भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

सर्गः १६ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४२१


राजनीतिं विस्तरेण शिक्षयामास सादरम् । शृणु वत्स कुशद्य त्वं यूयं सर्वे लवादिकाः ॥ २ ॥
शृणुयात्र स्वस्थचित्ता राजनीतिं वदाम्यहम् । कुश त्वं पृथिवीपालो भविष्यसि गते मयि ॥ ३ ॥
वैकुंठं शृणु तस्मात्त्वं सावधानमना भव । अनृतं नैव वक्तव्यं नृपेण चिरजीविना ॥ ४ ॥
नातिकामी न वै क्रोधी राजा च सुखमर्हति । परदारान्निषेव्याज्यः सर्वथा पार्थिवेन हि ॥ ५ ॥
सत्यं शौचं दया क्षांतिरार्जवं मधुरं वचः । द्विजगोयतिसद्भक्तिः सर्वैते शुभदा गुणाः ॥ ६ ॥
निद्रालस्यं मद्यपानं द्यूतं वारांगनारतिः । अतिक्रीडाऽतिमृगया सप्त दोषा नृपस्य च ॥ ७ ॥
पुत्रवत्पालनीयाश्च प्रजा नृपतिना भुवि । षष्ठांशः करमात्रश्च ग्राह्यः सर्वत्र हि ॥ ८ ॥
ज्ञेयं चारैः सदा वृत्तं पृथिव्याः पार्थिवेन वै । परराष्ट्रे सदा दूता नानावेशविरूपिताः ॥ ९ ॥
पंच पंचायवा द्वौ द्वौ प्रेषणीया नृपेण हि । न विश्वसेत्पारकीयजने दूते नृपोत्तमः ॥ १० ॥
दण्डो भेदस्तथा साम दानं कालोचितं चरेत् । स्वकार्यं साधयेद्युक्त्या काले प्राप्तं नृपोत्तमः ॥ ११ ॥
मनसा विदितं कार्यं कथनीयं न कस्यचित् । कृत्वा कार्यं दर्शनीयं जनान्मंत्रिजनानपि ॥ १२ ॥
मासे मासे स्वकोशस्य परामर्शो नृपोत्तमैः । गृहीणयः सर्वदेव विश्वसेत्सेवकेषु न ॥ १३ ॥
वर्षे वर्षे नगर्याश्च प्राकारस्य नृपोत्तमैः । परामर्श परामर्शः कार्यो मन्त्रिजनैः सह ॥ १४ ॥
चतुर्मासेषु शस्त्राणां मार्गाणां पार्थिवोत्तमः । परामर्शः सदा कोष्ठागारादीनां प्रकामयेत् ॥ १५ ॥
पक्षे पक्षे वारणानां तुरगाणां तथाऽष्टभिः । दिनैर्गवांमासमात्रेण वस्त्राणां पार्थिवोत्तमैः ॥ १६ ॥
परामर्शः सदा कार्यः पिकादीनां त्रिभिर्दिनैः । सीमान्तानां नराणां च षण्मासैश्च नृपोत्तमैः ॥ १७ ॥
परामर्शः सदा कार्यस्तथा जानपदस्य च । मासे मासे स्वसैन्यस्य वापीनाम्प्रयत्नेन हि ॥ १८ ॥


बुलाया । १ । उन्हें विस्तारपूर्वक राजनीतिका शिक्षा देते हुए कहने लगे—हे वत्स कुश तथा लवादिक भ्राताओ ! तुम लोग स्वस्थचित्त होकर सुनो मैं तुम्हें राजनीतीकी शिक्षा दे रहा हूँ। हे कुश ! मेरे वैकुण्ठ चले जानेपर तुम राजा होओगे। इसलिये तुम विशेष रीतिसे मेरी शिक्षाको सुन रखना। जिस राजाको चिरकाल तक इस संसारमें जीवित रहना हो, उसे चाहिये कि वह झूठ कभी न बोले। २-४ ॥ जो राजा कामी और क्रोधी नहीं होता, वही सुखसे रह सकता है। राजाको चाहिये कि वह दूसरेकी स्त्रीसे प्रेम न करे ॥ ५ ॥ सत्य, शौच (पवित्रता), दया, क्षमा, स्वभावम कोमलता, मीठी बातें, ब्राह्मण गौ सन्त तथा सज्जनोंपर श्रद्धा, ये सात गुण राजाके लिए परम कल्याणकारी हैं ॥ ६ ॥ निद्रा, आलस्य, मद्यपान, द्यूत (जुआ), वेश्याओम प्रेम, ज्यादा नाच कूद और अधिक शिकार खेलना, ये राजाके सात दोष हैं ॥ ७ ॥ राजाको चाहिए कि वह राज्यकी प्रजाको पुत्रके समान पालन करे और उसमे आपका षष्ठांश कर सर्वदा लेता जाय ॥ ८ ॥ राजाका यह कर्तव्य है कि वह गुप्तचरों द्वारा राज्य भरका समाचार मालूम करता रहे। दूसरे राजाके राज्यकी भी गति विधि इचनेके लिए वेष बदलकर पाँच पाँच या दो-दो दूत नियुक्त कर दे अपने दूतोंके सिवाय किसी और व्यक्तिपर विश्वास न करे ॥ ९, १० ॥ समय-समयपर जैसा उचित समझे, साम-दान आदि नीतियोंका प्रयोग करता रहे। समय पाकर युक्तिके साथ अपना कार्य साधन करे । ११ ॥ जो कार्य अपने मनमें सोचे, वह किसीसे न कहे। स्वयं चुपचाप करता रहे। नौकरोंके विश्वासपर राज काज न छोड़ दे। १२ ॥ महीने महीने अपने खजानेकी देखभाल स्वयं करे। नौकरोंके ही विश्वासपर न छोड़ दे ॥ १३ ॥ साल-सालभर बाद अपने मंत्रिगणके साथ नगरकी खाई आदिकी भी जांच करे ॥ १४ ॥ चार चार महीनेमे अपने शस्त्रों, मार्गों तथा कोठार आदिका निरीक्षण करता रहे ॥ १५ ॥ एक पक्षमें या आठवें रोज हाथी घोड़े आदि देखे । महीने-महीने कपड़ोंको देख-रेख करे ॥ १६ ॥ प्रति तीसरे दिन अपने यहाँ पाले हुए मृग-कोयल आदि चिड़ियोंको देखे और हर छठवें महीने अपनी सीमापर नियुक्त अधिकारियोंकी निगरानी करे । सर्वदा अपने राज्यमें रहनेवाले मनुष्योंपर ध्यान रक्खे। महीने महीने सेनाकी देखभाल करे और छठव महीने राज्यके कुएं-बावली आदि