बिना अपराध तुमने हमको शाप दिया है। इसलिए तुम दोनोंको एक बार पृथ्वीतलपर जन्म लेना पड़ेगा ॥ ९-१२॥ इस प्रकार आपसमें शाप पाकर वे चारों हाहाकार करके पछताने लगे और वैकुण्ठधाममें कोलाहल मच गया तब विष्णुभगवान्ने उनको अपने पास बुलाया ॥ १३ ॥ भगवान्ने उनका वृत्तान्त सुना। इसके अनन्तर आदरपूर्वक उन चारोंने भगवान्से प्रार्थना की - ॥ १४ ॥ हे महेश्वर ! जिससे हमलोग शीघ्र इस शापसे मुक्त हो जायें, इस बात वहीं उपाय बतलाइये । विष्णुभगवान्ने उन्हें समझाते हुए कहा कि घबड़ाओ नहीं, शीघ्र ही तुम लोग शापसे मुक्त हो जाओगे, किन्तु उपाय दो हैं। एक यह कि तुमलोग हमारी भक्तिसे विरोधभाव रक्खो। दूसरे उपायमें हमारी भक्ति करके मुक्ति पानेका विचार करो। यदि मेरी भक्तिमें विरुद्ध रहोगे तो शीघ्र मुक्ति मिल जायगी और भक्ति के साथ चाहोगे तो बहुत बार जन्म लेना पड़ेगा। इन दोनोंमेंसे जो उपाय अच्छा जंचे उसे चुन लो। इस प्रकार विष्णुकी बात सुनकर उन लागोंने उत्तर दिया कि हम आपकी भक्तिमें विरुद्ध भाव रक्खेंगे, जिससे शीघ्र मुक्ति हो जाय। भगवान्ने भी "अच्छा वैसा ही हो" यह कहकर उन लोगोंको विदा कर दिया ॥ १५-१८ ॥ तदनन्तर वे लोग मृत्युलोकमें आकर जन्मे। उनमें जय हिरण्याक्ष नामका तथा विजय हिरण्यकशिपु राक्षस होकर जन्मा। इसके अनन्तर वाराहरूप धारण करके विष्णुभगवान्ने हिरण्याक्षको मारा और नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका संहार किया ॥ १९ ॥ २० ॥ दूसरे जन्ममें
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७५
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७५
जयो जातो रावणोऽथ कुम्भकर्णस्तदापरः । जातो विजयनामा हि रामेनानेन तौ हतौ ॥२२॥ तावश्विनीसुतौ हि एक ऐरावण स्मृतः । मैरावणश्च त्वपरं पत्र तौ जनितावभौ ॥२३॥ पाताले वरदानाच्च रामहस्तान्मृतिं गतौ । अग्रे जयः शिशुपालो भविष्यति न संशयः ॥२४॥ विजयो दन्तवक्त्रश्च भविष्यत्यर्द्धनातले । द्वापरे कृष्णरूपेण शिशुपालं हरिः स्वयम् ॥२५॥ भविष्यति दन्तवक्त्रं तथैव मुनिसत्तम । एवं जन्मत्रय शापाद्भुक्त्वा तौ भगवद्गणौ ॥२६॥ जयविजयनामानौ पूर्ववत् स्यास्यतः सुधी । कृतदेशेऽथ वै विष्णोर्वैकुण्ठे दुःखवर्जिते ॥२७॥ तावश्विनौ देववैद्यौ पूर्ववदिति तौ स्थितौ । एवं मुने त्वया पृष्टं तन्मया परिकीर्तितम् ॥२८॥ भगवद्गणयोः शापकारणं च पुरातनम् । एव राघव चाग्रे त्वं द्वापरे वरमे शुभे ॥२९॥ जरासंधादिवीरैश्च कंसार्थैरपि भूतले । क्षिप्रं दृष्ट्वाऽत्रावतीर्य कृष्णरूपेण लीलया ॥३०॥ सर्वान्हत्वा तोषयुक्तं करिष्यसि महीतलम् । तान् बौद्धांबुदरूपेण कलावग्रे विजेष्यसि ॥३१॥ वर्णसंकरमाक्ष्य कलेरन्ते रघूत्तम । कल्किरूपेण सकलान्संहारष्यसि लीलया ॥३२॥ एवं दशावताराश्च तथान्येऽपि सहस्रशः । त्वया हितार्थमस्माकं धृताश्चाग्रे धरिष्यसि ॥३३॥
श्रीरामदास उवाच
एवं स्तुवन् ब्रह्माथ समालिङ्गय रघूत्तमः । मन्निदेश्यामने प्राह स्वदर्थं च मुनेर्गिरा ॥३४॥ हास्यमाशास्ति किं येऽनाः कुर्वतु ते सुखम् यथा वाल्मीकिना प्रोक्तं तथा चा रिस्तथास्तु वं ॥३५॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा महा हृष्टाः सुरोदयाः । प्रपच्छ च वाल्मीकिं सभायां रघुनन्दनः ॥३६॥ ममावतारतः पूर्वं त्वया मच्चरितं कृतम् । कथं ज्ञातं त्वया पूर्वं केन त्वामुपदेशितम् ॥३७॥ पूर्वजन्मनि कस्त्वं हि किं पुण्यं हि त्वया कृतम् । तन्मवं विस्तरेणैव कथयस्वाद्य मां प्रति ॥३८॥
'वे दोनों रावण और कुम्भकर्ण होकर जन्म और भगवानने रामका रूप धारण करके उन्हें मारा ॥ २१ ॥ २२ ॥ दोनों अश्विनीकुमारोंमेंसे एक ऐरावण एवं दूसरा मैरावणके रूपसे धरतीपर आया और पाताललोकमें रामके हाथों उन दोनोंकी मृत्यु हुई । अगले जन्ममें जय शिशुपाल तथा विजय दन्तवक्त्रके नामसे जन्मेगा । द्वापरमें भगवान् कृष्णरूपमें उन दोनोंका संहार करेंगे । इस तरह आपसके शाप भोगके वे लोग तीन जन्ममें अपनी करनीका फल भोगकर फिर पहलेकी तरह जय विजयके नामसे भगवान्के द्वारपाल हो जायेंगे, तब उन्हें फिर कोई क्लेश नहीं होगा ॥ २३-२७ ॥ तबसे अश्विनीकुमार भी आनन्दके साथ स्वर्गलोकमें निवास करेंगे । हे मुनिराज ! आपने हमसे जो कुछ पूछा, वह मैंने बतलाया। इसका सारांश यह निकला कि उन दोनों भगवद्गणोंके लिए एक प्राचीन शाप कारण था। उसमें कोई नयी बात नहीं थी। हे राघव ! आगे द्वापर युगमें भी पृथ्वी जब कंस तथा जरासंध आदि दुष्टोंके अत्याचारोंसे घबड़ा जायगी, तब आप कृष्ण अवतार लेकर दुष्टोंका संहार करते हुए पृथ्वीका भार उतारेंगे। उसी प्रकार कलियुगमें बुद्धका रूप धारण करके आप बौद्धोंको पराजित करेंगे ॥ २८-३१ ॥ हे रघूत्तम कलियुगके अन्तमें जब समस्त संसार वर्णसंकर हो जायगा, तब आप कल्किरूप धारण करके सबका संहार करेंगे। इस तरह दस क्या, हजारो अवतार आपने हम लोगोंके कल्याणके लिये लिये हैं और भविष्यमें भी लेंगे ॥ ३२ ॥ ३३॥ श्रीरामदास बोले—इस तरह स्तुति करते हुए ब्रह्माको राघवन हृदयसे लगा लिया और अपनी बगलमें बिठाकर कहा कि वाल्मीकिके कथनानुसार मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम्हारे सुखके लिये लोग हँसें या जो कुछ करें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। वाल्मीकिने जो कहा है, उसके अनुसार मेरी प्रजाके लोग काम करेंगे ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ रामकी इस बातको सुनकर जितने देवत थे, वे सब प्रसन्न हो गये । इसके पश्चात् रामने वाल्मीकिसे कहा कि मेरे अवतारसे पहले ही आपने मेरा चरित्र रामायण बना डाला है । सो भविष्यकी बात आपको कैसे मालूम हुई ? उन्हें किसने बतायी थी ? । ३६ ॥ ३७ ॥ पूर्वजन्ममें आप कौन थे और आपने कौनसे पुण्यकार्य किये थे, सो मुझसे कहिए। इस प्रकार रामके प्रश्न
४७१ आनन्दरामायणे [ सर्गः १४
तद्रामवचनं श्रुत्वा वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः । सभायां राघवार्थं सर्वं वक्तुं समुपचक्रमे ॥३९॥
वाल्मीकिरुवाच
सम्यक्पृष्टं त्वया राम सावधानमनाः शृणु । राम स्वनाममहिमा वर्ण्यते केन वा कथम् ॥४०॥
यत्प्रभावादहं राम ब्रह्मर्षित्वमवाप्तवान् । शृणु राघव मत्सत्यं कथां मे पूर्वजन्मनः ॥४१॥
पंपातीरे द्विजः कश्चिच्छंखो नाम महायशाः । गुरोः सिद्धिं गमश्चागाद्नदीं गोदावरीं प्रति ॥४२॥
तीर्त्वा भीमरथीं पुण्यां कान्तारे कंटकाविले । निर्जले विजने घोरे वैशाखे तापकंपितः ॥४३॥
शनै चोपाविशन्मार्गे मध्याह्नसमये द्विजः । तदा कश्चिद्दुराचारी व्याधश्चापशरः शठः ॥४४॥
निर्दयः सर्वभूतेषु कालांतक इवापरः । तं कुण्डलधरं विप्रं दीक्षितं भास्करोपमम् ॥४५॥
खङ्गेन भीषयित्वा तु जग्राह कुंडलादिकम् उपानहौ तच्छत्रं च वस्त्राणि च कमण्डलुम् ॥
पश्चाद्व्याधश्च तं विप्रं गच्छेत्याह स मूढधीः ॥४६॥
