भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 811 में से

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पृष्ठ 508

४९२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १६


कार्यः पुष्पवाटिकानां मासे मासे नृपोत्तमैः। परामर्शः स्वयं गत्वाऽथ वा मन्त्रिजनोत्तमै ॥१९॥
वर्षे वर्षे समुद्योगः षण्मासैश्चाथवा त्रिभिः। मासैर्नृपेण स्वे राष्ट्रे कार्यः सैन्येन यत्नतः ॥२०॥
देवानां ब्राह्मणानां च गुरूणां यतिनां तथा। असंतोषो नैव कार्यः पार्थिवेन कदाऽपि हि ॥२१॥
द्रव्यादायं सदा पश्येत्स्वव्ययं तु निरीक्षयेत्। आदायस्य चतुर्थांशैर्व्ययः कार्यो नृपोत्तमैः ॥२२॥
तृतीयांशेन वा कार्यस्त्वर्धांशेन कदापि न। इष्टाः कार्या मन्त्रिणश्च नातिकोपं समाचरेत् ॥२३॥
नातिमान्या मन्त्रिणश्च वर्धनीयाः कदापि न। न विरोध्याः कदा राज्ञा सुरोगेलामन्त्रपंण च ॥२४॥
आकृषणां पद्धणानां दुर्गाणां गिरिवांसिनाम्। अरण्यवासिनां सिंधु उपद्वीपनिवासिनाम् ॥२५॥
सिंधुतीरस्थितानां च नानादेशनिवासिनाम्। वर्षान्तरस्थितानां च द्वीपांतरनिवासिनाम् ॥२६॥
द्वीपे द्वीपे पृथग्वर्षवासिनां पार्थिवोत्तमैः। परामर्शः सदा कार्यश्चारैः पक्षतरेण हि ॥२७॥
परराष्ट्रादशूद्रूपैः काषायांबरधारिभिः। अवधूतादिवेषैश्च तथा कार्पटिकोपमैः ॥२८॥
वणिग्रूपधरैर्दूतैर्वृत्तं ज्ञेयं नृपोत्तमैः। तत्र तत्राधिपाः सर्वेऽप्येकैके कार्यास्तु नूतनाः ॥२९॥
एक एव चिरं राज्ञा न स्थाप्यः सेवकः क्वचित्। परसैन्यानि ज्ञेयानि द्रष्टव्यं स्वबलं सदा ॥३०॥
परराष्ट्रागतो दूतः स्वीयराष्ट्र विलोकयेत्। पृष्टश्चैवं च दण्ड्यः स परदूतं न शिक्षयेत् ॥३१॥
परदूतो मोचनीयः सम्मानेन नृपोत्तमैः। स्वसीमवारक्षिणो दूताः शिक्षणीया मुहुर्मुहुः ॥३२॥
परदूतः कथं मुक्तः स्वीयराष्ट्रे पुरेऽथवा। अद्यारभ्य सूक्ष्मदृष्ट्या द्रष्टव्यं चेति पार्थिवैः ॥३३॥
अग्रेसरं पार्श्वगं च पश्चाद्भागस्य रक्षकम्। सेनापति मन्त्रिणं च स्वीयं प्रतिनिधिं तथा ॥३४॥
सूतं चामरहस्तं च दूतं निकटवर्त्तिनम्। दानमानैस्तोषयेच्च सदा राजा सुबुद्धिदा ॥३५॥
देशं कालं बलं कोशं नियोग्यं हं नृपोत्तमैः। आदौ बुद्ध्या निरूप्याथ नियोज्यापि परीक्षयेत् ॥३६॥


देंखे ॥ १७ ॥ १८ ॥ महीने-महीने बगीचोंमे स्वयं जाकर देखभाल करे या मन्त्रियोंको भेज दें ॥ १९ ॥ साल-साल भर बाद, छठे अथवा तीसरे महीने सैन्यके साथ-साथ राजा अपने राज्यमें दौरा करे। इस बातका सदा ध्यान रक्खे कि देवताओं, ब्राह्मणों, यतियों तथा गुरुजनोंमें किसी प्रकारका असंतोष न फैलने पाये ॥ २० ॥ २१ ॥ धनका आय-व्यय स्वयं देख और आयका चतुर्थांशमात्र व्यय करे। किसी विकट समस्याके आ जानेपर आयका तृतीयांश खर्च करे, किन्तु आयका आधा खर्च कभी भी न होने पावे। मन्त्रियोंको सदा प्रसन्न रक्खे न विशेष क्रोध करे और न विशेष विशेष प्रेम ही रक्खे। दुर्गकी रक्षा करनेवालोंके साथ कभी विरोध न करें ॥ २२-२४ ॥ खानोंके पास रहनेवाले, राजधानीसे दूर किसी नगरमें रहनेवाले, दुर्ग तथा पर्वतनिवासी, जंगलमें रहनेवाले, समुद्रके टापुओमें निवास करनेवाले समुद्र-तटपर रहनेवाले, विदेशोंमें रहनेवाले, द्वीपान्तरके निवासियों तथा किसी भी द्वारक रहनेवाले लोगोंकी प्रत्येक पक्षमें राजा देख भाल करता रहे ॥ २५-२७ ॥ गुप्तस्वरूपवाले, संन्यासीवेषधारी, अवधूत, वणिक् तथा नटांका वेष बनाकर दूसरेके राज्यमें घूमनेवाले गुप्तचरों से अन्य राष्ट्रका समाचार मालूम करता रहे। उन दूसरे-दूसरे देशामें प्रति वर्ष नये-नये अधिकारी बदलता जाय ॥ २८ ॥ २९ ॥ राजाका यह उचित है कि किसी प्रदेशका अधिकारी बनाकर किसी नौकरको ज्यादा दिनों तक उस प्रदेशमें न रहने दे। दूसरे राजाओंकी सेना तथा अपना सैन्यबल बराबर देखता रहे ॥ ३० ॥ यदि किसी दूसरे राष्ट्रका गुप्तचर अपने राष्ट्रमें दिखायी दे जाय तो उसे किसी प्रकारका दण्ड न दें। दूसरे राज्यके दूतको दण्ड न देना नीतिशास्त्रका नियम है। यदि दूसरे देशका दूत मिल जाय तो राजाको चाहिए कि उसे सम्मानपूर्वक छोड़ दे। अपने सीमाप्रांतमें रहने वाले निजी दूतोंको बराबर शिक्षा देना रहे। यदि दूसरे राष्ट्रका दूत मिल जाय तो राजाको चाहिए कि सूक्ष्मदृष्टिसे इस बातपर विचार करे कि उस देशके राजाने किस लिए मेरे राष्ट्रमें अपना दूत भेजा है ॥ ३१-३३॥ जो अपने आगे चलनेवाले हों या पीछे चलते हों, उनकी तथा सेनापति मन्त्री, अपने प्रतिनिधि, सारथी, चमर डुलानेवाले तथा पास रहनेवाले लोगोंको दान-मानसे प्रसन्न रक्खे ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ देश, काल,

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