श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 509, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २५ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५१३
मित्रमित्रा नृपाः सर्वे तथा स्वसुहृदो नृपाः । सुहृदां सुहृदश्चापि मित्रमित्राग्रेरो नयेत् ॥३७॥
निजमित्रबलं दृष्ट्वा मित्रमित्रबलं तथा । बलं स्वसुहृदां चापि परसुहृन्मुहृदां बलम् ॥३८॥
आरो नृपैः परीक्ष्याथ निक्षिपैश्च निरीक्षयेत् । के स्वदीयाः पार्थिवा राष्ट्रे पारकाश्च नृपाश्च के ॥३९॥
सुहृदः स्वनृपाणां च बलं तेषां निरीक्षयेत् । दृष्ट्वा रिपवः स्वीया रिपूणां रिपवस्तथा ॥४०॥
शत्रुं रिपूणां रिपुभिः कार्या राजा हि मैत्रिकी । परस्य शत्रुः पाल्यो न चाप्यंशेन पराश्रयेत् ॥४१॥
बाल्यं शत्रुबलं दृष्ट्वा शत्रुमित्रबलं तथा । बाल्यं शत्रुसुहृत्सैन्यं दृष्ट्वा बाल्यं सुरक्षयेत् ॥४२॥
परराष्ट्रे चारनेत्रैर्नद्यो दुर्गाणि पर्वताः । गम्यानि दृष्ट्वामार्गांश्चारणानां जलाशयाः ॥४३॥
ज्ञात्वा स्वपुरे पूर्वसुयोगञ्च ततश्चरेत् । परराष्ट्रेऽपि बुद्ध्या हि गन्तव्यं पार्थिवैः सुखम् ॥४४॥
यत्राग्रे गमनं स्वीयं नैषां वाच्यं न तत्कदा । पूर्वे गन्तुं निदेशश्च पश्चिमेऽग्रेसरे बलम् ॥४५॥
उपचारमिदुकूलैः कार्यः सेनावासो नृपेण हि । अग्रेसरं बोलनं हि नृपैः क्वाप्य सादरम् ॥४६॥
क्रोशादद्धान्ते गतं दृष्ट्वा गच्छेदन्त्ये स्वयं नृपः । एव वन्नः कदा याम्ये पश्चिमे वा परादिशि ॥४७॥
परराष्ट्रे रोरणीयाश्चारैश्व तु वेदयेत् । स्वराष्ट्रे गमनं यस्यां दिशितस्यां नृपोत्तमैः ॥४८॥
रोरणीयां ध्वजः प्रोन्चैः सेनावामञ्चहाचरेत् । यन्त्राणामायुधानां च वाहनानां बलस्य च ॥४९॥
राज्ञा वृद्धिः सदा कार्या कार्यो धान्यादिसंग्रहः । राष्ट्रे दुर्गे पुरे तीर्थे पत्तने निर्जने वने ॥५०॥
जलाशयाः शुभा कार्याः कृत्वा कोशव्ययं बहु । प्राकारार्थञ्च दुर्गाणाञ्च व्ययो यो व्ययः कृतः ॥५१॥
न ज्ञेयः स व्ययो राज्ञा ज्ञेय रक्षणमात्मनः । धनाद्वयो व्ययो यतः सोऽग्रे ज्ञेयस्तु संग्रहः ॥५२॥
आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान्संरक्षेद्वनैपि । आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥५३॥
यद्मुद्रामितं द्रव्यं राज्ञा दारो निरीक्षयेत् । नावलोक्यं यथाकालं व्यये तच्छोतिमामितम् ॥५४॥
बल, वंश और अपना उत्साह देखकर अच्छी तरह विचारे और शत्रुके भी बल आदिका निरीक्षण-परीक्षण करे। फिर अपना बल, मित्रबल, मित्रके मित्रका बल और अपने सुहृदके पक्षद्रोंका बल देखकर राजाक चाहिये कि अपने शत्रु का अन्ताबाल देवे। उस इस बातपर विचार करे कि कौन राजे अपना साथ देनेवाले हैं और कौन शत्रुके ॥३६-४०॥ इसके बाद उसे चाहिए कि शत्रोके शत्रुसे मित्रता करे। दूसरेके शत्रु की बहुने भी रक्षा हात करे और यदि रक्षा करे भी तो खूब अच्छी तरह रक्षा-सम्हाल ॥४१॥ यदि शत्रु की सेना किसी प्रकार अपने वश में हो जाय तो उसकी रक्षा करे। शत्रुके मित्रकी सेना एवं शत्रुके सुहृदकी सेनाकी भी रक्षा करे ॥४२॥ दूसरेके राष्ट्रपर गुप्तचरोंको नियुक्त करके वहाँ के वनोंको, नदियों, वनों, दुर्गेके रास्तों, गुप्तचरोंके रास्तो तथा जलाशय वगैरह दृष्टि रखकर अच्छी तरह समझ ले। पहले अपने राज्यकी रक्षाका पूर्ण प्रबन्ध करके ही किसी दूसरेके राज्यपर चढ़ाई करे। ॥४३॥४४॥ जहाँ अपनेको जाना हो, वह अपनी बात कभी किसको न बतलाये। यदि पूर्वकी ओर यात्रा करनी हो तो उत्तरकी तरफ झण्डा भेजे और सेनाके ठहरनेका शिविर आदि भी उत्तरकी ओर ही बनवाये। सेना भी उत्तरकी ओर ही चले, किन्तु आधा कोस आगे जाकर पूर्वकी ओर मुडकर राजाको जहाँ जाना हो, वहाँ जाय। इसी तरह कभी अपनेको दक्षिणकी ओर तथा कभी पश्चिम दिशाकी ओर भेजे ॥४५-४७॥ किसी दूसरे राजाके राष्ट्रमें जानेकी गाड़ियोंपर गुप्तचरों द्वारा वहाँका हाल-चाल मालूम करे। अपने राज्यमें उसी ओर झण्डागाडे, जिस ओर अपनेको जाना हो ॥४८॥ शिविर आदि भी उसी तरफ बनवाये। राजाका चाहिये कि अपने यहाँ तोप-बन्दूक आदि यन्त्र तथा अन्य आयुध वाहन और सेनाका सदा बढाता हुआ धन-धान्य आदिका भी भली प्रकार संग्रह करता रहे। अपने राष्ट्र, किलोंमें, बाजारों, तीर्थों खास राजधानी तथा निर्जन वनोंमें प्रचुर धन खर्च करके बड़े-बड़े जलाशय बनवा दे। जो घर ग्राम-नगरकी खाई, किले, रक्षातत्व आदिमें खर्च हो, उसे खर्च न समझ । उसे तो अपने रक्षाका साधन माने। धर्मकार्यमें जो व्यय हो, उसे आगेके लिए संग्रह माने ॥४९-५२॥ आपत्तिके बचनेके लिए धनकी रक्षा करे, धनसे भी श्रेष्ठ समझकर स्त्रीकी रक्षा