तथा स मूल्छन्पथि शर्कराविले सूर्यशुतप्ते अनवर्जिते खरे ।
संतप्तपादस्तृणगोपिते स्थले क्वचित्क्व वस्त्रोपरि संस्थितोऽभवत् ॥४७॥
स वै द्रुतं तापतप्तोऽपि विप्रन्दाहेति वादी प्रजगाम विप्रः ।
दृष्ट्वा मुनिं तं बहुविह्वलन्तन्प मध्यं गते पूष्णि यदाऽतितीव्रे ॥४८॥
व्याधस्य जाता मतिरीदृशी वै तस्मै ददामीति च पादरक्षे ।
चौर्येन धर्मम् तु तस्करो न वने गृहीव सकल चतन्मे ॥४९॥
चौर्येण च स्वधर्मेण यद्गृहीतं वनान्तरे । तदीयमेव तन्मत्वं व्याधानां धर्मनिर्णयः ।५०।
तस्मादुपानहौ दास्ये मुहुर्दुःखापनुत्तये । तेन श्रेयो भवेद्यच्च तद्द्वन्मेऽस्तु पापिनः ॥५१॥
जीर्णे नोपानहावेतौ ह्रस्वौ स्तश्च पदोर्मम । न चाभ्यामस्ति मे कार्यं तस्मात्तस्मै ददाम्यहम् ॥५२॥
करनेपर वाल्मीकिजीने बतलाना प्रारम्भ किया । उन्होंने कहा—आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सावधान चित्त होकर सुनिये । हे राम ! आपके नामकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है, जिसके प्रभावसे आज मै ब्रह्मर्षिपदपर बैठा हूँ । अच्छा, पहले अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त ही बतलाता हूँ । पम्पा सरोवरके पास कोई एक महान् यशस्वी शङ्ख नामका ब्राह्मण रहता था। उसने गुरुके पाससे सिद्धि प्राप्त की और कुछ दिनों बाद गोदावरी नदीपर गया । उसे पार करके भीमरथी नदी पार किया और एक ऐसे निर्जन वनमें पहुंचा, जहाँ जलतक मिलना कठिन था । वह वैशाखका महीना था । मारे गर्मीके उसका जी बेचैन था । दोपहरके समय थककर वह उसी वनमे बैठ गया । उसी समय धनुष-बाण लिये एक दुष्ट व्याध उसके पास आ पहुंचा । ३९-४४ । वह दूसरे यमराजके समान भयानक और निर्दयी था। उसने उस सूर्यके समान तेजस्वी ब्राह्मणको तलवारसे भयभीत करके उसके कुण्डलादि आभूषण, जूते, छतरी, वस्त्र तथा कमण्डलु आदि छीन लिये । इसके बाद उसने "जाओ" कहकर छोड़ दिया ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ बेचारा ब्राह्मण कङ्कड़-पत्थर तथा सूर्यके तापसे जलती हुई बालुकाव्याप्त मार्गसे चलने लगा । जब उसके पैर ज्यादा जलने लगते तो किसी तृण आदिवर पैर ठंडा करके आगे बढ़ता था । चलते-चलते जब पैर बहुत जलने लगे तो वह कपड़ा बिछाकर एक स्थानपर बैठ गया ॥ ४७ ॥ थोड़ी देर बाद उठकर उस कड़ाकेकी धूपमें पैरके जलनेसे हाहाकार करता हुआ वह फिर आगे बढ़ा । उस ब्राह्मणको जलती दुपहरीमें इस तरह दुःखित देखकर व्याधके मनमें आया कि मैने इसकी सारी वस्तुएँ तो छीन ली हैं। न हो, इसे इसके जूते लौटा दूँ । इसकी सब चीजें छीनकर मैंने अपने धर्मका पालन किया ही है। हे राम ! वनमें आने जानेवाले पथिकोंके सामान छीन लेना, उन लोगोंके धर्ममें सम्मिलित है। उस चौरने सोचा कि इसके जूते इसे दे डालूँ तो इसका क्लेश दूर हो जायगा और उससे जो पुण्य होगा, सो मुझे
सर्गः १९ ] स्कन्दपुराणम् (उत्तरार्द्धम्) ४७७
इति निश्चित्य मनसि तूर्णं गत्वा ददौ च तौ । घर्मेण तप्तं तं दृष्ट्वा व्रजन्तं पथि संकटे ॥ ५३ ॥
उपानहौ गृहीत्वासौ निर्वृतिं च परां ययौ । मुदा प्रहर्षितो भूत्वा विप्रः शम्भुः पुनरब्रवीत् ॥ ५४ ॥
पूर्वपुण्येन ते जाता शुभा बुद्धिरनन्तर, यया दत्ते त्वया वैशाखे पादत्राणे दुरत्यये ॥ ५५ ॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा विप्रं व्याधोऽथ सोऽब्रवीत् । किं मयाऽऽचरितं पूर्वं पुण्यं तन्मे वद प्रभो ॥ ५६ ॥
आतपो बाधते घोरो नात्र छाया न वै जलम् । तस्मात्स्थान्तरं गत्वा यत्र छायाम्बु वर्तते ॥ ५७ ॥
तत्र गत्वा जलं पीत्वा सुखछायामाश्रित्य च । ततो मे सुकृतं पूर्वं सविस्तारं वदाम्यहम् ॥ ५८ ॥
इत्युक्तो मुनिना तेन व्याधः प्राह कृताञ्जलिः । इतोऽविदूरे सलिलं वर्तते च सरोवरे ॥ ५९ ॥
कपित्थास्तत्र वै सन्ति फलभारैश्च पीडिताः । गच्छामस्तत्र संतुष्टिर्भविता नात्र संशयः ॥ ६० ॥
व्याधेनैव समादिष्टस्तेन साकं ययौ मुनिः । कियद्दूरं ततो गत्वा ददर्शाश्चर्यं सरोवरम् ॥ ६१ ॥
स्नात्वा मध्याह्नवेलायां तस्मिन्सरसि निर्मले । आचम्योपस्पृश्याथ कृत्वा माध्याह्निकीः क्रियाः ॥ ६२ ॥
देवपूजां तथा कृत्वा फलमूलमनोरमैः । व्याधेनोपनीतं सुस्वादु कपित्थं भक्षयारि च ॥ ६३ ॥
भुक्त्वोः सुखं जलं पीत्वा सुच्छायां च समाश्रितः । सुखोपविष्टस्तं प्राह पूर्वपुण्यं वदामि ते ॥ ६४ ॥
शाकले नगरे पूर्वं द्विजन्मा वेदपारगः । स्तम्भो नाम महापापी तथा श्रावस्तगोत्रजः ॥ ६५ ॥
तवेष्टा गणिका काचिन्नाम्ना नीचगणेशिका । त्यक्तनित्यक्रियो नित्यं शूद्रवन्मूर्त्तितोऽप्यभूत् ॥ ६६ ॥
शून्याचारस्य मूढस्य पाखण्डस्याप्रियस्य च । ब्राह्मणी ते तदाऽऽचार्याऽऽया शोभनमयी तथा ॥ ६७ ॥
सा त्वां पर्यचरत्सुभ्रूः समेवञ्च प्रातजाधवम् । अन्योन्यं क्षालयन्ती च पादौ स्वांप्रयकाङ्क्षया ॥ ६८ ॥
उभयोरप्यधः शौचे उभयोर्वचने रता । ईक्षया बाधमाणाऽपि दिनकार्ये द्वयोः स्थिता ॥ ६९ ॥
पापीके पासमें अच्छा ही होगा ॥४८-५२॥ जूतोंकी पद्धत और छोटी है। इसलिए मेरे पैरमें न आयेंगे। सब इसे दे ही डालूँ। इस प्रकार निश्चय करके दौड़ता हुआ उस धूप तथा कण्ठियोंके झमेले दुःखी ब्राह्मणके पास पहुंचा और उसने वह जूता दे दिया ॥५३-५५॥ जूता मिलनेपर उसे बड़ा आनन्द मिला और ब्राह्मणने कहा-तुम सुखी होओ। हे वनचर ! तुम्हारे किस पुण्यसे तुम्हारी ऐसी बुद्धि हुई है। जिससे तुमने वैशाख महीनेमें इस जूतेका दान दिया है ॥५४॥ ५५ । इस प्रकार ब्राह्मणकी बात सुनकर व्याधने कहा कि पूर्वजन्ममें मैंने कौनसा पुण्य किया था। महाराज विस्तारपूर्वक मुझे बतलाइये ॥५६॥ ब्राह्मणने कहा कि इस समय मुझे घाम ज्यादा लग रहा है। इस जंगलमें न तो पानी है न छाया ही है। इसलिए किसी एक स्थान-पर चलो, जहाँ कि छाया और पानी मिल सके। सुखी होनेपर तुम्हें तुम्हारे पूर्वजन्मका वृत्तांत सुनाऊँगा ॥५७॥५८॥ इस प्रकार ब्राह्मणकी बात सुनी तो हाथ जोड़कर व्याधने कहा कि पास ही सरोवरमें पानी है और उसके आस-पास बहुतसे कैथके वृक्ष फलसे लदे हुए विद्यमान हैं। वहाँपर चलनेसे आप सन्तुष्ट हो जायेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ५९ । ६० ॥ व्याधके उसी कहनानुसार ब्राह्मण उसके साथ चलकर उस सरो-वरके पास पहुंचा। दोपहरके समय उसने स्नान किया, बदन पोंछने और मध्याह्नकालकी क्रियायें पूरी कीं। फिर देवताका पूजन करके व्याधके लाये हुए कैथके फल खाये, सरोवरका ठंडा पानी पिया और छायामें सुखसे बैठकर विप्र बोला-अब मैं तुम्हारे पूर्वजन्मके पुण्य बतलाता हूँ ॥६१-६४॥ पूर्वजन्ममें शाकल नामकी नगरीमें तुम वेदपारगा स्तम्भ नामके ब्राह्मण थे। श्रावस्त गोत्रमें तुम्हारा जन्म हुआथा, किन्तु तुम बड़े भारी पापी थे। दुःसङ्गके दण्डवश तुम एक वेश्यापर मुग्ध हो गये। तुमने अपनी सारी नित्य क्रियायें छोड़ दीं और शूद्रके समान मूर्त्तिमें सर्वेश्वर बनने लगे। तुम जैसे मूर्ख तथा आचार विहीन ब्राह्मण-के घरमें एक अति रूपवती ब्राह्मणी पत्नी भार्या थी। वह उस वेश्याकी तथा तुम्हारी खूब सेवा करती थी तुम्हें प्रसन्न रखनेकी इच्छासे वह तुम दोनोंके पैर धोती थी । ६५-६८। तुम दोनोंका अपेक्षा नीची शय्यापर
