श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१० आनन्दरामायणे [ सर्गः १५
शङ्खवृषा रामराज्ये कृषिकर्मणि योजिताः । एणोऽस्त्येकश्चन्द्रलोके कृष्णवर्णो मनोरमः ॥७६॥
सङ्ख्यः शिशूनां हि क्रीडार्थं सन्त्यनेकशः । अप्सराःसु वरा स्वर्गे गीयते सा तिलोत्तमा ॥७७॥
गेहे गेहे सति नार्यः सर्वास्त्वत्र तिलोत्तमाः । रुक्मभूषणभूषाढ्या झणन्नूपुरनिःस्वनाः ॥७८।
सहस्राक्षोऽस्त्येक एव महान्स्वर्गे प्रगीयते । रामराज्ये चामराणि सहस्राक्षीण्यनेकशः ॥७९।
सुधापानं त्वेकमेव स्वर्गेऽस्ति परमं वरम् । तद्वन्माध्वीरसानां च पानमत्र गृहे गृहे ॥८०॥
सुधापानेन संहृष्टा यथा स्वर्गसुरोत्तमाः । दयिताऽधरपानेन तथाऽत्र सुखिनो जनाः ॥८१॥
सागरेष्वेव सा दृष्टा मर्यादा सर्वदा नरैः । रामराज्येऽत्र बालेषु मर्यादा सर्वदेक्ष्यते ॥८२।
विचरन्ति गजारूढाः भूपते पार्थिवाः पुरा । पौर जानपदाः सर्वे विचरन्त्यत्र ते गजः ॥८३.।
पूर्व भूतं शिशूनां हि चुंबनं दिवसे मुहुः । रामराज्येऽनिशं नारीचुम्बनानि मुहुर्मुहुः ॥८४।
क्रीडा परिमलद्रव्यैः फाल्गुने सा श्रुता पुरा । क्रीडा परिमलद्रव्यैः पौराश्चक्रुः सदाऽत्र ते ॥८५॥
एवं तद्रामराज्यं हि महामंगलसंयुक्तम् । आसीदनुपमेयं च श्रवणान्मंगलप्रदम् ॥८६॥
इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे
उत्तरार्धे रामराज्यवर्णनं नाम पंचदशः सर्गः ॥ १५ ॥
षोडशः सर्गः
( रामका लव-कुश तथा भ्राताओंको राजनीतिक उपदेश )
श्रीरामदास उवाच
एकदा राघवः श्रीमान्समाहूय कुशं लवम् । लक्ष्मणं भरतं चापि शत्रुघ्नं रहसि स्थितः ॥ १ ॥
जाता है कि कैलासपर एक ऐसा बैल है, जो अतिशय धवल वर्णका है। किन्तु रामराज्यमें वैसे वैसे कितने ही बैल हल जोतनेका काम करते थे। चन्द्रलोकमें एक ऐसा मृग है, जो बड़ा सुन्दर और कृष्ण वर्णका है। किन्तु रामराज्यमे लड़कोंको खेलनेके लिए वैसे-वैसे कितने ही मृग रहा करते थे। सुनते हैं कि स्वर्गलोकमें कोई तिलोत्तमा नामकी बड़ी सुन्दरी अप्सरा है ॥ ७५-७७ ॥ किन्तु रामराज्यमे घर-घरकी स्त्रियां तिलोत्तमाके समान सुन्दरी तथा सुवर्णके भूषणोंसे भूषित होकर चलते समय नूपुरका झनझन शब्द करती चलती थीं ॥ ७८ ॥ सुनते हैं कि स्वर्गमें केवल एक सहस्राक्ष (इन्द्र) है, किन्तु रामके यहाँ अनेकों सहस्राक्ष चमर चलते थे। स्वर्गमें केवल अमृत पान करनेकी वस्तु है और रामराज्यमें घर-घर विविध प्रकारकी रसमयौ पेय वस्तुयें विद्यमान रहा करती थीं ॥ ७९ ॥ ८० । जिस तरह अमृतको पीकर देवता स्वर्गमें प्रसन्न रहते हैं, उसी प्रकार स्त्रीके अधरोष्ठका पान करके अयोध्याके सब मनुष्य प्रसन्न रहते थे ॥ ८१ ॥ आजतक संसारी मनुष्योंने केवल समुद्रकी मर्यादा देखी थी (यानी वह अपनी सीमाके बाहर जाता नहीं देखा गया), किन्तु रामके राज्यमे छोटे-छोटे बच्चोंमें भी मर्यादा दिखायी देती थीं ॥ ८२ ॥ सुनते हैं कि पहले राजा ही लोग हाथियोंपर चढ़कर इधर-उधर घूमते-फिरते थे, किन्तु रामके राज्यमे सारे पुरवासो और देशवासी हाथियोपर सवार होकर घूमते फिरत दिखायी देते थे ॥ ८३ ॥ सुनते हैं कि पहले लोग बच्चोंको ही बार-बार चूमते थे किन्तु रामके राज्यम स्त्रियत्को भी लोग बड़े आनन्दके साथ दिन रातमें अनेकों बार चूमते थे ॥ ८४ ॥ सुना जाता है कि पहले फाल्गुनके महीनेम ही रङ्ग तथा सुगन्धित वस्तुएं एक-दूसरेपर उछालते हुए लोग फाग खेलते थे, किन्तु रामके राज्यम लोग सर्वदा वैसे खेल खेला करते थे । ८५ ॥ इस प्रकार रामका राज्य महामङ्गलमय अनुपमेय और नाममात्र सुननेसे ही कल्याणदायक हो रहा था ॥ ८६ ॥ इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्धे पंचदशः सर्गः ॥१५॥
श्रीरामदासने कहा कि एक बार श्रीमान् रामने एकान्तमे लव, कुश, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्नको