भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 811 में से

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सर्गः ४ ] सारकाण्डम् ३७

भरतं पतितं दृष्ट्वा शत्रुघ्नं विव्यधुः शरैः । तं चापि विरथं कृत्वा दद्रुवुर्लक्ष्मणं नृपाः ॥४०॥ ववर्षुर्निशितैर्बाणैश्चक्रुस्तं व्याकुलं रणे । राघवञ्च गधर्वं चापि शरैराच्छादयन्नृपाः ॥ ४१॥ ततः श्रीरामचन्द्रोऽपि लीलया समरांगण । पश्यन्सु आन्ध्रश्च कौसल्याद्यासु मातृषु ॥४२॥ सीतायां भ्रातृपत्नीषु पित्रा मन्त्रिषुलेष्ष्वपि । टणंकृत्य महच्चापं वायव्यास्त्रञ्च तान्नृपान् ॥४३॥ शुष्कपर्णवदुद्धूय प्राक्षिप्ताब्धेरोधसि । मोहनास्त्रेण शेषान् हि मोहयामास राघवः ॥४४॥ लुलुंठ सकलं सैन्यं हस्त्यश्वरथसंकुलम् । ततो मूर्च्छितमालोक्य भरतं कैकयी रणे ॥४५॥ करिष्याः शीघ्रमुत्प्लुत्य शुशोचांके निधाय तम् । ततो दशरथोऽपि कौसल्याद्या नृपस्त्रियः ॥४६॥ सांत्वयित्वाऽथ तान्रामः सौमित्रिं प्राह भवत । इतो विदूरे सौमित्रे मुद्गलस्य तपोनिधेः । ४७। आश्रामोऽस्ति हितत्र स्वं गत्वा वल्लोः शुभानहाः । सञ्जीवन्यादिकाः सर्वा शीघ्रमानय लक्ष्मण ॥४८॥ मुनेस्तपःप्रभावेण बहवः संति तत्र वै । तथेति लक्ष्मणो गत्वा स्यदनस्थस्त्वरान्वितः ॥४९। अवरुह्य रथाद्वीरः प्रविवेशाश्रमं मुनेः । निवारितः स वटुकैः समाधिविग्मे मुनेः ॥५०। याश्रां कृत्वा शुभा वल्लीः प्राप्स्यसे त्वं न चान्यथा । कालातिक्रमभीत्या स लक्ष्मणेऽपि रघूत्तमम् ॥५१॥ वृत्तं निवेदयामास पुनस्तं राघवोऽब्रवीत् । निवारयित्वा वटुकान् विना शस्त्रैस्त्वरान्वितः ॥५२। आनय त्वं शुभा वल्लीर्मा शङ्कां च मुनेः कुरु । सोऽपि राम ज्ञया गत्वा निवार्य वटुकान् क्षणात् ॥५३ । बलात्कारेण ता वल्लीर्गृहीत्वा राममागतः । भरतं जीवयामास विशल्यं कृत्य सानुजम् ॥५४। ततः समुत्थितं दृष्ट्वा कैकेयी भरतं मुदा । संतोशं परमं चक्रे कैकेयी पितर गदा । ५५॥ राघवं मा समालिंग्य भरतं परिषस्वजे । ततो राजऽतेमदृष्टः समालिंग्य रघुत्तमम् । ५६।

राजाओने बाणोंसे भरतका बांधकर मूर्छित कर दिया और वरथसे गिर पड़े । ३७-३९ ॥ भरत- को पृथ्वीपर गिरा देखकर राजाओने राक्षस शत्रुघ्नको भी विद्ध किया । उनको भी गिराकर वे राज लक्ष्मणकी ओर दौड़े ॥ ४० ॥ उनपर भी बाणोंकी वर्षा करके व्याकुल कर दिया । इसी प्रकार राघव रामको भी राजाओने बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ ४१ ॥ बादमे श्रीरामचन्द्रने समरके मैदानमे पालकियोंकी खिडकियोंमें लगी हुई चिकामैसे देखती हुई कौसल्या आदि माताओंके, सीताके तथा अपने भाइयोंकी स्त्रियोंके समक्ष राजाओ और मन्त्रियाके सामने अपने बड़े भारी धनुषका टंकोर करके उस- पर वायव्यास्त्र चढ़ाकर उससे उन राजाओंको सूख पत्तांकी तरह उड़ाकर समुद्रके किनार फेंक दिया। बाकी लोगोंका रामने महूनास्त्रसे मूर्छित कर दिया ॥ ४२-४४ ॥ हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदलोकी समस्त सेना- को जमीनपर लिटा दिया । रणमें भरतका मूर्छित देख कैकयी हथिनीसे उतरी और उनका गादमें लेकर विलाप करने लगी । तदनन्तर राजा दशरथ तथा उनकी स्त्रिय कौसल्या आदि भी विलाप करने लगी ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ तब रामने सबको आश्वासन देकर कहा-लक्ष्मण ! यहाँस कुछ दूरपर एक तपोषिधि मुद्गलमुनिका आश्रम है । वहाँ जाकर तुम कल्याणकारिणी वर्जपनी आदि बूटियोंको ले आओ ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ मुनिके तपके प्रभावसे वहाँ अनेक प्रकारका जडिय उगी हुई हैं। बहुत अच्छा' कहकर वाट लक्ष्मण रथपर चढ़कर शीघ्र मुनिके आश्रममे गये । वहाँके ब्रह्मचारियोंने उनका बूटिये लेनेसे रोका और कहा कि तुम मुनिके समाधिसे उठनेपर उनसे पूछकर ही बूटियों ले जा सकते हो; - अन्यथा नहीं । समय बीत जानेके डरसे लक्ष्मणने आकर-रामसे सब हाल कहा । रामने फिर कहा कि उन बटुकोंको अस्त्रके बिना हाथसे हटाकर शीघ्र ही उन शुभ जड़ियोंको ले आओ । मुनिसे मत डरो । रामकी आज्ञा पाकर वे वहाँ गये तथा बलप्रयोगके बिना ही वटुकोंको हटाकर उन जड़ियोंको लेकर रामके पास लौट आये । तब रामने भरतके शरीरसे बाण निकालकर उन्हें अहर्दा जीवित किया । भरतको स्वस्थ देखकर कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई । उसने रामका आलिंगन करके भरतको छातीसे लगा लिया । राजाने भी प्रसन्न

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