५७८ आनन्दरामायणे [सर्गः १४
एवं शुश्रूषयन्त्या हि भर्तारं वेश्यया सह। जगाम सुमहान्कालो दुःखिताया महीतले ॥७०॥ अपरास्मिन्दिने भर्ता माहिषं मूलकाञ्चितम्। अभक्षयत्सुतक्राक्तं निष्पावांस्तैलमिश्रितान् ॥७१॥ तमपथ्यमशित्वा तु वमथुंश्च समेरयत्। अथान्तःदारुणो रोगो व्यजायत भगंदरः ॥७२॥ स दह्यमानो रोगेण दिवारात्रं तु भूरिशः। यावदास्ते गृहे वित्तं तावद्वेश्या च संस्थिता ॥७३॥ गृहीत्वा सकलं वित्तं पश्चात्तस्य मन्दिरे। अन्यस्य पार्श्वमासाद्य तस्थौ घोराऽतिनिर्घृणा ॥७४॥ ततः स दीनबदनो व्याधिबाधामृषा हतः। उरुवाष्पमुखो भार्यां रुजा व्याकुलमानसः ॥७५॥ परिपालय मां देवि वेश्यासक्तं सुनिष्ठुरम्। न मयोपकृतं किञ्चित्तव सुन्दरि पावनि ॥७६॥ यो भार्यां प्रणतां पापो नानुमन्येत मूर्खधीः। स विड्भो भवनीचासु दश जन्मानि सप्त च ॥७७॥ दिवारात्रं महाभागे निन्दितः साधुभिर्जनैः। पापयोनिमवाप्स्यामि त्वां साध्वीमवमन्य वै। ७८॥ अहं कापेन दग्धोऽस्मि सदा निष्ठुरभाषणः। एवं ब्रुवाणं भर्तारं कृताञ्जलिपुटाऽब्रवीत् ॥७९॥ न दैन्यं भजतां कार्ये न व्रीडां कुरु मां प्रति। न चापि त्वयि मे क्रोधो वर्तते सुमनागपि ॥८०॥ पुरा कृतानि पापानि दुःखानि भवति हि। तानि यः क्षमते साध्वी पुरुषो वा स उत्तमः ॥८१॥ यन्मया पापया पापं कृतं वै पूर्वजन्मनि। तद्दुःखजन्यया न मे दुःखं न विषादः कथंचन ॥८२॥ इत्येवमुक्त्वा भर्तारं सा सुश्रूषन्त्यपालयत्। आनीय जनकाद्वित्तं बन्धुभ्यो वरवर्णिनी ॥८३॥ क्षीरोदवासिनं विष्णुं भर्तृदेहे व्यचिन्तयत्। शोधयन्ती दिवारात्रौ पुरीषं मूत्रमेव च ॥८४॥ नखेन कर्षती भर्तुः कृमीन्देहाच्छनैः शनैः। न सा स्वपिति रात्रौ तु दिवा वा वरवर्णिनी ॥८५॥ भर्तुर्दुःखेन संतप्ता दुःखितेदमथाब्रवीत्। देवाश्च पांतु भर्तारं पितरो ये च विश्रुताः ॥८६॥ कुर्वन्तु रोगहीनं मे भर्तारं हृतकल्मषम्। चंडिकायै प्रदास्यामि रक्तं मांसं सुखोद्भवम् ॥८७॥
होती और दोनोंकी आज्ञाका पालन करता रहता थ। यद्यपि वेश्या उसे अपनी सेवा करनेसे रोकती, फिर भी वह न मानती ओर तुम दोनोंकी परिचर्याम गत दिन लगी रहता थी। इस तरह सेवा करते करते उस दुखियाके बहुत दिन बीत गये। एक दिन उसकेपतिने कुछ ऐसी चीज खा ली, जिससे के दस्त होग यता और कुछ दिनों बाद उसके अतिदारुण भगन्दर रोगका रूप धारण कर लिया॥६९-७२॥ उस रोगके स्वरूप रात-दिन जलने लगा। जब तक उसपर रुपैये थे, तब तक वेश्या रही। बादम घरकी रही-सही पूँजी फूरकर निकल भागी और किसी दूसरेके घर जा बैठी। ऐसी अवस्थाम रोता हुआ मनुष्य अपनी स्त्री-से कहने लगा-॥७३-७५॥ हे देवि! मुझ वेश्यासक्त तथा निष्ठुर पुरुषकी रक्षा करो। हे सुन्दरि! हे पावनि! मैंने जीवनभरमें तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया है। शास्त्र कहता है कि जो दोषी शीलवन्ती भार्या-का निरादर करता है, वह सत्तर जन्म तक नपुंसक होकर जन्म लेता है। अच्छे पुरुष ऐसे मनुष्योंकी रात-दिन निन्दा करते हैं। तुम जैसी सती-साध्वी नारीका अपमान करके मुझे किस नीच योनिम जाना पड़ेगा ॥७६-७८। क्योंकि मैं सदा तुम्हारे ऊपर कुपित रहता और रूखी बात बोला करता था। इस प्रकार दीनभावसे प्रार्थना करते हुए पतिको स्त्रोने हाथ जोड़कर कहा-हे कान्त! आप किसी प्रकार दुःखी न हों और उन बीती बातोंके लिए पश्चात्ताप न करें। मुझ तुम्हारेपर उनके लिए कोई विम्बा या क्रोध नहीं है ॥७९॥८०॥ अपने पूर्वजन्मके किये हुए पाप ही दुःखरूप प्राप्त होते हैं। जो स्त्री या पुरुष उन दुःखोंको सह लेता है, वे उत्तम हैं। मुझ पापिनाने पूर्वजन्ममें जो पाप किये थे, उनको भोगते हुए मुझे किसी तरह का दुःख या विषाद नहीं है॥८१॥८२॥ इतना कहकर उसने अपने पतिका ढाढ़स बंधाया और पिता तथा चाचाओँके पाससे धन माँग लाकर सेवा करने लगा। वह उस गंधी पतिके शरीरमें क्षीरसागरनिवासी विष्णुभगवान्का निवास मानती हुई रात दिन मल-मूत्र उठाकर सेवा करती रही ॥८३॥८४॥ पतिके शरीरमें पड़े हुए कीड़ों को नाखुनसे निकालती रहती थी। इस प्रकार सेवा करनेसे रात-दिन कभी उसे सोनेतक की छुट्टी नही मिलती थी। स्वामीके दुःखसे दुःखित होकर वह देवताओंको मनाती, पितरोंसे विनती करती
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१
सकृन्न मक्षिपोपेन भर्तुरारोग्यहेतवे । मोदकानपि दास्यामि विघ्नेशाय महात्मने ॥८८॥ मन्दवारे करिष्यामि भवेत्वहमपोषणम् । नोपभोक्ष्यामि मधुरं नोपभोक्ष्यामि वै घृतम् ॥८९॥ तैलाभ्यङ्गविहीनाऽहं सदा स्वप्स्यामि भूतले । जीवत्वयं रोगहीनो भर्ता मे शरदां शतम् ॥९०॥ एवं सा व्याहरद्देवी वासरे वासरे वने । तदा चागादृषिः कश्चिन्महात्मा देवलाह्वयः ॥९१॥ वैशाखमासे घर्मार्त्तः स ययौ तस्य वै गृहे । तदा ते भार्यया प्रोक्तं वैद्योऽयं गृहमागतः ॥९२॥ तेन ते रोगहानिः स्यात्स्यातिथ्यं करोम्यहम् । यद्याह पथ्यमिच्छ्वं मां नोचेन्नैव करोम्यहम् ॥९३॥ शान्त्या त्वां धर्मविन्मुखं भिषग्व्याजेन वञ्चितम् । तस्यातिथ्यं तु वै कर्तुं दत्ताऽऽज्ञा वै पुरा त्वया ॥९४॥ तस्य पत्नी तदा तुष्टा पूजयामास मा मुनिम् । पादावनेजनं कृत्वा तज्जलं मूर्ध्नि तेऽवहत् । ९५॥ पातुं तुभ्यं ददौ वीर्यं त्वामुक्त्वा भेषजं त्विति पानकं च ददौ तस्मै घर्मार्त्ताय महात्मने ॥९६॥ दिव्यान्नैर्भोजयामास सुगन्धव्यजने ददौ । त्वयाऽनुज्ञापिता साय धर्मतापं व्यशारयत् ॥९७॥ स प्रातःकदिते सूर्ये मुनिर्भाग्यान्तरं ययौ । अथ नाल्पेन कालेन सन्निपातोऽभवत्तव ॥९८॥ त्रिकटु मुश्व आधाय्मा भर्त्तारंङ्गुलिमव्यदन् । कफेन दन्तपङ्क्तिभ्यां मीलित्वाभ्यां दृढं तदा ॥९९॥ ते वक्त्रेऽङ्गुलिखण्डं तस्थितमभवन्निबोधतत् । गङपित्ताङ्गुले स्तस्याः पश्चात्त्वं सं गतः पुरा ॥१००॥ शय्यायां सुमनोहायां स्मरन्तां पुश्चलीं हृदि । मृतं विज्ञाय भर्त्तारं भार्या कांतिमता तव ॥१०१॥ विक्रीन्वा वलये स्वे त्वां गृहीत्वा चन्दनं बहु । चक्रे चितिंतनेन माध्वी मध्ये कृत्वा पतिं तदा ॥१०२॥ समालिङ्ग्य भुजाभ्यां ते पादौ चालिङ्ग्य पादयोः । मुखे मुखं निजं कृत्वा हृदये हृदयं तथा ॥१०३॥ गुह्ये कृत्वा तु गुह्यं स्वमेवं सा रायमागता । दाहयामास कल्याणी भर्तुरैहिकजान्वितम् ॥ आत्मना सह तन्वी ज्वलितं जातवेदसि । १०४ । एवं वरा सा ललना पतिव्रता ददाम ने सुखमित्युदी । विसृज्य देहं सहसा प्रयाथ पर्ति जयत्युच्च सुरादिरोद्यम् ॥१०५॥
