श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 498, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १४ |
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रक्षोध्न मां मुनिश्रेष्ठाः पतितं नरकार्णवे । इत्यग्रे पतितं दृष्ट्वा मामूचुर्मुनिसत्तमाः ॥१३७॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते सफलः सङ्गमोऽयमः । उपदेश्यामहे तुभ्यं किञ्चित्तेनैव मोक्ष्यसे ॥१३८।
परस्परं समालोक्य दुर्वृत्तोऽयं द्विजाधमः । उपदेश्य एव सद्भिस्तथापि शरणं गतः ॥१३९।
रक्षणीयः प्रयत्नेन मोक्षमार्गोपदिशतः । इत्युक्त्वा राम ते नाम व्यत्यस्ताक्षरपूर्वकम् । १४०।
मुनयो मामूपदिदिशुन्मत्कृपारूध्वेमानसाः । एकाग्रमनसाऽत्रैव मरेति जप सर्वदा ॥ १४१.।
आगच्छामः पुनर्यावन्तावत्त्वं सदा जप इत्युक्त्वा प्रत्यूः सर्वे मुनयो दिव्यदर्शनाः ॥१४२॥
अहं यथोपदिष्टन्तैस्तथाऽकरवमञ्जसा । अपलेकाग्रमनसा चाद्य विस्मृतवानहम् ।। १४३॥
साक्ष्यथं तपमस्तत्र दण्डोऽग्रे स्थापितो मया एवं बहुतिथे काले गते निश्चलरूपिणः ।। १४४।
सर्वस्वङ्गेकिटीनस्य वल्मीकोऽभून्ममोपरि । दण्डाग्रे च नगो रम्यो बभूव मत्तपोबलात् ॥ १४५।
ततो युगसहस्रान्ते ऋषयः पुनरागमन् । मामूचुर्गमगमस्वेति तच्छ्रुत्वा तूर्णमुत्थितः ॥१४६॥
वल्मीकान्निर्गतेवाहं नीहारादिव भास्करः । मामप्याहर्मुनिगणा द्वाल्मीकिस्त्वं मुनीश्वरः । १४७।
वल्मीकात्सम्भवो यस्माद्द्वितीयं जन्म तेऽभवत् । इत्युक्त्वा ते ययुर्दिव्यां गतिं रघुकुलात्तम ।। १४८।
अहं ते रामनाम्नश्च प्रभावादीदृशोऽभवम् । एकदा शम्भुवचसाऽथ विधिः श्रुतवाँस्तव । १४९।
चरितं वेदवाक्यैश्च कैलासेऽग्ने शुभे । अनेन विधिना तच्च कथितं नारदाय हि ॥ १५०।
नारदः कथयामास वेदवाक्यैर्यथा तथा । ततः क्रौञ्च हतं दृष्ट्वा व्याधेन तमसातटे ॥ १५१॥
शोचन्तीं सान्त्वयन्क्रौञ्चीं ममास्यान्निर्गता तदा । द्वात्रिंशदक्षरः प्रोक्तः श्लोकः श्लोकत्वमागतः । १५२।
और कहने लगा-हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं नरकके महासमुद्रम गिर गया हूँ मेरा रक्षा करिए ॥ १३७॥ इस तरह मुझे आगे पड़ा देखकर उन्होंने कहा - "उठो ! उठो ! आज हम लोगोंका समागम तुम्हारे लिये बड़ा ही कल्याण-कारी हुआ। हम तुम्हें कोई ऐसा उपदेश देंगे, जिससे सब सब पापसे छूट जाओगे।' इसके बाद उन लोगों-ने परस्पर मंत्रणा करके कहा - नियम तो यह है कि सज्जन तो मनुष्योंको ही उपदेश देना चाहिये । यह ब्राह्मणाधम एक असाधारण दुराचारी है। फिर भी इससमयकी शरण आया है। इसलिये इसे कोई उपदेश देकर इसकी रक्षा करनी चाहिये। इस प्रकार निश्चय करके हे राम ! उन्होंने आपके उल्टे अक्षरोंके नाम (मरा) का उपदेश दिया और हमसे कहा कि तुम एकाग्र मनसे 'मरा' नामका जप करते रहो जब तक हमलोग उधरसे लौटकर न आय, तब तक तुम बराबर इस नामका जप करते रहना ऐसा कहकर वे दिव्यदृष्टि ऋषिगण वहाँसे चले गये ॥ १३८-१४२॥ जैसा उन्होंने बतलाया था, ठीक उसी तरह मैं एकाग्र मनसे जप करने लगा। मेरा मन उस जपमें इतना रम गया कि मुझे अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रही ॥ १४३॥ साक्षीके लिए मैंने अपने सामने एक दण्ड गाड़ दिया था, इस तरह निश्चल भावसे भजन करते-करते बहुत दिन बीत गये और वल्मीकों (दीमकों) ने मेरे शरीरपर मिट्टीका ढेर लगा दिया। मेरे तपोबलसे वह सामनेका गड़ा हुआ दण्ड एक सुन्दर वृक्ष बन गया । १४४॥ १४५ । एक हजार युग बीतनेके बाद वे सप्तऋषिगण फिर लौटे और मेरे विमौटके समीप खड़े होकर उन्होंने पुकारा और कहा कि "निकलगे" । उसे सुनकर मैं तुरन्त उठ खड़ा हुआ। उस समय विमौटके भीतरसे मैं निकला, उस समय मेरी शोभा वैसी ही थी, जैसी कि कुहरेके भीतरसे निकले हुए सूर्यभगवान्की होती है। तब मुझसे मुनियोंने कहा कि वल्मीक (बिमौटे) से तुम्हारा पुनर्जन्म हुआ है। इसलिए तुम मुनीश्वर वाल्मीकि हो गये हो ।। १४६-१४८॥ इतना कहकर वे ऋषि दिव्य (आकाश) मार्गसे चले गये आपके रामनामके प्रभावसे मैं ऐसा ऋषि हो गया। एक बार ओषधिव्रजके मुखसे इन ब्रह्माजीने वेदसे सचकर लिखेहुए आपके चरित्रको सुना था ! १४९ ॥ तब इन्हीं (ब्रह्मा) ने उसे अपने बेटे नारदजी द्वारा और उन्होंने वह सारा चरित्र हमें सुनाया। कुछ समय बाद एक व्याधि द्वारा मारे गये क्रौञ्चके दुःखसे दुःखिता क्रौञ्चीको देखकर मुझे जो शोक हुआ, वही शोक बत्तीस अक्षरोंवाले श्लोकके रूपमें मेरे मुखग निकल पड़ा (श्लोक यह है-मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः