भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 542, कुल 811 में से

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५२६ आनन्दरामायणे [ सर्गः २१


पूजयामास ताः सर्वा नानालङ्कारभूषणैः । ताः सर्वाः पूजयामासुः सीतां सिंहासनस्थिताम् ॥ ४ ॥
दिक्पालकारवस्त्राद्यैर्नानादेशोद्भवैर्वरैः । परिवार्थ ततः सीतां तस्थुः सर्वाः स्त्रियश्च ताः । ५ ॥
श्रुत्वा सीतामुखाद् रामचरित्राणि महत्तरः । तास्तुष्टाः श्रोतुमुद्युक्तास्तत्पाणिग्रहणं शुभम् ॥ ६ ॥
स्मितास्यास्ताः स्त्रियः सर्वास्तदा प्रोचुर्विदेहजाम् स्वत्पाणिग्रहणोत्साहं श्रोतु मिच्छामहे वयम् ॥ ७ ॥
तत्सर्वं विस्तरेणाद्य ब्रूमहेहि जानकि । इतितासां वचः श्रुत्वा लज्जया जानकी तदा ॥ ८ ॥
स्वां सखीं नोदयामास तुलसीं रुक्मभूषिताम् ।

तुलस्युवाच

शृणुध्वं सकला नार्यः पाणिग्रहणमुत्तमम् । ९ ॥
जानक्याः कथयिष्याद्य महामङ्गलदायकम् । वक्ष्योपाद्यं हि संक्षेपाच्छ्रवणाम्पुण्यवर्धनम् । १०॥
साकेताद्रघुनन्दनेन स मुनिर्भ्रात्रा युतेनाश्रमं स्वं गत्वा विनिहत्य राक्षसबलं तेनैव यज्ञं निजम्
संपाद्याथ रथस्थितश्च मिथिलामार्गे हरेरङ्घ्रिभिः संस्पर्शाद्वनकल्मषां समकरोद्भार्यां मुनेर्गाधिजः । ११ ।
गत्वा गाधिजसंयुतश्च मिथिलां भ्रात्रा समागत्यश्चापाधः पतितं निरीक्ष्य च रिपु स्तोपं मुनेराज्ञया ।
तं नत्वा गिरिजेश्वरस्य च धनुः कृत्वा त्रिखण्डं क्षणांन्माताहस्त विसर्जितां निजगले मालां दधौ राघवः १२
बन्धूनां च निजं विधाय मिथिलापुर्यां विवाहान् शुभान् पितृभ्यां सह भार्यया रघुपती राज्ञाऽतिसंपूजितः
त्यक्त्वा तां मिथिलां ययौ निजपुरीं मार्गे क्रुधा निर्गतो दुर्दर्पं जमदग्निजस्य धनुषा मोपाहरल्लीलया १३॥
एवं नार्यश्च सीताया विवाहः कथितो मया । युष्माभिः कौतुकात्पृष्टो यः सर्वमङ्गलप्रदः ।।१४।।

श्रीरामदास उवाच

एवं स्त्रियम ताः श्रुत्वा परमां मुदमाप्नुयुः । ततस्ताः पूजयामासुः पुनः सीतां मुदान्विताः ॥१५।


सीताने अनेक तरहके भूषणोंसे उनकी पूजा की और उन स्त्रियाने भी सिंहासनपर बिठाकर दिव्य अलङ्काराम सीताका पूजन किया। इसके अनन्तर वे सब सीताका चारा ओरस घेरकर बैठ गयीं । ४ । ५ ॥ सीताके मुखसे रामके महत्ता चरित्र सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुई और उन्हान साताक मुखस ही सीताका विवाहसम्बन्धी वृत्तान्त सुननेकी इच्छा प्रकट की । ६ । वे मुस्कुराता हुई सातास कहने लगीं कि हम आपके विवाह-समारोहका वृत्तान्त सुनना चाहती हैं । ७ । हे सानि ! वह सारा हाल विस्तारपूर्वक हमको सुनाइए। इस प्रकार उनका प्रश्न सुनकर सीता लज्जायश कुछ नही बोली और अपना सहेली तुलसीको जो कि सुवर्णमय आभूषण पहने बैठी थी, संकेत किया और तुलसी कहन लगा — आप लोग साताक मङ्गलमय विवाहका वृत्तान्त सुनै ॥ ८ ॥ ९ । आप लोगांका प्रसन्न करनक लिए उस महामङ्गलदायी और सुननेसे पुण्य बढ़ाने-वाले विवाहका में संक्षेपमे वर्णन करना हूँ ॥ १० ॥ अयोध्यापुरास विश्वामित्र राम और लक्ष्मणको साथ लिये हुए अपने आश्रम पहुँचे। वहाँ राम लक्ष्मणस राक्षसाका प्रवल सेनाका संहार किया और मुनि विश्वामित्रके यज्ञ कर लेनेके बाद रथपर बैठकर मुनिके साथ दोनों भाई मिथिलाकी ओर चले । रास्तेमे विश्वामित्रने रामके चरणोंका स्पर्श कराकर गौतम ऋषिक पत्नी अहल्याको शापसे मुक्त कराया ॥ ११ ॥ फिर मुनिके साथ जनकपुर पहुँचे । स्वयंवरके समय रामने सभाम मुनि विश्वामित्रका आज्ञासे शिवके धनुषको प्रणाम किया और क्षण भरमें उसे तोड़कर तीन टुकड़े कर डाले । फिर सीताके हाथोकी वरमालाको रामने अपने गलेमें धारण किया ॥ १२ ॥ इसके अनन्तर रामन मिथिलापुरीमे ही अपना और अपने सब भाइयोंका विवाह किया। फिर पत्नी, पिता, माता आदिके साथ जनकसे पूजित होकर राम मिथिलासे अयोध्याको चले। रास्तेमें क्रोधी परशुराम मिले और उनके वैष्णव धनुषको चढ़ाकर रामने उनके दुर्दर्पको दूर कर दिया ॥ १३ ॥ हे नारियो ! तुमने कौतुक वश सीताके जिस सर्वमङ्गलप्रद विवाह-वृत्तान्तको पूछा था, सो मैंने कह सुनाया ॥ १४ ॥ श्रीरामदास कहते है कि इस प्रकार सीताके विवाहका वर्णन सुनकर वे स्त्रियां बहुत

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