और चण्डिकाके समीप यह प्रार्थना करता- हे देवि ! यदि मेरे पतिदेव शीघ्र अच्छे हो जायें तो मैं महिषके रक्त और मांससे मिला हुआ अन्न आपका समर्पण करूंगी वा देत यदि अच्छे हो जायें तो मैं गणेशजीको लड्डू चढ़ाऊंगी और प्रत्येक शनिवारको व्रत करूंगी । मैं मिठाई, मट्ठा छोड़ दूंगी, घी भी नहीं खाऊँगी, शरीरमे तेल और उबटन लगाना त्याग दूंगी और सदा जमीनपर सोऊंगी। लेकिन मेरे पतिदेव रोगमुक्त हो जायें और संवदा वर्ष जीवित रहें ॥८८-९०॥ इसतरह वह नित्य मानना माना करती थी । इसी बीच एक दिन महात्मा देवल ऋषि सहसा उसके घर पहुंचे। वह वैशाखका महीना था; स्तम्भको स्त्री पतिके पास आकर कहने लगी कि एक कोई वैद्य देवात् मेरे घर आ गया है। यह अवश्य किसी उपायसे आपका रोग नष्ट कर देगा। आप यदि आज्ञा दें तो मैं उसकी सेवा करूँ, नहीं तो नहीं ॥ ९१-९३ ॥ स्तम्भ (तुम) ने सेवा करनेकी आज्ञा दे दी। स्त्रीने प्रसन्न मनसे देवलकी पूजा की। इनके चरण धोकर उस जलको माथे चढ़ाया और थोड़ा-सा जल दवाके व्याजसे स्तम्भ (तुम) को भी पिला दिया। फिर उन देवल ऋषिको उसने शर्बत पिलाया। अच्छे-अच्छे पकवान बनाकर भोजन कराया और तुम्हारे कहनेसे उनकी पंखा भी झलकर उनका सन्ताप दूर किया ॥ ९४-९७ ॥ रातभर देवलऋषि उनके घर रहे और सवेरे दूसरे गाँवको चले गये। थोड़े दिन बाद स्तम्भको (तुमको) सन्निपात हो गया। स्त्रीने त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल) का काढा बनाकर स्तम्भके (तुम्हारे) मुखमें दिया, इतनेमें कफके प्रकोपसे दांत अकड़ गये और तुमने स्त्रीकी एक ऊँगली काट ली। तुम्हारे मुखमें वह कोमल उँगली पड़ी ही रही और तुम्हारी मृत्यु हो गयी ॥ ९८-१०० ॥ मरणकालमें शय्यापर पड़े हुए उसी पुंश्चली वेश्याका स्मरण करते-करते तुमने प्राण त्याग दिया। जब उस सतीने जाना कि तुम्हारी मृत्यु हो गयी है तो अपने दोनों कङ्कण बेचकर बहुत-सी चन्दनकी लकड़ी खरीदी और उसकी चिता बनायी। फिर दोनों भुजाओंसे भुजायें पैरसे पैर, मुखसे मुख तथा हृदयसे
४८० आनन्दरामायणे [ सर्ग १४
त्वमन्तकाले गलिकेच्छया हि देहं त्यक्त्वा त्यक्तकर्मा दुरात्मा । व्याधजन्म प्राप्तसि घोरधर्मं हिंसात्मकः सर्वदोषैककारी ॥१०६॥ दत्ता त्वया पादरक्षौपुटे वै संस्मृत्य माधवे मद्धिताय । प्रियाङ्गनाजातेव जाता सुबुद्धिर्धर्मं नृते पादरक्षादिने वै ॥१०७॥ पूर्वं मूर्ध्ना पादरक्षावरोपे जलं मुनेः सर्वपापप्रहारि । तेनैव त संस्मृतिर्मे वनेऽस्मिन् जाता श्रोतुं स्वीयपुण्यं मनिश्व ॥१०८॥ हस्ते कृत्वांगुलिं यस्यान्मृतः पूर्वजन्मांतरे त माद्य वने मांसदाह्यनेऽभूद्देनेचर । १०९ । वेश्या सा झिल्लिका जाता भार्याया तव वर्तते शय्यायां माषानेऽद्य शयनं भुवि सर्वदा ॥११०॥ इति ते सर्वमाख्यातं पूर्वजन्मनि यत्कृतम् तत्कर्म पुण्यं पापं च दृष्टं दिव्येन चक्षुषा ॥१११॥ अतः परं भावि वृत्तं शृणु तेऽहं वदामि वै कृपनाम मुनिस्त्यग्रे करिष्यथ सरोवरे ॥११२॥ करिष्यति तपस्तीव्रं चान्द्रायणपरःस्थितः । पश्चात्प्रयोगिमाते तन्नेत्राभ्यां वहिः सूनम् ॥ ११३॥ वीर्यं दृष्ट्वोर्वी काचित्स्वयं स्खलितमद्भुतम् । ग्रहीष्यति स्वतः काले तस्मात्त्वम्पुत्रवस्तदा ॥११४॥ किराताः पालयिष्यंति किरातत्वं महिष्यसि । उपारक्षार्पणेनेऽद्य यस्मात्सम्पुण्यतस्तदा ॥११५॥ भविष्यति सङ्गविस्ते वने सप्तमुनीश्वरैः । तेषां प्रसादाद्वाल्मीकिर्मुनिरूत्त्व हि भविष्यसि ॥११६॥ यस्त्वं रामकथां दिव्यां सुप्रबन्धैः करिष्यसि ।
वाल्मीकिरुवाच इति व्याधं समादिश्य धर्मान्वैशाखजानपि ।११७। उपदिष्ट्य सविस्तारं प्रतस्थे गौतमीं तदा स द्विजः कुण्डलाद्यैश्च तद्दत्तैस्तुष्टमानसः ।।११८।। व्याधोऽपि शङ्खवचनं तस्मिन्नेव वने चरम् । सर्वान्त्याचमार्यान्तानर्चनान्पाऽकरोत्सुमान् ११९।।
हृदयका आलिंगन करके तुम्हारे साथ घबराता विमान द्वाराकी व्य वहर छह राममें रमी पतिव्रता स्त्री सती होकर वैकुण्ठलोकको चली गयी १०१-१०५ ॥ अथ ब्राह्मण चित्त कार्योंको त्यागे हुए तुमने अन्तसमय- में वेश्याका चिन्तन करते हुए प्राण त्यागे थे। इससे ऐसा उद्गाहारी नया हिंसासे आसक्त इस घोरकर्ममय काप्रिका वीजम उत्पन्न हुए हो। उस समय वैशाख इनंगो आये हुए दैवज्ञ ऋषिकी पूजाके लिए तुमने अपनी स्त्रीको आज्ञा दे दी थी, उसी पुण्यमे तुम्हारे हृदयमें धर्मबुद्धि उत्पन्न हुई है। इसीसे इस समय तुमने मेरे जूते वापस दे दिये हैं। तुम्हारे स्थान देवारुक वन्दके ब्राह्मणका चरण-जल तुम्हारे माथ चढाया था, उसी पुण्यसे बाज हमारी भेट हुई है और तुम अपने पूर्वजन्मका वृत्तांत सुन रहे हो ॥ १०६-१०८॥ तुमने पूर्वजन्ममें अपनी स्त्रीकी उंगली काट ली थी। इसलिए हे वनेचर ! इस समय तुम माँसाहारी हो । वह वेश्या इस समय में ल्ली है। मरने समय तुम शय्यापर हुए थे, इस कारण इस जन्ममें तुम्हे सर्वदा भूमिपर शयन करना पडता है। मैंने अपनी योगदृष्टिसे तुम्हारे पूर्वजन्मके पाप-पुण्य देखकर तुम्हें बतलाया है ॥ १०६-१११॥ इसके अनन्तर अब मैं तुम्हें तुम्हारे भावी जीवनका हाल बतलाता हूँ सुनो । कुपनामक कोई तपस्वी अमर त्यागकर एक सरोवरके निकट तपस्या बार । पश्चात् अन्तम उनकी आंखोंसे वीर्य निकलेगा। उसे देखकर काई सर्पिणी खा जायगी। उसीके उदरसे तुम किरातके रूपमें उत्पन्न होओगे ॥ ११२-११४॥ किरात लोग तुम्हारी रक्षा करेंगे और तुम उन्हींके साथ रहोगे। जो तुम इस समय मुझे मेरा जूता वापस दे रहे हो, इसी पुण्यसे एक बार तुम्हारा सप्त ऋषियांस भेट होगी और उनकी दयासे तुम वाल्मीक नामक ऋषि होओगे ॥ ११५, ११६ । अपनी अच्छी रचनासे तुम रामकथाका निर्माण करागे । वाल्मीकिजी कहते हैं कि इस प्रकार वैशाख मासका धर्म तथा विविध उपदेश देकर व्याधसे कुण्डल आदि पाकर प्रसन्न मन शंख गौतमी नदीकी ओर चले गये। व्याधने भी शंखके उपदेशसे वनमें फल-मूल द्वारा ही वैशाख मासके धर्मोकी
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४८१
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४८१
व्याधजन्मान्तरे जाते कण्वः पुत्रस्त्वहं ततः । पश्चाज्जातोग्रहं भूतस्त्वभवं रघुनन्दन ॥१२०॥ अहं पुन किरातेषु किरातैः सह वर्द्धितः । जन्ममात्रं द्विजत्वं मे शूद्राचाररतः सदा ॥१२१॥ शूद्रायां बहवः पुत्राश्चोत्पन्ना मेऽजितात्मनः । ततश्चौरैश्च सङ्गम्य चौरोऽहमभवं पुनः ॥१२२॥ धनुर्वाणधरो नित्यं जीवानामतकप्रमः । एकदा मुनयः सप्त दृष्टा महति कानने ॥१२३॥ स्वतेजसा प्रकाशन्ते ज्वलनाकैसमप्रभाः । तानन्वधावं लोभेन तेषां सर्वपरिच्छदान् ॥१२४॥ गृहीतुकामस्तत्राहं तिष्ठतां तिष्ठतामिति । अत्रवन् मुनयोऽपृच्छन् किमायासि द्विजाधम ॥१२५॥ अहं तानब्रुवं किञ्चिद्दात मुनिसत्तमाः । पुत्रदारादयः सन्ति बहवो मे बुभुक्षिताः ॥१२६॥ तेषां संरक्षणार्थाय चरामि गिरिकानने । ततो मामब्रुवन्सप्त्याः पृच्छगत्वा कुटुम्बकम् ॥१२७॥ यो यो मया प्रतिदिनं क्रियते पापसञ्चयः । यूयं तद्भागिनः किं वा नेति नेति पृथक् पृथक् ॥१२८॥ वयं स्थास्यामहे यावदागमिष्यसि निश्चयात् । यत्पापं ब्रह्महत्यायां यत्पापं मद्यपाततः ॥१२९॥ तेन पापेन लिम्पामो यदि गच्छामहे वयम् । यत्पापं हेमतीर्येण गुरुतल्पगमाच्च यत् ॥१३०॥ तेन पापेन लिंपामो त्वामपृष्ट्वा वनेचर । चेद्व्रजामो वयं भद्रे द्रक्ष्यसे शृण्वतो यदिः ॥१३१॥ संसर्गजनितं पापं ब्राह्मणस्वहरणाच्च यत् । तेन पापेन लिप्तामो यदि गच्छामहे वयम् ॥१३२॥ एवं तच्छपथैर्नानाविधैः प्रत्ययमागतः । तथेत्युक्त्वा गृहं गत्वा मुनिभिर्यदुदीरितम् ॥१३३॥ अपृच्छं पुत्रदारादींस्तैरुक्तोऽहं रघूत्तम । पापं तथैव मन्मत्रे वयं तु फलभागिनः ॥१३४॥ तच्छ्रुत्वा जातनिर्वेदो विचार्य पुनरागतः । मुनयो यत्र तिष्ठन्ति करुणापूर्णमानसाः ॥१३५॥ मुनीनां दर्शनादेव शुद्धान्तःकरणोऽभवम् । धनुरादि परित्यज्य दण्डवत्पतितोऽभवम् ॥१३६॥
निभाया । व्याधका जीवन बितानेके पश्चात् मैं पत्नीकी निस तृणका पुत्र होकर जन्मा । मै उस समय किरातों ही में बढ़ा और उन्हींके साथ रहन लगा । केवल जन्म मेरा ब्राह्मणके वीर्य्यसे हुआ था। किन्तु कर्म मेरा सर्वथा शूद्रोचित था ॥ १२०-१२१ ॥ एक शूद्रासे मेरा विवाह हुआ और उससे कई पुत्र उत्पन्न हुए। कुछ दिनों बाद मै चोरोंस जा मिला और धनुष-वाण धारण करके संसारी जीव के लिए यमराज सदृश भयान्तक चोर हो गया । एक बार मैंने एक विकराल जङ्गलमे सप्त ऋपियोंका देखा ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ जलती हुई अग्नि तथा सूर्यके समान इनका प्रकाश था । उसे देखकर हा उनके कपड़े लने छींननेके लिए मै जोरोंसे दौड़ पड़ा और "ठहरो ठहरो" कहकर चिल्लाने लगा । तव ऋषियोंने कहा-अरे द्विजाधम ! क्यों दौड़ा आ रहा है ? । १२४ । १२५॥ मैन उनर दिया कि आपमे कुछ भोजन दिग्ये। क्योंकि मेरे परिवारके सब लोग भूखे बैठे हैं। उसीका पालन-पोषण करनेके लिए मैं वन वन घूम रहा हूँ। तब सप्तर्षियोंने हमसे कहा-अपने कुटुम्बियोंसे जाकर पूछो कि मैं जो नित्य यह पापकी कमाई कर रहा हूँ। तुम लोग अलग-अलग बतलाओ कि उस पापका फल भी भोगोगे या नहीं ? ॥ १२६-१२८ ॥ यह विश्वास रक्खो कि जबतक तुम लौटकर नहीं आओगे तब तक मै यहाँ ही रहूँगा। जो पाप ब्रह्महत्या करनेमें और जो पाप मद्य पीनेमे लगता है, हमलोग उन्हीं पापोंके भागी हों, जो बिना तुम्हारे आय यहाँसे जावें। जो पाप मोना चुराने या गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेमे होता है, हमलोग उन पापोंके भागी हों, यदि तुमसे बिना पूंछे यहाँस जाये ॥ १२९-१३१ ॥ संसर्गजनित अथवा ब्राह्मणका धन हरण लेनेसे जो पातक लगता हो हम सब उस पापके भागी हों, यदि यहाँसे पीठ पीछे हटें ॥ १३२ ॥ इस तरह उनके विविध प्रकारकी कसम खानेपर मुझे विश्वास हुआ और अपने घर गया । वहाँ जैसा उन ऋषियोंने कहा था, उसी तरह करक लोगोंको इकट्ठा करके मैने पुत्र-स्त्री आदिसे पूछा । उन्होंने उत्तर दिया कि तुम जो पाप कर रहे हो उससे हमें कोई मतलब नहीं। हम तो केवल फल चाहते हैं ॥ १३३ ॥ १३४॥ उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ और मै लौटकर फिर वहीं आया, जहाँ दयासे परिपूर्ण हृदयवाले वे सप्तर्षि बैठे मेरा रास्ता देख रहे थे ॥ १३५ ॥ उन मुनियोंके दर्शन ही से मेरा हृदय पवित्र हो गया । तुरन्त धनुष-बाण आदि शस्त्रास्त्र फेंककर मैं उनके चरणोंम दण्डवत् लोट गया ॥ १३६॥
| ४८२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १४ |
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रक्षोध्न मां मुनिश्रेष्ठाः पतितं नरकार्णवे । इत्यग्रे पतितं दृष्ट्वा मामूचुर्मुनिसत्तमाः ॥१३७॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते सफलः सङ्गमोऽयमः । उपदेश्यामहे तुभ्यं किञ्चित्तेनैव मोक्ष्यसे ॥१३८।
परस्परं समालोक्य दुर्वृत्तोऽयं द्विजाधमः । उपदेश्य एव सद्भिस्तथापि शरणं गतः ॥१३९।
रक्षणीयः प्रयत्नेन मोक्षमार्गोपदिशतः । इत्युक्त्वा राम ते नाम व्यत्यस्ताक्षरपूर्वकम् । १४०।
मुनयो मामूपदिदिशुन्मत्कृपारूध्वेमानसाः । एकाग्रमनसाऽत्रैव मरेति जप सर्वदा ॥ १४१.।
आगच्छामः पुनर्यावन्तावत्त्वं सदा जप इत्युक्त्वा प्रत्यूः सर्वे मुनयो दिव्यदर्शनाः ॥१४२॥
अहं यथोपदिष्टन्तैस्तथाऽकरवमञ्जसा । अपलेकाग्रमनसा चाद्य विस्मृतवानहम् ।। १४३॥
साक्ष्यथं तपमस्तत्र दण्डोऽग्रे स्थापितो मया एवं बहुतिथे काले गते निश्चलरूपिणः ।। १४४।
सर्वस्वङ्गेकिटीनस्य वल्मीकोऽभून्ममोपरि । दण्डाग्रे च नगो रम्यो बभूव मत्तपोबलात् ॥ १४५।
ततो युगसहस्रान्ते ऋषयः पुनरागमन् । मामूचुर्गमगमस्वेति तच्छ्रुत्वा तूर्णमुत्थितः ॥१४६॥
वल्मीकान्निर्गतेवाहं नीहारादिव भास्करः । मामप्याहर्मुनिगणा द्वाल्मीकिस्त्वं मुनीश्वरः । १४७।
वल्मीकात्सम्भवो यस्माद्द्वितीयं जन्म तेऽभवत् । इत्युक्त्वा ते ययुर्दिव्यां गतिं रघुकुलात्तम ।। १४८।
अहं ते रामनाम्नश्च प्रभावादीदृशोऽभवम् । एकदा शम्भुवचसाऽथ विधिः श्रुतवाँस्तव । १४९।
चरितं वेदवाक्यैश्च कैलासेऽग्ने शुभे । अनेन विधिना तच्च कथितं नारदाय हि ॥ १५०।
नारदः कथयामास वेदवाक्यैर्यथा तथा । ततः क्रौञ्च हतं दृष्ट्वा व्याधेन तमसातटे ॥ १५१॥
शोचन्तीं सान्त्वयन्क्रौञ्चीं ममास्यान्निर्गता तदा । द्वात्रिंशदक्षरः प्रोक्तः श्लोकः श्लोकत्वमागतः । १५२।
और कहने लगा-हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं नरकके महासमुद्रम गिर गया हूँ मेरा रक्षा करिए ॥ १३७॥ इस तरह मुझे आगे पड़ा देखकर उन्होंने कहा - "उठो ! उठो ! आज हम लोगोंका समागम तुम्हारे लिये बड़ा ही कल्याण-कारी हुआ। हम तुम्हें कोई ऐसा उपदेश देंगे, जिससे सब सब पापसे छूट जाओगे।' इसके बाद उन लोगों-ने परस्पर मंत्रणा करके कहा - नियम तो यह है कि सज्जन तो मनुष्योंको ही उपदेश देना चाहिये । यह ब्राह्मणाधम एक असाधारण दुराचारी है। फिर भी इससमयकी शरण आया है। इसलिये इसे कोई उपदेश देकर इसकी रक्षा करनी चाहिये। इस प्रकार निश्चय करके हे राम ! उन्होंने आपके उल्टे अक्षरोंके नाम (मरा) का उपदेश दिया और हमसे कहा कि तुम एकाग्र मनसे 'मरा' नामका जप करते रहो जब तक हमलोग उधरसे लौटकर न आय, तब तक तुम बराबर इस नामका जप करते रहना ऐसा कहकर वे दिव्यदृष्टि ऋषिगण वहाँसे चले गये ॥ १३८-१४२॥ जैसा उन्होंने बतलाया था, ठीक उसी तरह मैं एकाग्र मनसे जप करने लगा। मेरा मन उस जपमें इतना रम गया कि मुझे अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रही ॥ १४३॥ साक्षीके लिए मैंने अपने सामने एक दण्ड गाड़ दिया था, इस तरह निश्चल भावसे भजन करते-करते बहुत दिन बीत गये और वल्मीकों (दीमकों) ने मेरे शरीरपर मिट्टीका ढेर लगा दिया। मेरे तपोबलसे वह सामनेका गड़ा हुआ दण्ड एक सुन्दर वृक्ष बन गया । १४४॥ १४५ । एक हजार युग बीतनेके बाद वे सप्तऋषिगण फिर लौटे और मेरे विमौटके समीप खड़े होकर उन्होंने पुकारा और कहा कि "निकलगे" । उसे सुनकर मैं तुरन्त उठ खड़ा हुआ। उस समय विमौटके भीतरसे मैं निकला, उस समय मेरी शोभा वैसी ही थी, जैसी कि कुहरेके भीतरसे निकले हुए सूर्यभगवान्की होती है। तब मुझसे मुनियोंने कहा कि वल्मीक (बिमौटे) से तुम्हारा पुनर्जन्म हुआ है। इसलिए तुम मुनीश्वर वाल्मीकि हो गये हो ।। १४६-१४८॥ इतना कहकर वे ऋषि दिव्य (आकाश) मार्गसे चले गये आपके रामनामके प्रभावसे मैं ऐसा ऋषि हो गया। एक बार ओषधिव्रजके मुखसे इन ब्रह्माजीने वेदसे सचकर लिखेहुए आपके चरित्रको सुना था ! १४९ ॥ तब इन्हीं (ब्रह्मा) ने उसे अपने बेटे नारदजी द्वारा और उन्होंने वह सारा चरित्र हमें सुनाया। कुछ समय बाद एक व्याधि द्वारा मारे गये क्रौञ्चके दुःखसे दुःखिता क्रौञ्चीको देखकर मुझे जो शोक हुआ, वही शोक बत्तीस अक्षरोंवाले श्लोकके रूपमें मेरे मुखग निकल पड़ा (श्लोक यह है-मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८३
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८३
ततोऽपि विधिनानेन चरितं ते प्रणीतम् । समागत्य तु संक्षेपादपिंतो मे वरो अपि ॥१५३॥ ततोऽस्य ब्रह्मणो वाक्यात्कृतवांश्चरितं तव । आनन्ददायकं रम्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ॥१५४॥ एवं त्वया यथा पृष्टं तथा सर्वं निवेदितम् । एवं वाल्मीकिवाक्यार्थं सर्वं जानन्नपि प्रभुः ॥१५५॥ पृष्ट्वा श्रोतुं जनान्सर्वान् श्रावयामास राघवः । एतस्मिन्नन्तरे रामं वाक्पतिः प्राह सादरम् ॥१५६॥ राम किं चरितं गेयं तवानन्दस्वरूपिणः । यस्य नामाद्यवर्णेच शब्दमात्रोऽत्र गीयते ॥१५७॥ लौकिका वैदिका चापि अकाराद्यास्तु षोडश । स्वरास्तथैव वर्णाश्च चतुस्त्रिंशच्छुभावहाः ॥१५८॥ ककाराद्याः क्षकारांता मन्त्ररूपाः शुभावहाः । एवं वर्णाश्च पञ्चाशद्ये कीर्त्यन्ते नरैर्भुवि ॥१५९॥ ते त्व नामाद्यवर्णाश्च सर्वं ज्ञेया रघूत्तम । तव नामाद्यवर्णेच व्याप्तं सर्वं चराचरम् ॥१६०॥ चराचराणां सर्वेषां यानि नामानि तानि वै। तेषु वर्णपरस्त्वेन नामान्यद्य वदामि ते ॥१६१। संक्षेपान्चैव पंचाशन्नानि शृण्वन्तु सज्जनाः । ओमनन्तो १ नन्दमय २ श्टापूर्तफलप्रदः ३ ॥१६२॥ ईश्वरश्च ४ उवोत्कृष्ट ५ ऊर्ध्वरेता ६ ऋतंभरः ७ । ॠयुक्तश्च ८ ऌश्चैव ९ लृपक १० एक ११ एव च ॥१६३॥ ऐश्वर्यद १२ ओजदश्च १३ तथौदार्यचंचुरः १४ । अंतरात्मा १५ चार्द्धगर्भ १६ स्तथैव करुणाकरः १७ ॥१६४॥ खङ्गो च १८ गतिदश्चैव १९ घनश्याम २० स्तथैव च । ङशन २१ चामिताशेषदुष्कृतश्च २२ तथैव हि ॥१६५॥ छत्री २३ जगन्मय २४ थैव झपरूपी २५ ञटेश्वरः २६ । टणत्कारिधनु २७ ठानबन्धो २८ डमरुमत्करः २९ ॥१६६। ढुण्ढुलुन्चितपापश्च ३० णकर्मश्च ३१ तथैव हि । तपोरूप ३२ स्थय ३३ थैव दक्षी ३४ धन्वी ३५ तथैव च ॥१६७॥
शाश्वतीः समाः ॥ यत्क्रौञ्चमिथुनावधम् यौ काममोहितम् ॥ } ॥ १५०-१५२ ॥ इसके अनन्तर उन ब्रह्माजीने आकर मुझे संक्षेपरूपसे आपका चरित्र सुनाया और वरदान भी दिया । तब इन्हीके कहनेसे मैने सौ करोड श्लोकोंमे आपका चरित्र रचा ॥ १५३ ॥ १५४ ॥ आपने जैसे पूछा वह सब वृत्तान्त मैने कह सुनाया । यद्यपि रामचन्द्रजी इन सब बातोंको जानते थे, किन्तु संसारके लागोंके सुनानेके लिये उन्होंने वाल्मीकिजीसे इस प्रकारके प्रश्न किये थे । इसके बाद ब्रह्माजी बाल, - १५५ । १५६ ॥ हे राम ! आप जैसे आनन्दस्वरूप-के चरित्रका कोई कहां तक गान करेगा । जिसके नामके पहिले ही अक्षरमें संसारके सारे शब्द आ जाते हैं। लौकिक तथा वैदिक अकारादि सोलह स्वर और ककारसे लेकर क्षकार पर्यन्त चौतीस वर्ण ये पचास अक्षर, जिन्हें कि संसारी लोग जानते हैं। वे सब आपके नामके पहले ही अक्षरमें आ जाते हैं, आपके नामके पहले अक्षरसे सारा विश्व व्याप्त है ॥ १५७-१६० ॥ इस चराचर संसारमें जितने नाम लिये जाते हैं। उन्हें वर्णक्रमसे मैं आपको बतला रहा हूँ। संक्षेपमें वे पचास नाम हैं। उनको सज्जन लोग सुनते जायें— अकारसे 'अनन्त' । आकारसे 'आनन्दमय' । इकारसे 'इष्टापूर्तफलप्रद' । ईकारसे 'ईश्वर' । उकारसे 'उत्कृष्ट' ऊकारसे 'ऊर्ध्वरेता' । ऋकारसे 'ऋतम्भर' । ॠकारसे 'ऋणयुक्त' । ऌसे 'ऌक्ष' । ॡसे 'लृपक' । एसे 'एक' । ऐसे 'ऐश्वर्यद' । ओसे 'ओजद' । औसे 'औदार्यचंचुर' । अंसे 'अंतरात्मा' । अःसे 'अर्द्धगर्भ' तथा कसे करुणाकर ॥ १६१-१६४ ॥ खसे 'खङ्गी' । गसे 'गतिद' । घसे 'घनश्याम' । ङसे ङशन' । चसे 'चमिताशेषदुष्कृत' । छसे 'छत्री' । जसे 'जगन्मय' । झसे 'झपरूपी', ञसे 'ञटेश्वर' । टसे 'टणत्कारिधनु' । ठसे 'ठानबन्ध' । डसे 'डमरुहस्तकर' ॥ १६५ ॥ ॥ १६६ ॥ ढसे 'ढुण्ढुलुन्चितपाप । णसे 'णकर्म' । तसे 'तपोरूप' थसे 'थय' । दसे 'दक्ष' । धसे 'धन्वी' । १६७॥
| ४८४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १४ |
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नष्टोद्धरणधीरश्च ३६ तथैव परमेश्वरः ३७।
तथा फलप्रदश्चैव ३८ तथा बलिवरप्रदः ३९ ॥१६८॥
भगवान् ४० मधुघाती च ४१ तथा यज्ञफलप्रदः ४२।
रघुनाथश्च ४३ लक्ष्मीशो ४४ वसिष्ठश्च ४५ तथैव हि ॥१६९॥
शरभ्यः ४६ षड्गुणैश्वर्यसम्पन्नश्च ४७ तथैव हि।
सर्वेश्वरो ४८ हयग्रीवः ४९ क्षमी ५० नामानि ते त्विति ॥१७०॥
पञ्चाशद्वर्णचिह्नानि चैभिर्वर्णैर्जगत्त्रयम् । व्याप्तं श्रीराम सर्वत्र घवर्णेन घटः स्मृतः ॥१७१॥
पवर्णेन पटो ज्ञेयस्त्वेवं वर्णात्मकं जगत् एकैकस्य च वर्णस्य भेदैर्नामानि ते पृथक् ॥१७२॥
नाहं समर्थो व्याख्यातुं पञ्चास्योऽपि न चक्षमः यत्र शेषः सहस्रास्यो वर्णने कुंठितस्त्वभूत् ॥१७३॥
एवं ते महिमा राम कोऽत्र वर्णयितुं क्षमः । तथाप धन्यो वाल्मीकिर्येन ते चरितं कृतम् । १७४।
शतकोटिमितं राम तवैव कृपया प्रभो ।
श्रीरामदास उवाच
इत्युक्त्वा स गुरुर्देवै राघवेणापि पूजितः । १७५।
दृष्ट्वा रामं ययौ स्वर्गं सत्यलोकं ययौ विधिः । वाल्मीकिश्चापि प्रययौ चित्रकूटं निजाश्रमम् ॥१७६॥
तदारभ्य जनाः सर्व चक्रुर्हासं मुदैव ते । मांगल्यकर्माप्युत्साहकर्माणि जगतीतले १७७॥
चक्रुः सर्वे पूर्ववच्च नातिहास्यं प्रचक्रिरे । स्त्रीभिर्नराः सुसन्तुष्टाः क्रीडाहस्यादिकं चक्रिरे ॥१७८॥
इति श्रीमत्शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्धे वाल्मीकिजन्मवृत्तवर्णनं नाम चतुर्दशः सर्ग ॥ १४ ॥
