श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 491, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७५
जयो जातो रावणोऽथ कुम्भकर्णस्तदापरः । जातो विजयनामा हि रामेनानेन तौ हतौ ॥२२॥ तावश्विनीसुतौ हि एक ऐरावण स्मृतः । मैरावणश्च त्वपरं पत्र तौ जनितावभौ ॥२३॥ पाताले वरदानाच्च रामहस्तान्मृतिं गतौ । अग्रे जयः शिशुपालो भविष्यति न संशयः ॥२४॥ विजयो दन्तवक्त्रश्च भविष्यत्यर्द्धनातले । द्वापरे कृष्णरूपेण शिशुपालं हरिः स्वयम् ॥२५॥ भविष्यति दन्तवक्त्रं तथैव मुनिसत्तम । एवं जन्मत्रय शापाद्भुक्त्वा तौ भगवद्गणौ ॥२६॥ जयविजयनामानौ पूर्ववत् स्यास्यतः सुधी । कृतदेशेऽथ वै विष्णोर्वैकुण्ठे दुःखवर्जिते ॥२७॥ तावश्विनौ देववैद्यौ पूर्ववदिति तौ स्थितौ । एवं मुने त्वया पृष्टं तन्मया परिकीर्तितम् ॥२८॥ भगवद्गणयोः शापकारणं च पुरातनम् । एव राघव चाग्रे त्वं द्वापरे वरमे शुभे ॥२९॥ जरासंधादिवीरैश्च कंसार्थैरपि भूतले । क्षिप्रं दृष्ट्वाऽत्रावतीर्य कृष्णरूपेण लीलया ॥३०॥ सर्वान्हत्वा तोषयुक्तं करिष्यसि महीतलम् । तान् बौद्धांबुदरूपेण कलावग्रे विजेष्यसि ॥३१॥ वर्णसंकरमाक्ष्य कलेरन्ते रघूत्तम । कल्किरूपेण सकलान्संहारष्यसि लीलया ॥३२॥ एवं दशावताराश्च तथान्येऽपि सहस्रशः । त्वया हितार्थमस्माकं धृताश्चाग्रे धरिष्यसि ॥३३॥
श्रीरामदास उवाच
एवं स्तुवन् ब्रह्माथ समालिङ्गय रघूत्तमः । मन्निदेश्यामने प्राह स्वदर्थं च मुनेर्गिरा ॥३४॥ हास्यमाशास्ति किं येऽनाः कुर्वतु ते सुखम् यथा वाल्मीकिना प्रोक्तं तथा चा रिस्तथास्तु वं ॥३५॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा महा हृष्टाः सुरोदयाः । प्रपच्छ च वाल्मीकिं सभायां रघुनन्दनः ॥३६॥ ममावतारतः पूर्वं त्वया मच्चरितं कृतम् । कथं ज्ञातं त्वया पूर्वं केन त्वामुपदेशितम् ॥३७॥ पूर्वजन्मनि कस्त्वं हि किं पुण्यं हि त्वया कृतम् । तन्मवं विस्तरेणैव कथयस्वाद्य मां प्रति ॥३८॥
'वे दोनों रावण और कुम्भकर्ण होकर जन्म और भगवानने रामका रूप धारण करके उन्हें मारा ॥ २१ ॥ २२ ॥ दोनों अश्विनीकुमारोंमेंसे एक ऐरावण एवं दूसरा मैरावणके रूपसे धरतीपर आया और पाताललोकमें रामके हाथों उन दोनोंकी मृत्यु हुई । अगले जन्ममें जय शिशुपाल तथा विजय दन्तवक्त्रके नामसे जन्मेगा । द्वापरमें भगवान् कृष्णरूपमें उन दोनोंका संहार करेंगे । इस तरह आपसके शाप भोगके वे लोग तीन जन्ममें अपनी करनीका फल भोगकर फिर पहलेकी तरह जय विजयके नामसे भगवान्के द्वारपाल हो जायेंगे, तब उन्हें फिर कोई क्लेश नहीं होगा ॥ २३-२७ ॥ तबसे अश्विनीकुमार भी आनन्दके साथ स्वर्गलोकमें निवास करेंगे । हे मुनिराज ! आपने हमसे जो कुछ पूछा, वह मैंने बतलाया। इसका सारांश यह निकला कि उन दोनों भगवद्गणोंके लिए एक प्राचीन शाप कारण था। उसमें कोई नयी बात नहीं थी। हे राघव ! आगे द्वापर युगमें भी पृथ्वी जब कंस तथा जरासंध आदि दुष्टोंके अत्याचारोंसे घबड़ा जायगी, तब आप कृष्ण अवतार लेकर दुष्टोंका संहार करते हुए पृथ्वीका भार उतारेंगे। उसी प्रकार कलियुगमें बुद्धका रूप धारण करके आप बौद्धोंको पराजित करेंगे ॥ २८-३१ ॥ हे रघूत्तम कलियुगके अन्तमें जब समस्त संसार वर्णसंकर हो जायगा, तब आप कल्किरूप धारण करके सबका संहार करेंगे। इस तरह दस क्या, हजारो अवतार आपने हम लोगोंके कल्याणके लिये लिये हैं और भविष्यमें भी लेंगे ॥ ३२ ॥ ३३॥ श्रीरामदास बोले—इस तरह स्तुति करते हुए ब्रह्माको राघवन हृदयसे लगा लिया और अपनी बगलमें बिठाकर कहा कि वाल्मीकिके कथनानुसार मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम्हारे सुखके लिये लोग हँसें या जो कुछ करें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। वाल्मीकिने जो कहा है, उसके अनुसार मेरी प्रजाके लोग काम करेंगे ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ रामकी इस बातको सुनकर जितने देवत थे, वे सब प्रसन्न हो गये । इसके पश्चात् रामने वाल्मीकिसे कहा कि मेरे अवतारसे पहले ही आपने मेरा चरित्र रामायण बना डाला है । सो भविष्यकी बात आपको कैसे मालूम हुई ? उन्हें किसने बतायी थी ? । ३६ ॥ ३७ ॥ पूर्वजन्ममें आप कौन थे और आपने कौनसे पुण्यकार्य किये थे, सो मुझसे कहिए। इस प्रकार रामके प्रश्न