श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 494, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५७८ आनन्दरामायणे [सर्गः १४
एवं शुश्रूषयन्त्या हि भर्तारं वेश्यया सह। जगाम सुमहान्कालो दुःखिताया महीतले ॥७०॥ अपरास्मिन्दिने भर्ता माहिषं मूलकाञ्चितम्। अभक्षयत्सुतक्राक्तं निष्पावांस्तैलमिश्रितान् ॥७१॥ तमपथ्यमशित्वा तु वमथुंश्च समेरयत्। अथान्तःदारुणो रोगो व्यजायत भगंदरः ॥७२॥ स दह्यमानो रोगेण दिवारात्रं तु भूरिशः। यावदास्ते गृहे वित्तं तावद्वेश्या च संस्थिता ॥७३॥ गृहीत्वा सकलं वित्तं पश्चात्तस्य मन्दिरे। अन्यस्य पार्श्वमासाद्य तस्थौ घोराऽतिनिर्घृणा ॥७४॥ ततः स दीनबदनो व्याधिबाधामृषा हतः। उरुवाष्पमुखो भार्यां रुजा व्याकुलमानसः ॥७५॥ परिपालय मां देवि वेश्यासक्तं सुनिष्ठुरम्। न मयोपकृतं किञ्चित्तव सुन्दरि पावनि ॥७६॥ यो भार्यां प्रणतां पापो नानुमन्येत मूर्खधीः। स विड्भो भवनीचासु दश जन्मानि सप्त च ॥७७॥ दिवारात्रं महाभागे निन्दितः साधुभिर्जनैः। पापयोनिमवाप्स्यामि त्वां साध्वीमवमन्य वै। ७८॥ अहं कापेन दग्धोऽस्मि सदा निष्ठुरभाषणः। एवं ब्रुवाणं भर्तारं कृताञ्जलिपुटाऽब्रवीत् ॥७९॥ न दैन्यं भजतां कार्ये न व्रीडां कुरु मां प्रति। न चापि त्वयि मे क्रोधो वर्तते सुमनागपि ॥८०॥ पुरा कृतानि पापानि दुःखानि भवति हि। तानि यः क्षमते साध्वी पुरुषो वा स उत्तमः ॥८१॥ यन्मया पापया पापं कृतं वै पूर्वजन्मनि। तद्दुःखजन्यया न मे दुःखं न विषादः कथंचन ॥८२॥ इत्येवमुक्त्वा भर्तारं सा सुश्रूषन्त्यपालयत्। आनीय जनकाद्वित्तं बन्धुभ्यो वरवर्णिनी ॥८३॥ क्षीरोदवासिनं विष्णुं भर्तृदेहे व्यचिन्तयत्। शोधयन्ती दिवारात्रौ पुरीषं मूत्रमेव च ॥८४॥ नखेन कर्षती भर्तुः कृमीन्देहाच्छनैः शनैः। न सा स्वपिति रात्रौ तु दिवा वा वरवर्णिनी ॥८५॥ भर्तुर्दुःखेन संतप्ता दुःखितेदमथाब्रवीत्। देवाश्च पांतु भर्तारं पितरो ये च विश्रुताः ॥८६॥ कुर्वन्तु रोगहीनं मे भर्तारं हृतकल्मषम्। चंडिकायै प्रदास्यामि रक्तं मांसं सुखोद्भवम् ॥८७॥
होती और दोनोंकी आज्ञाका पालन करता रहता थ। यद्यपि वेश्या उसे अपनी सेवा करनेसे रोकती, फिर भी वह न मानती ओर तुम दोनोंकी परिचर्याम गत दिन लगी रहता थी। इस तरह सेवा करते करते उस दुखियाके बहुत दिन बीत गये। एक दिन उसकेपतिने कुछ ऐसी चीज खा ली, जिससे के दस्त होग यता और कुछ दिनों बाद उसके अतिदारुण भगन्दर रोगका रूप धारण कर लिया॥६९-७२॥ उस रोगके स्वरूप रात-दिन जलने लगा। जब तक उसपर रुपैये थे, तब तक वेश्या रही। बादम घरकी रही-सही पूँजी फूरकर निकल भागी और किसी दूसरेके घर जा बैठी। ऐसी अवस्थाम रोता हुआ मनुष्य अपनी स्त्री-से कहने लगा-॥७३-७५॥ हे देवि! मुझ वेश्यासक्त तथा निष्ठुर पुरुषकी रक्षा करो। हे सुन्दरि! हे पावनि! मैंने जीवनभरमें तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया है। शास्त्र कहता है कि जो दोषी शीलवन्ती भार्या-का निरादर करता है, वह सत्तर जन्म तक नपुंसक होकर जन्म लेता है। अच्छे पुरुष ऐसे मनुष्योंकी रात-दिन निन्दा करते हैं। तुम जैसी सती-साध्वी नारीका अपमान करके मुझे किस नीच योनिम जाना पड़ेगा ॥७६-७८। क्योंकि मैं सदा तुम्हारे ऊपर कुपित रहता और रूखी बात बोला करता था। इस प्रकार दीनभावसे प्रार्थना करते हुए पतिको स्त्रोने हाथ जोड़कर कहा-हे कान्त! आप किसी प्रकार दुःखी न हों और उन बीती बातोंके लिए पश्चात्ताप न करें। मुझ तुम्हारेपर उनके लिए कोई विम्बा या क्रोध नहीं है ॥७९॥८०॥ अपने पूर्वजन्मके किये हुए पाप ही दुःखरूप प्राप्त होते हैं। जो स्त्री या पुरुष उन दुःखोंको सह लेता है, वे उत्तम हैं। मुझ पापिनाने पूर्वजन्ममें जो पाप किये थे, उनको भोगते हुए मुझे किसी तरह का दुःख या विषाद नहीं है॥८१॥८२॥ इतना कहकर उसने अपने पतिका ढाढ़स बंधाया और पिता तथा चाचाओँके पाससे धन माँग लाकर सेवा करने लगा। वह उस गंधी पतिके शरीरमें क्षीरसागरनिवासी विष्णुभगवान्का निवास मानती हुई रात दिन मल-मूत्र उठाकर सेवा करती रही ॥८३॥८४॥ पतिके शरीरमें पड़े हुए कीड़ों को नाखुनसे निकालती रहती थी। इस प्रकार सेवा करनेसे रात-दिन कभी उसे सोनेतक की छुट्टी नही मिलती थी। स्वामीके दुःखसे दुःखित होकर वह देवताओंको मनाती, पितरोंसे विनती करती