नसे 'नष्टोद्धरणधीर'। वसे 'परमेश्वर'। फंसे 'फलप्रद'। बंसे बलिवरप्रद'। भंसे भगवान्'। मंसे 'मधुघाती'। यंसे 'यज्ञफलप्रद'। रंसे 'रघुनाथ'। लंसे 'लक्ष्मीश', वंसे 'वसिष्ठ'। शंसे 'शरभ्य'। षंसे षड्गुणैश्वर्यसम्पन्न'। संसे सर्वेश्वर'। हंसे 'हयग्रीव'। क्षंसे 'क्षमी' । १६८-१७० ।। ये ही पचास नाम पचासों अक्षरोंके आधार हैं और इन्हींसे आकाश, पाताल, मृत्यु ये तीनों लोक व्याप्त हो रहे हैं। घवर्णसे घटका बोध होता है और पवर्णसे पट जाना जाता है। घट और पट इन दोनों शब्दाक्त ही अन्तर्गत समस्त जगत् है। एक-एक वर्णके भरसे सम्पूर्ण नामोंका वर्णन करनेकी सामर्थ्य मुझमें नहीं है ॥ १७१ ॥ १७२ ॥ मै ही नहीं, यदि पंचास्य अर्थात् शिवजीको बतलाना पड़े तो वे भी असमर्थ ही रहेंग। जिसकी महिमाका वर्णन करनेय एक सहस्र मुखवाले शेषजी भी असमर्थ हो गये, उसका वर्णन कौन कर सकेगा। फिर भी वाल्मीकिजी धन्य हैं, जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंसे आपके चरितका वर्णन किया है ॥ १७३ ॥ १७४ ॥ हे प्रभो ! जो कुछ वाल्मीकिजीने किया है, सो सब आपकी कृपा है। श्रीरामदास कहते हैं कि इतना कहकर समस्त देवताओंके साथ देवगुरु बृहस्पति स्वर्गलोकको चले गये और ब्रह्माजी भी रामसे पूछकर अपने सत्यलोकको लौट गये। वाल्मीकिजी अपने आश्रम चित्रकूटको चल दिये । १७५ ॥ १७६ ॥ उसी समय सब लोग आनन्दके साथ हँसने-खेलने और संसारमें पहलेकी तरह मंगलमय तथा उत्साहप्रय सारे कार्य करने लगे। सबसे लोग प्रसन्नताके साथ परस्पर हँसी-दिल्लगी करने लगे। फिर भी अतिहास्य कोई नहीं करता था ॥ १७७ ॥ १७८ ॥
इति श्रीमत्शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्धे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥
सर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८५
सर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८५
पञ्चदशः सर्गः
( राम और रामराज्यकी विशेषतायें )
श्रीरामदास उवाच
रामराज्ये महानन्दः सर्वाननामपि जन्तुषु । नवीभत्सं क्वापि कस्यद्धैर्ये निदामयं तथा ॥ १ । राज्यमासीदमापन्नं समृद्धबलवाहनम् अशेषैर्भिक्षुभिस्तूर्णं रूप्य हाटकभूषणैः ॥ २ । संस्फुटमिष्टापूर्तानां धर्माणाम् नित्यकर्मभिः सदा संपन्नासस्य च सुचिरं क्षेत्रमण्डलम् ॥ ३ । सुदेशं सुप्रजं सुपथ्यं सुशुभं बहुगोधनम् । देशं वनानां च गजिभिः परिगर्जितम् ॥ ४ सुगुप्ता यत्र वै ग्रामाः सुनिविष्टाङ्गनाजनाः । गुप्तैर्भूरिनिवेशयैः मुमुदाः फलपादपाः ॥ ५ । सुपद्मार्कप्रकाशाभा राजन्ते यत्र भूमयः । मद्या निमज्जगागेऽपि मन्ति न मानवाः । ६ । कुलान्येव कुलीनानि न चान्यापधनानि च । विभ्रमो यत्र नारीणां न सिद्धान्तेषु च कर्हिचित् ॥ ७ । नद्यः कुटिलगामिन्यो न यत्र विषये प्रजाः । तमोयुक्ताः क्षपा यत्र वह्नितेजो न मानवाः । ८ ॥ रजोयुजः स्त्रियो यत्र न धर्मबहुला नराः । धर्मसम्बन्धो यत्रासिन्नना नेम च भोजनात् ॥ ९ ॥ अनपत्यास्पदं यत्र न च वै राजपुरुषाः । दण्डः परशुदण्डानामुद्धवेनागजिषु । १० ॥ आतपत्रेषु नान्यत्र कश्चिन क्रोधोऽप्रमाद्यतः । अन्यत्रातोद्वेगदेशेषु च, वैरं पाण्डित्यनम् । ११ । अक्षिका एव दृश्यन्ते यत्र पाणिषपाणयः न, अन्यत्रातः । उल्लेखाः सामधना एव दृश्याः । १२ ।
श्रीरामदास बोले—हे शिष्य ! रामचन्द्रजीके राज्यके समयके सब जीवोंको सदा अधिक ही आनन्द रहता था। उस समय न कहीं आग होता, न भय-झगड़ा होता, न कोई किसकी निन्दा करता और न कोई किसीसे डरता था ॥ १ ॥ राज्य था उस समय शत्रुओंसे रहित और विविध प्रकारके वाहन तथा सेनासे परिपूर्ण था। रामराज्यमें ब्राह्मण सुखी थे और राज्यके रहनेवाले लोग सान-चाँदीके गहनोंसे लदे रहते थे। इष्ट-आपूर्त आदि धार्मिक कृत्य होते रहते थे और सारे खेत धान्यसे परिपूर्ण रहा करते थे ॥ २ । ३ ॥ भाव यह है कि उस समय समस्त प्रजा सुखी थी, प्रजा प्रसन्न थी और रहन-सहन उत्तम था। गौओक चरनेको सुन्दर घास उपजता था। धनोंक अधिकता थी सारा देश दयालुओंसे भरा पड़ा था ॥ ४ । उस राज्यके सब गाँवामे योजक सुन्दर कूप गड़े हुए थे। प्रजाके सब लोग धन धान्यसे परिपूर्ण रहत थे और अच्छे-अच्छे फूलों तथा सदा फल देनेवाल बृक्षोंसे बगीचासे सारा राज्य भरा रहता था ॥ ५ ॥ सदा बहुमूल्यवाले कितन ही मणियों राज्यकी भूमिवर बह रहा थे। ऐसे ही कुछ स्थान बचे थे जहाँ कि मनुष्योंका निवास नहीं था। बाकी सारा पृथ्वी मनुष्यमय भरा थी ॥ ६ ॥ उस समयके सभी मनुष्य कुलीन थे। अन्याय नहीं होता था और धनकी कमी नहीं रहती थी। उस समय स्त्रियोंम विभ्रम (लज्जा) दीखता था, किन्तु पण्डितोंमें विभ्रम (बड़ी भूल) नहीं रहता था ॥ ७ ॥ उस समय देशमें कुटिल (टेढ़ी बेंगी) बहनेवाली नदियाँ थीं, किन्तु प्रजा कुटिलता (दुष्टता) से सर्वथा बची हुई थी कृष्णपक्षकी रात्रिमें केवल तम (अन्धकार) था, मनुष्योंमें तम (तामस गुण) नहीं दीखता था माना सारे मनुष्य उस समय सात्त्विक थे ॥ ८ ॥ स्त्रियाँ रजोगुण (रजस्वला) होती थीं, पुरुष रजोगुण (राजस गुणयुक्त) नहीं थे। उस समय राज्यके लोग पैसोंसे अन्ध; अन्धे नहीं थे, किन्तु अन्य (अन्न) से कोई अनन्य नहीं था। अर्थात् सब लोग खाने-पीनेमें सुखी दीखते थे। उस समय राजपुरुषों (अधिकारियों) में अन्याय नहीं दीखता था। दण्ड केवल कुल्हाड़ी, मुशल तथा पाँसों ही में दीखता था। प्रजापर प्रजाको दण्डप्रयोगकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी ॥ ९ ॥ १० ॥ सन्ताप (घाम) केवल छतरियोंपर रहता था। रामराज्यका प्रजामें सन्ताप मानसिक दुःख कहीं नहीं रहता था। केवल रथ हाँकनेवाले सारथियोंके हाथमें प्राश (घोड़े या बैलकी रास) रहता था, किन्तु प्रजाके किसी मनुष्यको पाश (फाँसीका दण्ड) मिलता नहीं देखा गया। जड़ता (ठंडक) की बात केवल जलमें रहती थी।
४८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १५
कठोरहृदया यत्र योषितोऽपि न मानवाः । औषधेष्वेव यत्रास्ति कुशाग्रो न मानवे ॥१३॥ वेधोऽभ्यन्तरम् रत्नेषु शूलं मूर्ति... वै । कंपः सात्त्विकभावोत्थो न भयात्क्व पिकस्यचित् ॥१४॥ मत्ताः करिण एव यत्र दारिद्र्यं कुतुरेव न । दुर्लभत्वं पातकस्य सुलभं न च वस्तुनः ॥१५॥ इभा एव प्रमत्ता वै युद्धं चाप्याजितामये । दानहानिर्मदेष्वेव द्रुमष्वेव हि कण्टकाः ॥१६॥ जनेष्वेव दृढांग वै न कस्याप्युदरव्यथा । वनेषु गुणविश्लेषो बन्धोक्तिः पुस्तके दृढा ॥१७॥ दण्डत्यागं महेशास्ति यत्र दण्डधरे जने । दण्डवार्ता सदा यत्र कृताभ्यासकर्मणाम् ॥१८॥ मृगवास्तारकेष्वेव भिक्षुका ब्रह्मचारिणः । यत्र क्षपणका एव दृश्यन्ते मलधारिणः ॥१९॥ प्राणा मन्त्रधरा एव यत्र चञ्चलवृत्तयः । इत्यादि विविधै रामा राज्यं शशास सः ॥२०॥ धर्मराजो धर्मज्ञः श्रीरामः प्रतापवान् । ... दण्डमशोष्यायौ मुनिश्चलम् ॥२१॥ निश्चाय राज्यनीतिं विविधां पञ्चतामियात् । उपारूप महाबुद्धे प्रजा धर्मेण पालयन् ॥२२॥ तताप सूर्ये इव स दुहृदो हृदि नेत्रयोः । ... हृदयेऽप्यानन्दमानसेषु स्वकेष्वपि ॥२३॥ अवधूतमासण्डलान् कोदण्डं कलयन्मले । फलदानार्तगलोऽसि शत्रुसैन्यबलाहकैः ॥२४॥ स धर्मराजोऽभूद् धर्माधर्मविवेचकः । अदुष्टान्दण्डयन्नार्त्तो दण्ड्यांश्च परिदण्डयन् ॥२५॥ पाशेन पाशयाञ्चक्रे वैरिवर्गं द्विषद्गणम् । सेतुः पुण्यजनानाञ्चो रिपुराक्षसमर्द्दनः ॥२६॥ जगत्प्राणसमानश्च अगत्प्राणतनयस्य । राजराजः स एवाभूत्सर्वेषां धनदः सताम् ॥२७॥
