श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 535, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २० ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१९
न देहेन न निष्कामं तपश्चर्याव्रतं कृतम् । न देहः श्रमितस्तस्य शीतोष्णसहनादिभिः ॥ ९ ॥ एतादृशस्तस्य देहो बहुब्राह्मणहिंसकः । लङ्कायां ज्वलनेऽद्यापि निष्पापां भूयतेऽग्रसः ॥ १० ॥ ज्वालानां भस्त्रवच्छब्दो यः पृष्टो मां त्वया लव । जनशब्दादिने नैव श्रूयतेऽत्र जनैः सदा ॥ ११ ॥ चितायां यस्य चाद्यापि वायुपुत्रेण प्रत्यहम् । काष्ठभारशतं नीत्वा लङ्कायां क्षिप्यते मुहुः ॥ १२ ॥ यदा तस्याघशान्तिः स्यात्तदा भस्मीभविष्यति । अन्यत्ते कारणं वच्मि तच्छृणुष्व द्विजो लव ॥ १३ ॥ देहान्ते रावणेनापि रामाय याचितो वरः । वरेण येन लोकानां स्मरणं मे भविष्यति ॥ १४ ॥ न त्वया मे वरो देयस्तच्छ्रुत्वा राघवोऽब्रवीत् । त्वद्देहज्वलिनी ज्वालाशब्दः सर्वे जना भुवि ॥ १५ ॥ श्रोष्यन्ति सप्तद्वीपेषु तेन ते स्मरणं सदा । भविष्यति हि सर्वेषां ब्रह्मांडान्तनिवासिनाम् ॥ १६ ॥ एवं लब्ध्वा दशास्यः स वरं रामे लयं ययौ । एवं यच्च त्वया पृष्टं तन्मयं कथितं मया ॥ १७ ॥ गुरोरिति वचः श्रुत्वा तं नत्वा स लवोऽपि च । स्वगेहं गतसंदेहः प्रययौ शिविकास्थितः ॥ १८ ॥ एकदा बन्धुभिर्गेहं पुत्राभ्यां सीतया सह । मुनिभिर्गुरुणा रामः संस्थितः प्राह हर्षितः ॥ १९ ॥
श्रीरामचन्द्र उवाच
शृण्वंतु मुनयः सर्वे सर्वे शृण्वंतु बान्धवाः । पुत्रौ सीता मन्त्रिणश्च सखीः शृण्वन्तु मातरः ॥ २० ॥ यथा यथाऽवतारेऽस्मिन् सुखं भुक्तं द्विमान्वयाः । न तथाऽन्येषु सर्वेषु ह्यवतारेषु वै कदा ॥ २१ ॥ अवतारास्तु बहवः शतशोऽथ मया धृताः । नानाकार्याणि वै कर्तुं तेषां संख्या न विद्यते ॥ २२ ॥ सप्तावतारास्तेष्वेव श्रेष्ठाश्चात्र मया धृताः । ईदृशं न सुखं तेषु कदा भुक्तं मया भुवि ॥ २३ ॥ शंखासुरो महादैत्यः पूर्वं जातो महोदधौ । येन वेदा हृताः सर्वे सत्यलोकात् कृते युगे ॥ २४ ॥ तदर्थं मत्स्यरूपेण ह्यवतारो मया धृतः । तं हन्त्वा क्षणमात्रेण विष्णुरूपं मया धृतम् ॥ २५ ॥
चुका था, किन्तु शरीरसे उसने कभी देवताओंको नमस्कार भी नहीं किया ॥ ६ ॥ ॥ ७ ॥ न कभी देवमन्दिरकी सफाई की, न उस शरीरसे तीर्थयात्रा की, न अपने शरीरसे कोई निष्काम तपश्चर्या की और न शीत उष्णको ही सहन करके शरीरसे परिश्रम किया। बहु ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाली उसकी देह आज भी लङ्कामें जल रही है। उसका शब्द प्रत्येक मनुष्यको सुनाई देता है। ज्वालाकी धकधकाहटका निनाद धौंकनीकी तरह सुनाई पड़ता है ॥ ८ ॥ १० ॥ दिनके समय मनुष्योंके कोलाहलमें वह शब्द नहीं सुन पड़ता। वायु की हनुमान्जीको रोज सौ भार लकड़ा उसकी चितामें डालनी पडती है ॥ ११ ॥ १२ ॥ जब उसके पाप नष्ट होंगे, तब कहीं उसका शरीर जलेगा। हे वत्स लव ! मैं एक दूसरा कारण भी बतलाता हूँ सो सुनो। १३ ॥ अपने देहान्तके समय रावणने रामसे यह वरदान माँगा था कि आप मुझे कोई ऐसा वर दीजिए, जिससे संसारके लोग मेरा भी स्मरण किया करें ॥ १४ ॥ रामने कहा कि तुम्हारी देह जलानेवाली आगका धक् धक् शब्द सातों द्वीपोंके हर एक व्यक्तिको सुनाई पड़ता रहेगा। इसीसे सबको तुम्हारी याद आती रहेगी ॥ १५ ॥ १६ ॥ इस प्रकारका वरदान पाकर वह रामके शरीरमें लीन हो गया। इस तरह तुमने हमसे जैसा प्रश्न किया, सो सब कह सुनाया ॥ १७ ॥ गुरुकी बात सुनकर लवका सन्देह निवृत्त हो गया और वे पालकीमें बैठकर अपने घर चले गये ॥ १८ ॥ एक दिन सब भाइयों, पुत्रों सीता तथा गुरुके साथ रामचन्द्रजी बैठे थे। प्रसङ्गवश हर्षित होकर राम कहने लगे -॥ १९ ॥ समस्त ऋषि, मेरे सब भाई, दोनों बेटे, सीता, समस्त मन्त्री और माताएं सब लोग मेरी बात सुनें। २० ॥ मैंने इस अवतारमें सीताके साथ जितना सुख भोगा है, उतना किसी भी अवतारमें नहीं भोगा ॥ २१ ॥ विविध प्रकारके कार्यसाधन करनेके लिए मैंने इतने अवतार लिये, जिनकी कोई संख्या नहीं है ॥ २२ ॥ फिर भी मेरे सात अवतार मुख्य हैं, लेकिन उन सातोंमें भी मैंने इतना आनन्द नहीं पाया ॥ २३ ॥ आजसे बहुत दिनों पहले महोदधिमें एक शंखासुर नामका दैत्य हुआ था जो सत्यलोकसे चारों वेदोंको चुरा ले गया था। उसके लिये मैंने मत्स्यरूप धारण किया और उसे मारकर फिर विष्णुरूपधारी बन गया ॥ २४ ॥ २५ ॥ उस मत्स्य तथा तिर्यक् (वराह) योनिमें कोई विशेष सुख नहीं था।