भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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४८० आनन्दरामायणे [ सर्ग १४

त्वमन्तकाले गलिकेच्छया हि देहं त्यक्त्वा त्यक्तकर्मा दुरात्मा । व्याधजन्म प्राप्तसि घोरधर्मं हिंसात्मकः सर्वदोषैककारी ॥१०६॥ दत्ता त्वया पादरक्षौपुटे वै संस्मृत्य माधवे मद्धिताय । प्रियाङ्गनाजातेव जाता सुबुद्धिर्धर्मं नृते पादरक्षादिने वै ॥१०७॥ पूर्वं मूर्ध्ना पादरक्षावरोपे जलं मुनेः सर्वपापप्रहारि । तेनैव त संस्मृतिर्मे वनेऽस्मिन् जाता श्रोतुं स्वीयपुण्यं मनिश्व ॥१०८॥ हस्ते कृत्वांगुलिं यस्यान्मृतः पूर्वजन्मांतरे त माद्य वने मांसदाह्यनेऽभूद्देनेचर । १०९ । वेश्या सा झिल्लिका जाता भार्याया तव वर्तते शय्यायां माषानेऽद्य शयनं भुवि सर्वदा ॥११०॥ इति ते सर्वमाख्यातं पूर्वजन्मनि यत्कृतम् तत्कर्म पुण्यं पापं च दृष्टं दिव्येन चक्षुषा ॥१११॥ अतः परं भावि वृत्तं शृणु तेऽहं वदामि वै कृपनाम मुनिस्त्यग्रे करिष्यथ सरोवरे ॥११२॥ करिष्यति तपस्तीव्रं चान्द्रायणपरःस्थितः । पश्चात्प्रयोगिमाते तन्नेत्राभ्यां वहिः सूनम् ॥ ११३॥ वीर्यं दृष्ट्वोर्वी काचित्स्वयं स्खलितमद्भुतम् । ग्रहीष्यति स्वतः काले तस्मात्त्वम्पुत्रवस्तदा ॥११४॥ किराताः पालयिष्यंति किरातत्वं महिष्यसि । उपारक्षार्पणेनेऽद्य यस्मात्सम्पुण्यतस्तदा ॥११५॥ भविष्यति सङ्गविस्ते वने सप्तमुनीश्वरैः । तेषां प्रसादाद्वाल्मीकिर्मुनिरूत्त्व हि भविष्यसि ॥११६॥ यस्त्वं रामकथां दिव्यां सुप्रबन्धैः करिष्यसि ।

वाल्मीकिरुवाच इति व्याधं समादिश्य धर्मान्वैशाखजानपि ।११७। उपदिष्ट्य सविस्तारं प्रतस्थे गौतमीं तदा स द्विजः कुण्डलाद्यैश्च तद्दत्तैस्तुष्टमानसः ।।११८।। व्याधोऽपि शङ्खवचनं तस्मिन्नेव वने चरम् । सर्वान्त्याचमार्यान्तानर्चनान्पाऽकरोत्सुमान् ११९।।

हृदयका आलिंगन करके तुम्हारे साथ घबराता विमान द्वाराकी व्य वहर छह राममें रमी पतिव्रता स्त्री सती होकर वैकुण्ठलोकको चली गयी १०१-१०५ ॥ अथ ब्राह्मण चित्त कार्योंको त्यागे हुए तुमने अन्तसमय- में वेश्याका चिन्तन करते हुए प्राण त्यागे थे। इससे ऐसा उद्गाहारी नया हिंसासे आसक्त इस घोरकर्ममय काप्रिका वीजम उत्पन्न हुए हो। उस समय वैशाख इनंगो आये हुए दैवज्ञ ऋषिकी पूजाके लिए तुमने अपनी स्त्रीको आज्ञा दे दी थी, उसी पुण्यमे तुम्हारे हृदयमें धर्मबुद्धि उत्पन्न हुई है। इसीसे इस समय तुमने मेरे जूते वापस दे दिये हैं। तुम्हारे स्थान देवारुक वन्दके ब्राह्मणका चरण-जल तुम्हारे माथ चढाया था, उसी पुण्यसे बाज हमारी भेट हुई है और तुम अपने पूर्वजन्मका वृत्तांत सुन रहे हो ॥ १०६-१०८॥ तुमने पूर्वजन्ममें अपनी स्त्रीकी उंगली काट ली थी। इसलिए हे वनेचर ! इस समय तुम माँसाहारी हो । वह वेश्या इस समय में ल्ली है। मरने समय तुम शय्यापर हुए थे, इस कारण इस जन्ममें तुम्हे सर्वदा भूमिपर शयन करना पडता है। मैंने अपनी योगदृष्टिसे तुम्हारे पूर्वजन्मके पाप-पुण्य देखकर तुम्हें बतलाया है ॥ १०६-१११॥ इसके अनन्तर अब मैं तुम्हें तुम्हारे भावी जीवनका हाल बतलाता हूँ सुनो । कुपनामक कोई तपस्वी अमर त्यागकर एक सरोवरके निकट तपस्या बार । पश्चात् अन्तम उनकी आंखोंसे वीर्य निकलेगा। उसे देखकर काई सर्पिणी खा जायगी। उसीके उदरसे तुम किरातके रूपमें उत्पन्न होओगे ॥ ११२-११४॥ किरात लोग तुम्हारी रक्षा करेंगे और तुम उन्हींके साथ रहोगे। जो तुम इस समय मुझे मेरा जूता वापस दे रहे हो, इसी पुण्यसे एक बार तुम्हारा सप्त ऋषियांस भेट होगी और उनकी दयासे तुम वाल्मीक नामक ऋषि होओगे ॥ ११५, ११६ । अपनी अच्छी रचनासे तुम रामकथाका निर्माण करागे । वाल्मीकिजी कहते हैं कि इस प्रकार वैशाख मासका धर्म तथा विविध उपदेश देकर व्याधसे कुण्डल आदि पाकर प्रसन्न मन शंख गौतमी नदीकी ओर चले गये। व्याधने भी शंखके उपदेशसे वनमें फल-मूल द्वारा ही वैशाख मासके धर्मोकी