किसी मनुष्यमें जड़ता (मूर्खता) नहीं थी। केवल स्त्रियोंकी कटिमें दुर्बलता रहती थी, मनुष्योंके हृदयमें नहीं ॥११॥१२॥ कल्पका विचार केवल रत्नमें रहता था, ... और औष्ण्यंभाव केवल (कूट औषधिविशेष) का नाम दाखता था, किसी मनुष्यमें कुष्ठरोग नहीं था ॥१३॥ वेध (छिद्र) केवल रत्नोंमें रहता था। शूल (छीनी) केवल मूर्ति बनानेवाले कारीगरोंके हाथमें रहता था, केवल सात्त्विक भावके उदय होनेपर लोगोंको कम्प होता था—भयसे नहीं। दुर्बलता पातकोंका था, और... इनमें कोई वस्तु अलभ्य नहीं थी ॥१४॥१५॥ मत्तवाले हाथी होते थे, मनुष्य नहीं। युद्ध जनक लवण ... में देखा जाता था। दानहानि (मदके प्रवाहका रुक जाना) केवल हाथियोंमें थी। वृक्षोंमें ही कटक (कांटे) रहते थे ॥१६॥ मनुष्योंमें विराग होता था, किन्तु किसीकी उदरव्यथा (खांसी) ऐसा नहीं देखा गया, जो कि वनोंमें गुणविश्लेष (प्रत्यञ्चाका वियोग) था, दृढ़बन्धाक्ति (कठिन बन्धन) केवल ग्रन्थों/पुस्तकोंके लिए थी ॥१७॥ शिवभक्तोंके लिए केवल दण्डत्याग किया जाता था। राजा दमन करता था प्रजाजनका, केवल सन्यासियोंमें दण्डवार्त्ता। दण्डग्रहण-सम्बन्धी रातदिन रहते थे। इसके सिवाय चारों वर्णके ऊपर प्रजा में कोई मागन (भिखारी) नहीं था। केवल ब्रह्मचारी भिक्षुक था। केवल क्षपणक (जैनधर्मके) लोग मल (कीचड़ वस्त्र) धारी थे ॥१९॥ प्राय श्रीराम चंचलता राखता था। इस प्रकारके गुणोंसे युक्त रामचन्द्रजी राज्य करते थे ॥२०॥ धर्मका तत्त्व जाननेवाले प्रतापशाली रामने इतने काल पर्यन्त तक निष्कंटक राज्य किया, उन्होंने अनेक प्रकारकी साङ्गोपाङ्ग सूर्याङ्गित करके अष्टाक्षर का अपना राज्यधानी यत्न से और धर्मपूर्वक प्रजापालन करते हुए प्रजाको भलीभांति उन्नत किया ॥२१॥२२॥ वे शत्रुओंके हृदयमें सदा सूर्यकी भांति तपते थे और मित्रोंके हृदयमें चन्द्रमाकी तरह हर्षके पहुंचाने वाले। इन्द्रके समान समराङ्गणमें अपना धनुष चमकाते हुए शत्रुसेनारूपी मेघोंका भङ्ग हेतु थे। ऐसा बराबर देखा गया है, महाराज रामचन्द्रजी धर्मराजकी तरह भलीभांति धर्म अधर्मकी विवेचना करके काम करते थे। जो दण्डके योग्य नहीं होते थे, उन्हें दण्ड नहीं देते थे और जो दण्डके योग्य होता, उसे अवश्य दण्ड देते थे शत्रुओंको समुद्रकी तरह रज्जुकी तरह उन्होंने बाँध रक्खा था। रिपुरूपी राक्षसोंका भी उपकार करके रामचन्द्रजी संसारमें सब महात्माओं में उच्च पदपर पहुँच चुके थे ॥२३-२६॥ जगत्की रक्षाके लिए रामचन्द्रजी जानके प्राण समान थे। अच्छे मनुष्योंको धनकी सहायता देकर वे स्वयं राजराज (कुबेर) हो रहे थे। शत्रुओंको भय दिखाकर रुद्र बन गये थे। यही कारण था कि जिससे
सर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८७
स एव रुद्रमूर्तिश्च प्रैक्षिष्ट रिपुभीषणे । विश्वेदेवास्तमर्चन्तं तु स्तुवन्ति च भजन्ति च ॥ २८ ॥
अशक्यः स हि साध्यानां वसुभ्यो वसुनाधिकः । त्रयाणां विग्रहधरो दस्रोऽजस्ररूपधृक् ॥ २९ ॥
महद्गुणगणगण्यंस्तुतिनास्तोष्यन् गुणाः । यस्याध्वगो यस्तु नवाद्यधरोऽपि । ३० ॥
आक्रान्तेव गन्धर्वाभ्यश्शकं निवर्गान्तिः । रघुवक्षश्चामि तद्दुर्गं स्वर्गमोददम् ॥ ३१ ॥
नागा नागास्तिरश्चक्रुस्तस्य राज्ये बलाधमः । दनुज मनुजाकारं कृत्वा तं तु सिषेविरे ॥ ३२ ॥
आता गुप्तचरा यस्य गुप्तकाः पक्षिणो नृषु । मसेविष्यामहे राजन् मुग्ध्वां स्वस्ववैभवैः ॥ ३३ ॥
वयं ततस्त्वद्विषये सुरावामोऽपि दुर्लभः । इत्युक्त्वा गणचक्रं तं मघवायाः सिषेविरे ॥ ३४ ॥
अशिक्षयत्क्षितिपतेरिह यस्य तुरङ्गमान् । अभूगश्चाशत्रुचित् पक्ष्याने रथि स्थितः ॥ ३५ ॥
अशत्रान्यस्य तु मज्ञाश्चरणेषु वर्षणः । अमन्दिनो दृष्टामरुन्त्येऽपि दानिनः ॥ ३६ ॥
सदोऽजिरं च योद्धागे योद्वाश्च म्नाजिरे । न शास्त्रैर्जन कांधा शस्त्रैः केनचित्क्वचित् ॥ ३७ ॥
न नेत्रविषये जाता विषरे यस्य भूभृतः । सदा नृपवद्वा ऽप्यासतथा महावदः प्रजाः ॥ ३८ ॥
कलवानेक एवास्ति त्रिदिवेऽपि दिवौकसाम् । तस्य क्षोणीभृतः क्षोण्यां जनाः सर्वे कलाधराः ॥ ३९ ॥
एक एव हि कामोऽस्ति स्वर्गं सोऽप्यङ्गज केवलः । माहेता ह्यथ भूपाल सर्व कामा हि तद्भुवि ॥ ४० ॥
तम्योपवर्तनेऽप्येको न भूतो गोत्रभिन्क्वचित् । मद्य स्वर्गमहार्याजो गोत्रभिन्मार्गकीर्तितः ॥ ४१ ॥
क्षयी च तस्य रिपवे कोऽप्यक्षीण न केनचित् । त्रि विष्टपे अपानाथः पूर्व पक्षे क्षयिष्यते ॥ ४२ ॥
नाके नवग्रहाः भान्ति दृशास्तस्यानवग्रहाः । हिरण्यगर्भः स्वर्लोके चैक एव प्रकाशते ॥ ४३ ॥
हिरण्यगर्भाः सर्वेऽपि तन्मीषायामहालयाः । ममाश्र एकः स्वर्लोके निमलं भास्यशुमान् ॥ ४४ ॥
एव विश्वेदेव उनकी स्तुति और भजन करते थे । वे साध्य ( द्वादश गण विशेष ) के लिए भी अशक्य थे । वसु ( धन ) की अधिकतासे वे अष्टवसुओ से भी श्रेष्ठ थे । कामदेवके साक्षात स्वरूप थे और अश्विनीकुमारके समान सदा सुन्दर रूप धारण किये रहते थे ॥ २८-२९ ॥ वे अपने समाधारण पराक्रमसे गन्धर्वोसे भी श्रेष्ठ थे । कितने ही सद्गुणोंसे वे छतीस नृविद्याओं प्रमथ कर रहे थे । समस्त विद्याधर विद्या शिरोमणि थे और अपने गीतोके माधुर्यसे उन्होंने गन्धर्वोका भी मद क्षय कर दिया था । संसारभरक यशआवास स्वर्गके समान कमनीय रामके किल को रक्षा करते थे ॥ ३० ॥ ३१ ॥ दिग्गज तक हाथी रामके हस्तिसमूहसे पराजित हो गये थे । सारी दुनियाके दानव मनुजका रूप बना बनाकर रामका सेवा कर रहे थे ॥ ३२ ॥ उनके गुप्तचर राज्यके मनुष्योंम घुसकर अपना प्रभाव सिद्ध करनेके लिए गुप्तगो ( पक्षिभट दूतों ) से भी बाजी मार चुके थे । इन्द्रादि देवता रामके समीप आकर कहा कि हे महाराज ! हमारे पास जो कुछ वैभव है, वह सब लगाकर हम आपकी सेवा-शुश्रूषा करनेको प्रस्तुत हैं ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ इस युगमें जिसमें कोई वायु देवतासे भी जत्थ चलना सिखाते थे, जिसके पर्वतके समान ऊंचे बड़े-बड़े हाथियोंका अजस्रदानिहा (मस्त मदप्रवाह अथवा दानशीलता) देखकर संसारके कृपण मनुष्य भी दानी बन गये थे । जिसका राजसभाके बुद्धिमान पण्डित और सेनाके बड़े-बड़े योद्धा शास्त्र तथा शस्त्रसे कभी पराजित नहीं हुए थे ॥ ३५ ३७ ॥ उन रामके राज्यमें जैसे रुग्ण कहीं नहीं दीखता था, वैसे ही प्रजा में कभी किसी प्रकारकी विपत्ति भी नहीं दिखायी देती थी ॥ ३८ ॥ देवताओंके स्वर्ग जैसे राज्यमें केवल एक कलावान् चन्द्रमा था, किन्तु रामके राज्यमें सब मनुष्य कलाके भण्डार थे । स्वर्गमें केवल एक कामदेव था, सो भी अनङ्ग ( अर्थात् बिना शरीरका ) । किन्तु रामराज्यके सारे मनुष्य गुणवान् कामदेव (जैसे सुन्दर ) थे । रामके राज्यक्षेत्रमें खीझनेवाला भी कोई गोत्रभित् (जातिसे बहिष्कृत) मनुष्य नहीं मिल सकता था, किन्तु स्वर्गमे देवताओंके राजा स्वयं गोत्रभित् (इन्द्र थे ॥ ३९-४१ ॥ राम-राज्यमें कोई क्षयी (अपरेगी) नहीं सुना गया, किन्तु स्वर्गमें चन्द्रमा एक पक्षमें क्षय होत रहते हैं ॥ ४२ ॥ स्वर्गमें सर्वदा नौ ग्रह रहते हैं, किन्तु रामका राज्य अनवग्रह ( यानी आपको