श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 497, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४८१
व्याधजन्मान्तरे जाते कण्वः पुत्रस्त्वहं ततः । पश्चाज्जातोग्रहं भूतस्त्वभवं रघुनन्दन ॥१२०॥ अहं पुन किरातेषु किरातैः सह वर्द्धितः । जन्ममात्रं द्विजत्वं मे शूद्राचाररतः सदा ॥१२१॥ शूद्रायां बहवः पुत्राश्चोत्पन्ना मेऽजितात्मनः । ततश्चौरैश्च सङ्गम्य चौरोऽहमभवं पुनः ॥१२२॥ धनुर्वाणधरो नित्यं जीवानामतकप्रमः । एकदा मुनयः सप्त दृष्टा महति कानने ॥१२३॥ स्वतेजसा प्रकाशन्ते ज्वलनाकैसमप्रभाः । तानन्वधावं लोभेन तेषां सर्वपरिच्छदान् ॥१२४॥ गृहीतुकामस्तत्राहं तिष्ठतां तिष्ठतामिति । अत्रवन् मुनयोऽपृच्छन् किमायासि द्विजाधम ॥१२५॥ अहं तानब्रुवं किञ्चिद्दात मुनिसत्तमाः । पुत्रदारादयः सन्ति बहवो मे बुभुक्षिताः ॥१२६॥ तेषां संरक्षणार्थाय चरामि गिरिकानने । ततो मामब्रुवन्सप्त्याः पृच्छगत्वा कुटुम्बकम् ॥१२७॥ यो यो मया प्रतिदिनं क्रियते पापसञ्चयः । यूयं तद्भागिनः किं वा नेति नेति पृथक् पृथक् ॥१२८॥ वयं स्थास्यामहे यावदागमिष्यसि निश्चयात् । यत्पापं ब्रह्महत्यायां यत्पापं मद्यपाततः ॥१२९॥ तेन पापेन लिम्पामो यदि गच्छामहे वयम् । यत्पापं हेमतीर्येण गुरुतल्पगमाच्च यत् ॥१३०॥ तेन पापेन लिंपामो त्वामपृष्ट्वा वनेचर । चेद्व्रजामो वयं भद्रे द्रक्ष्यसे शृण्वतो यदिः ॥१३१॥ संसर्गजनितं पापं ब्राह्मणस्वहरणाच्च यत् । तेन पापेन लिप्तामो यदि गच्छामहे वयम् ॥१३२॥ एवं तच्छपथैर्नानाविधैः प्रत्ययमागतः । तथेत्युक्त्वा गृहं गत्वा मुनिभिर्यदुदीरितम् ॥१३३॥ अपृच्छं पुत्रदारादींस्तैरुक्तोऽहं रघूत्तम । पापं तथैव मन्मत्रे वयं तु फलभागिनः ॥१३४॥ तच्छ्रुत्वा जातनिर्वेदो विचार्य पुनरागतः । मुनयो यत्र तिष्ठन्ति करुणापूर्णमानसाः ॥१३५॥ मुनीनां दर्शनादेव शुद्धान्तःकरणोऽभवम् । धनुरादि परित्यज्य दण्डवत्पतितोऽभवम् ॥१३६॥
निभाया । व्याधका जीवन बितानेके पश्चात् मैं पत्नीकी निस तृणका पुत्र होकर जन्मा । मै उस समय किरातों ही में बढ़ा और उन्हींके साथ रहन लगा । केवल जन्म मेरा ब्राह्मणके वीर्य्यसे हुआ था। किन्तु कर्म मेरा सर्वथा शूद्रोचित था ॥ १२०-१२१ ॥ एक शूद्रासे मेरा विवाह हुआ और उससे कई पुत्र उत्पन्न हुए। कुछ दिनों बाद मै चोरोंस जा मिला और धनुष-वाण धारण करके संसारी जीव के लिए यमराज सदृश भयान्तक चोर हो गया । एक बार मैंने एक विकराल जङ्गलमे सप्त ऋपियोंका देखा ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ जलती हुई अग्नि तथा सूर्यके समान इनका प्रकाश था । उसे देखकर हा उनके कपड़े लने छींननेके लिए मै जोरोंसे दौड़ पड़ा और "ठहरो ठहरो" कहकर चिल्लाने लगा । तव ऋषियोंने कहा-अरे द्विजाधम ! क्यों दौड़ा आ रहा है ? । १२४ । १२५॥ मैन उनर दिया कि आपमे कुछ भोजन दिग्ये। क्योंकि मेरे परिवारके सब लोग भूखे बैठे हैं। उसीका पालन-पोषण करनेके लिए मैं वन वन घूम रहा हूँ। तब सप्तर्षियोंने हमसे कहा-अपने कुटुम्बियोंसे जाकर पूछो कि मैं जो नित्य यह पापकी कमाई कर रहा हूँ। तुम लोग अलग-अलग बतलाओ कि उस पापका फल भी भोगोगे या नहीं ? ॥ १२६-१२८ ॥ यह विश्वास रक्खो कि जबतक तुम लौटकर नहीं आओगे तब तक मै यहाँ ही रहूँगा। जो पाप ब्रह्महत्या करनेमें और जो पाप मद्य पीनेमे लगता है, हमलोग उन्हीं पापोंके भागी हों, जो बिना तुम्हारे आय यहाँसे जावें। जो पाप मोना चुराने या गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेमे होता है, हमलोग उन पापोंके भागी हों, यदि तुमसे बिना पूंछे यहाँस जाये ॥ १२९-१३१ ॥ संसर्गजनित अथवा ब्राह्मणका धन हरण लेनेसे जो पातक लगता हो हम सब उस पापके भागी हों, यदि यहाँसे पीठ पीछे हटें ॥ १३२ ॥ इस तरह उनके विविध प्रकारकी कसम खानेपर मुझे विश्वास हुआ और अपने घर गया । वहाँ जैसा उन ऋषियोंने कहा था, उसी तरह करक लोगोंको इकट्ठा करके मैने पुत्र-स्त्री आदिसे पूछा । उन्होंने उत्तर दिया कि तुम जो पाप कर रहे हो उससे हमें कोई मतलब नहीं। हम तो केवल फल चाहते हैं ॥ १३३ ॥ १३४॥ उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ और मै लौटकर फिर वहीं आया, जहाँ दयासे परिपूर्ण हृदयवाले वे सप्तर्षि बैठे मेरा रास्ता देख रहे थे ॥ १३५ ॥ उन मुनियोंके दर्शन ही से मेरा हृदय पवित्र हो गया । तुरन्त धनुष-बाण आदि शस्त्रास्त्र फेंककर मैं उनके चरणोंम दण्डवत् लोट गया ॥ १३६॥