भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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४९४ ] आनन्दरामायणे [ सर्गः १६

न सेनारहितो राजा गच्छेन्नृपपुराद्वहिः । नैकाकी विचरेद्ग्रामे नैकाकी क्वापि संविशेत् ॥५५॥ नैकाकी क्वापि वै स्थेयं न पद्भ्यां विचरेद्बहिः । न गच्छेदपरगेहेषु बारं वारं नृपोत्तमः ॥५६॥ न विश्वसेद्द्वारपाल-जलद-रजक-धाय्य । धौतवस्त्राणि बुद्ध्या हि नृपः सम्यक् परीक्षयेत् ॥५७॥ ताम्बूलवीटिकां प्राप्तां तां दृष्ट्वा परीक्षितां परदत्तं जलं ग्राह्यं राज्ञाऽऽक्षिप्यां विलोक्य च ॥५८॥ फलानि परदत्तानि परीक्ष्येन्मतिमान्नृपः । दृष्ट्वाऽन्येनोर्ध्वतोऽन्यं न तेषां निकटे चरेत् ॥५९॥ सभां शङ्का प्रगन्तव्यं द्विवारं त्वेकदाऽथवा । नद्यशाम सभामध्ये स्वयं राजा न वै चिरम् ॥६०॥ स्वदेशा त्यागद्रोहाद्वहिः कार्यों नृपोत्तमैः । पादौ प्रसार्य न स्थेयं सभायां नृपसत्तमैः ॥६१ । न बाहुबन्धनं जान्वोः कृत्वा स्थेयं नृपोत्तमैः । नातिस्मितं कदा कार्यं सभायां पार्थिवोत्तमैः ॥६२॥ सभायां समलैर्वस्त्रैर्न गन्तव्यं कदा नृपैः । गणिका गणका वैद्या गायका बन्दिनो नटाः ॥६३॥ पण्डिता धर्मशास्त्रज्ञास्तार्किका वैदिका द्विजाः । सदा पाल्या नृपतिनै दानमानैरहर्निशम् ॥६४॥ न विश्वसेत्कर्णपिताय तोषयेत्तं धनार्दिभिः । प्रजानां गौरवं कार्ये दण्डयेन्न वृथा प्रजाः ॥६५॥ भवेद्युक्ता प्रजाः सर्वा नैव कार्याः कदाचन । राज्यद्वारस्थितैर्दूतेः सद्यः ते पार्थिवोत्तमम् ॥६६॥ मुक्तकर्णकबन्धश्च विमुक्तकञ्चिबन्धनः । सद्योद्दष्ट न्यस्तशस्त्राः प्रेषणीया नृपोत्तमम् ॥६७॥ राज्ञाज्ञया नृपं नन्त्वाऽऽपने चापविशेत्क्रमात् । नृपैर्माण्डलिकैः सर्वैः स्थातव्य पुरतोऽथवा ॥६८। सर्मत्य हस्तौ पादौ च राजन्वस्तशिलोचनैः । न हसेद्राजपुरतो न जृम्भेत क्षुवेन्मुहुः ॥६९। सदा न ग्रीवन कार्यं सर्वैर्भाण्डलिकैर्नृपैः । आगमे गमने सर्वैर्वन्दनीयो नृपो मुहुः ॥७०। नानुच्छैः श्यदेद्राजमाश्रित्ये पार्थिवेश्वरैः । कञ्चुकेन विना राजा सभायां नोपमविशेत् ॥७१॥

करे और स्त्री तथा धनपर भी बढ़कर आशा नहीं करनी चाहिए ॥५३॥ अपनी आयमेंसे एक तृतीयांश या तिहाई भाग ही लेकर छोड़ें । किन्तु समय पड़नेपर यदि करग्राहक सबको आवश्यकता पड़ जाय तो सर्वकर ले, रुपया मुंह न देख । अपने नगरके बाहर बिना सेनाके कभी न जाय । अपने ग्राममें भी अकेला न घूम-फिरे और न कही अकेला बैठे । ५४ । ५५ ॥ कहीं अकेला न ठहर न पैदल चले और बार बार किसोके घर न जाय । द्वारपाल, पानी देनेवाले सेवक और धात्री इनपर कभी भी विश्वास न कर कपड़ा धुलकर आये तो राजाको चाहिए कि अपनी बुद्धिसे खूब अच्छी तरह उसकी परीक्षा करके ही पहरे । पानका बीड़ा खानेको आये तो पहले उसे किस दूसरेको खिलाकर स्वयं दूसरा थोड़ा खाय । पाना पानीको अच्छे से अच्छा तरह उसकी परीक्षा करके अपने आगे डलवा कर पिये । ५६-५८ ॥ दूसरेके दिये फलोंकी भी भली भाँति परीक्षा कर ले । जो राज मिलने आयें, उनको दूरसे ही बातचीत करे । न स्वयं उनके पास जाय और न उन्हें अपने पास आने दे । प्रतिदिन एक या दो बार सभाम जाय और आधे पहरसे अधिक वहाँ न ठहरे । अपनेसे द्वेष करनेवालोंको नगरसे बाहर कर दे । सभामें कभी पैर फैलाकर न बैठे और न घुटनोंको सिकोड़कर ही बैठा करे । राजाको चाहिये कि सभामें कभी ज्यादा न हँसे ॥ ५९-६२ । सभाने कभी मैले कपड़े पहिनकर न जाय । गणिका, गणक ( ज्योतिषी ), वैद्य, गायक, बन्दीजन, नट, पंडित, धर्मशास्त्री, नैयिक, वैदिक तथा ब्राह्मण इनका दान मान औरोंसे सदा सम्मान करता रहे ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ नाईपर कभी भी विश्वास न करे । उसे हमेशा रुपये-पैसे देकर प्रसन्न रक्ख । सब लोगोंका सम्मान करता हुआ प्रजाको व्यर्थ दंड न दे ॥ ६५ ॥ इस बातका सदा ध्यान रक्खे कि प्रजाके लोगोंको किसी प्रकारका भय न होने पाये । राजद्वारपर रहनेवाले दूतोंका चाहिये कि जो राज मिलने आयें, उनके जनाने उतरवाकर परत्ले खुलवा दे । जो कुछ अन्य शस्त्र उनके पास हो, उन्हें अलग रखवा दे । फिर अच्छी तरह देख भालकर राजासे मिलनेको भीतर आने दे ॥ ६६ ॥ ६७ । जो कोई राजामें मिलने जाय वह राजाका प्रणाम करके संकेतित आसनपर बैठे । जो माण्डलिक राज हों, उनके लिये राजाके सामने कुसी डाला जाय । वे राजाके सामने हाथ पैर समेटकर राजाकी ओर निहारते हुए बैठे । राजाके सामने न हंसे, न जम्हाई लें और न बार-बार छींके ॥६८॥ न बार-बार