भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५०४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १८

तिर्यग्रूपं पञ्चदश रक्ता रेखाः प्रकल्पयेत् । पीता प्रथमिका पंक्तिश्चतुर्दिक्षु प्रकारयेत् ॥ ५ ॥ पंक्तिर्द्वितीया शुक्लैव सातव्या च तथाष्टमी । नवम्यैशानिदारभ्य तृतीयायां प्रकल्पयेत् ॥ ६ ॥ वक्ष्यमाणपदान्येव कृष्णानि हि समाचरेत् । आरभ्योत्तरस्यां हि समाप्तिर्दक्षिणे स्मृता ॥ ७ ॥ पश्चिमाभिमुखा स्थाप्या मुद्रा तत्रात्मसम्मुखा । पूर्वास्थेन सदा स्थेयं तदा कर्त्रा विनिश्चयात् ॥ ८ ॥ प्रथमं हि द्वितीयं च चतुर्थं पञ्चमंस्तमे । अष्टमं नवमं चैव तथैकादशमुच्यते ॥ ९ ॥ सप्तमस्तृष्ट्यां पंक्तौ हि चतुर्थं षष्ठमष्टमे । तथैकादशमं ज्ञेयं पञ्चमायाः क्रमोऽधुना ॥ १० ॥ प्रथमं हि द्वितीयं च चतुर्थं पञ्चमंस्तमे । नवमंैकादशे चापि षष्ठायाश्च क्रमोऽधुना ॥ ११ ॥ प्रथमं हि द्वितीयं च चतुर्थं षष्ठमुत्तमम् । नवमैकादशे चापि सप्तमो सकलाऽसिता ॥ १२ ॥ नवम्याः प्रथमं कृष्णं द्वितीयं हि चतुर्थकम् । षष्ठं हि सप्तमं चापि नवमं दशमं स्मृतम् ॥ १३ ॥ तथैव द्वादशं चापि दशम्याश्च क्रमोऽधुना । चतुर्थं च तथा षष्ठं सप्तमार्कं तथाऽसिते ॥ १४ ॥ एकादश्याश्च प्रथमं द्वितीयं हि चतुर्थकम् । पञ्चमंनवमान्येव दशमार्कं यथाऽसिते ॥ १५ ॥ द्वादश्याः प्रथमं कृष्णं द्वितीयं हि चतुर्थकम् । षष्ठं च सप्तमं चापि राष्टमं नवमं तथा ॥ १६ ॥ दशमार्कं तथा प्रोक्ता कृष्णा कृष्णता त्रयोदशी । एव बुद्ध्या पूरयित्वा राजा रामेति वै स्फुटम् ॥ १७ ॥ सितवर्णं शमनाममुद्रायां हि निर्गसयेत् । एवं राममुद्रिकायाः स्वरूपं ते मयोदितम् ॥ १८ ॥ एवं मुद्रांकितां रामाः शिलां विप्रेश्य आदरात् । ददौ साद्यापि भूम्यां हि रामनाथपुरेऽस्ति हि ॥ १९ ॥

विष्णुदास उवाच

किमर्थं भूसुरेभ्यश्च राघवेण समर्पिता । रामनाथपुरे पूर्वे स्वीयमुद्रांकिता शिला ॥ २० ॥ हत्सर्वं विस्तरेणैव कथयस्वाद्य मा गुरो । आश्चर्यं त्वतया प्रोक्तं श्रोतुमिच्छामि त्वन्मुखात् ॥ २१ ॥

श्रीरामदास उवाच

एकदा राघवं श्रुत्वा विप्रा अञ्चितदायिनम् । ह्योद्विबह्मपुरम्प्रान्ते दाक्षिणात्या द्विजोत्तमाः ॥ २२ ॥


आते-जाते कहीं भी उन्हें रोक नहीं थी, अब मैं तुम्हें राममुद्राका स्वरूप बताता हूँ, सो सुनो ॥ १-४ ॥ लाल रंगकी खड़ी-बेड़ी पन्द्रह रेखाएँ खींचे। उनके चारों ओरकी पहली पंक्ति पीले रंगसे रंगे ॥ ५ ॥ दूसरी और आठवीं पंक्ति सफेद ही रहने दें। इसके बाद ईशानकोणसे लेकर तीसरी रेखातक आगे कही जानेवाली पंक्तियाँ काले रंगसे लिंपे। लिखवट उत्तरकी तरफसे प्रारम्भ करके दक्षिणमें समाप्त करनी चाहिए। ६-७॥ मुद्राका मुख सदा सामने अर्थात् पश्चिमाभिमुख बनाये और स्वयं पूर्वकी ओर मुख करके बैठे। ८ । पहली, दूसरी, चौथी, छठवीं, सातवीं, आठवी, नवी, ग्यारहवीं और पाँचवीं रेखाके चौकियों तथा पहली, दूसरी, चौथी, छठवीं, नवीं, ग्यारहवी तय सातवीं चौकी यह सब काले रंगकी रहेंगी। ९-१०। फिर नवौं रेखाकी पहली, दूसरी, चौथी, छठी और आठवी चौकी का काले रंगकी रहेंगी। ६-११ फिर ग्यारहवी रेखाकी पहली, दूसरी, चौथी, छठीं, आठवीं, नवीं तथा दशवीं चौकी भी काले रंगकी रहेगी। बारहवीं रेखाकी पहली, तीसरी, दूसरी, चौथी, छठी, सातवी, आठवी, नवीं दसवीं, बारहवीं तथा तेरहवी चौकी भी काले रंगकी रहेंगी। इस प्रकार अपनी बुद्धिसे उपर्युक्त कोष्ठकोंको पूर्ण करनेसे 'राजा राम' यह शब्द साफ-साफ सफेद वर्णमें लिख जायगा ॥ १२-१७ ॥ इस तरह मैंने तुम्हें राममुद्राका स्वरूप बतलाया। इस प्रकारकी मुद्रासे चिह्नित शिला रामने ब्राह्मणोंको दानस्वरूप दी थी जो आज भी रामनाथपुरमें रहनेवाले ब्राह्मणोंके पास विद्यमान है। १८-१९॥ विष्णुदासने पूछा कि रामने रामनाथपुरवाले उन ब्राह्मणोंको वह अपनी मुद्रासे अंकित शिला किस लिये दी थी? यह सब कथा विस्तारपूर्वक हमें बतलाइये। आपने यह आश्चर्यभरी बात कह दी। इसका पूरा विवरण मैं आपके ही मुखसे सुनना चाहता हूँ। २०॥ २१॥ श्रीरामदास कहने लगे कि एक समय रामचन्द्रकी यह