श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 492, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें४७१ आनन्दरामायणे [ सर्गः १४
तद्रामवचनं श्रुत्वा वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः । सभायां राघवार्थं सर्वं वक्तुं समुपचक्रमे ॥३९॥
वाल्मीकिरुवाच
सम्यक्पृष्टं त्वया राम सावधानमनाः शृणु । राम स्वनाममहिमा वर्ण्यते केन वा कथम् ॥४०॥
यत्प्रभावादहं राम ब्रह्मर्षित्वमवाप्तवान् । शृणु राघव मत्सत्यं कथां मे पूर्वजन्मनः ॥४१॥
पंपातीरे द्विजः कश्चिच्छंखो नाम महायशाः । गुरोः सिद्धिं गमश्चागाद्नदीं गोदावरीं प्रति ॥४२॥
तीर्त्वा भीमरथीं पुण्यां कान्तारे कंटकाविले । निर्जले विजने घोरे वैशाखे तापकंपितः ॥४३॥
शनै चोपाविशन्मार्गे मध्याह्नसमये द्विजः । तदा कश्चिद्दुराचारी व्याधश्चापशरः शठः ॥४४॥
निर्दयः सर्वभूतेषु कालांतक इवापरः । तं कुण्डलधरं विप्रं दीक्षितं भास्करोपमम् ॥४५॥
खङ्गेन भीषयित्वा तु जग्राह कुंडलादिकम् उपानहौ तच्छत्रं च वस्त्राणि च कमण्डलुम् ॥
पश्चाद्व्याधश्च तं विप्रं गच्छेत्याह स मूढधीः ॥४६॥
तथा स मूल्छन्पथि शर्कराविले सूर्यशुतप्ते अनवर्जिते खरे ।
संतप्तपादस्तृणगोपिते स्थले क्वचित्क्व वस्त्रोपरि संस्थितोऽभवत् ॥४७॥
स वै द्रुतं तापतप्तोऽपि विप्रन्दाहेति वादी प्रजगाम विप्रः ।
दृष्ट्वा मुनिं तं बहुविह्वलन्तन्प मध्यं गते पूष्णि यदाऽतितीव्रे ॥४८॥
व्याधस्य जाता मतिरीदृशी वै तस्मै ददामीति च पादरक्षे ।
चौर्येन धर्मम् तु तस्करो न वने गृहीव सकल चतन्मे ॥४९॥
चौर्येण च स्वधर्मेण यद्गृहीतं वनान्तरे । तदीयमेव तन्मत्वं व्याधानां धर्मनिर्णयः ।५०।
तस्मादुपानहौ दास्ये मुहुर्दुःखापनुत्तये । तेन श्रेयो भवेद्यच्च तद्द्वन्मेऽस्तु पापिनः ॥५१॥
जीर्णे नोपानहावेतौ ह्रस्वौ स्तश्च पदोर्मम । न चाभ्यामस्ति मे कार्यं तस्मात्तस्मै ददाम्यहम् ॥५२॥
करनेपर वाल्मीकिजीने बतलाना प्रारम्भ किया । उन्होंने कहा—आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सावधान चित्त होकर सुनिये । हे राम ! आपके नामकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है, जिसके प्रभावसे आज मै ब्रह्मर्षिपदपर बैठा हूँ । अच्छा, पहले अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त ही बतलाता हूँ । पम्पा सरोवरके पास कोई एक महान् यशस्वी शङ्ख नामका ब्राह्मण रहता था। उसने गुरुके पाससे सिद्धि प्राप्त की और कुछ दिनों बाद गोदावरी नदीपर गया । उसे पार करके भीमरथी नदी पार किया और एक ऐसे निर्जन वनमें पहुंचा, जहाँ जलतक मिलना कठिन था । वह वैशाखका महीना था । मारे गर्मीके उसका जी बेचैन था । दोपहरके समय थककर वह उसी वनमे बैठ गया । उसी समय धनुष-बाण लिये एक दुष्ट व्याध उसके पास आ पहुंचा । ३९-४४ । वह दूसरे यमराजके समान भयानक और निर्दयी था। उसने उस सूर्यके समान तेजस्वी ब्राह्मणको तलवारसे भयभीत करके उसके कुण्डलादि आभूषण, जूते, छतरी, वस्त्र तथा कमण्डलु आदि छीन लिये । इसके बाद उसने "जाओ" कहकर छोड़ दिया ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ बेचारा ब्राह्मण कङ्कड़-पत्थर तथा सूर्यके तापसे जलती हुई बालुकाव्याप्त मार्गसे चलने लगा । जब उसके पैर ज्यादा जलने लगते तो किसी तृण आदिवर पैर ठंडा करके आगे बढ़ता था । चलते-चलते जब पैर बहुत जलने लगे तो वह कपड़ा बिछाकर एक स्थानपर बैठ गया ॥ ४७ ॥ थोड़ी देर बाद उठकर उस कड़ाकेकी धूपमें पैरके जलनेसे हाहाकार करता हुआ वह फिर आगे बढ़ा । उस ब्राह्मणको जलती दुपहरीमें इस तरह दुःखित देखकर व्याधके मनमें आया कि मैने इसकी सारी वस्तुएँ तो छीन ली हैं। न हो, इसे इसके जूते लौटा दूँ । इसकी सब चीजें छीनकर मैंने अपने धर्मका पालन किया ही है। हे राम ! वनमें आने जानेवाले पथिकोंके सामान छीन लेना, उन लोगोंके धर्ममें सम्मिलित है। उस चौरने सोचा कि इसके जूते इसे दे डालूँ तो इसका क्लेश दूर हो जायगा और उससे जो पुण्य होगा, सो मुझे