श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 548, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५३२ आनन्दरामायणे [ सर्गः २२
अग्रेऽप्येवं स्त्रियः सर्वाः करिष्यन्त्यत्र वै भुवि। मत्कार्यदर्शनार्थाय तस्मात्किञ्चित्करोम्यहम् ॥११॥ एवं मनसि निश्चित्य ततः स रघुनन्दनः । हर्षयंश्च गृहं गत्वा पूर्ववज्जानकीं मुदा ॥१२॥ रञ्जयामास विविधैर्नानाच्छाद्यादिकौतुकैः । संप्रदर्श्य पेटिकाश्च सर्वास्तच्चक्रे महन्महः ॥१३॥ आनीय दर्शयामास फलपुष्पादिपूरिताः । रामोऽपि दृष्ट्वा ताः सर्वाः समुद्घाट्य पृथक् पृथक् ॥१४॥ प्रेषयामास भवने गेहेषु दश पञ्च च । फलादीनां पेटिकाश्च नानावाद्यैर्विचित्रिताः ॥१५॥ मातृणां सकलानां च गृहेष्वपि तथा पुनः । गुरुयोः सुहृदां चापि मन्त्रिणां च गृहेस्तथा ॥१६॥ पौराणां चापि गेहेषु सेवकानां गृहेष्वपि । दासीभ्यश्च शुभा दत्त्वा पेटिकाः सप्त पञ्च च ॥१७॥ सीतायै शतशो दत्त्वा मुदा तभ्यो रघूत्तमः। फलानि दश पञ्चाथ स्वयं भुक्त्वा तत परम् ॥१८॥ पद्मादीनि सुपुष्पाणि विभज्य पूर्ववत्पुनः । सीतायै धनशो दत्त्वा स्वयमङ्गीचकार ताम् ॥१९॥ अज्ञात इव तद्वृत्तं गोपयन्मायि चेतसि । अथैकदा जनकजा हरिदिन्यामुपोषणम् ॥२०॥ कृत्वाऽपरे दिने स्नात्वा ययौ वृन्दावनं द्रुतम् । तुलसीं पूजयित्वा तां सा चकार प्रदक्षिणाः । २१॥ एतस्मिन्नन्तरे सीता त्रिगुणाङ्ग श्रमान्विता । त्यक्त्वा प्रदक्षिणामार्गं किंचिदेव चचाल सा ॥२२॥ चलितायाश्च सीतायाः पल्लवेन हि वाससः । पत्रमेकं तुलस्याश्च पपात भुवि वै तदा ॥२३॥ तन्दृष्ट्वा जानकी दृष्ट्वा द्वादश्यां त्रुटितं शुभम् । ज्ञात्वाऽधर्मः कृतश्चेति संप्राप्ताऽऽप्तत्रसा तदा ॥२४॥ ततः सा तत्करेणैव गृहीत्वा पत्रमुत्तमम् । नत्वा वृन्दावनं सीता चिक्षेप पश्चादरात् ॥२५॥ ततः प्रदक्षिणां कृत्वा प्रार्थयित्वा मुहुर्मुहुः । तुलसीं सा ययौ गेहं रञ्जनाय राघवम् ॥२६॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र नारदश्च समाययौ । वीणावाद्यस्वनेनैव कुर्वन्कीर्तनमुत्तमम् ॥२७॥ पालय मां दीनेमिति राघवेति पुनः पुनः । पालय मां दीनेमिति मनुं पञ्चदशाक्षरम् २८॥
लिया । १० । यदि मैं इस समय ना रह जाता हूँ तो सीताके दिखाये हुए मार्गपर चलकर सब स्त्रियाँ ऐसा ही करने लगेंगी। इसलिए मन्ताका हलका करना बचा है । ११ । ऐसा निश्चय करके राम पूर्ववत् सीताके घर पहुंचे ॥ १२ ॥ वहां सदाकी तरह विविध प्रकारके फल-कौतुक करके उन्होंने सीताको प्रसन्न किया। सीताने भी वह सब पिटारियां मँगवाकर उनके आगे रख दीं। वे सब नाना प्रकारके फलों फूलोंसे भरी थीं। रामने भी उन्हें अलग-अलग खोलकर देखा । १३ । १४ । उनमेंसे पन्द्रह पिटारियाँ भाइयोंके यहाँ भिजवा दीं। इसके बाद सब माताओंके पास भेजीं। तथा वैसी ही जोड़ों सुग्रीवादि के, मन्त्रियों, गुरुजनों, पुरवासियों, सबको तथा दासियोंके घर भी पांच सात पिटारियाँ भिजवायीं । इसके अनन्तर सैकड़ों पिटारियां सीताको दीं और उनमेंसे स्वयं भी दस पाँच फल निकालकर खाए ॥ १५ ॥ १८ ॥ इसके बाद कमल आदि श्रेष्ठ-श्रेष्ठ फूलोंका पूर्ववत् विभक्त करके सैकड़ों फूल सीताका दिये और स्वयं भी लिये ॥ १९ ॥ किन्तु सीताने रामकी शपथ दिला दी थी अतः मुंह मूंद लिया था उस बातको जानते हुए भी राम अनजान जैसे बन रहे। इसके अनन्तर एक दिन सीताने एकादशीका व्रत किया २०। दूसरे दिन वे वृन्दावन ( तुलसीका बगीचा ) में गयीं। वहाँ तुलसीकी पूजा करके प्रदक्षिणा करने लगीं ॥ २१ ॥ उस समय एकादशीका व्रत करनेसे उन्हें थकावट-सी लगी थी। उसस प्रदक्षिणाका मार्ग छोड़कर वे दूसरी ओर चलने लगीं ॥ २२ ॥ चलते-चलते सीताके कपड़ेका पल्ला लगनेसे तुलसीका एक पत्र टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २३ ॥ द्वादशीके दिन उस गिरे पत्रको देखकर सीताने सोचा—'ओह ! मैनें बड़ा भारी अधर्म कर डाला' यह सोचकर वे कुछ भयभीता-सी हो गयीं ॥ २४ ॥ इसके पश्चात् सीताने वह पत्र उठा लिया और उसे प्रणाम करके आदरसे उसी वृन्दावनमें फेंक दिया ॥ २५ ॥ ऐसा करनेके बाद प्रदक्षिणा करके बारम्बार प्रार्थना की, फिर महलमें जाकर रामचन्द्रजीका मनोरंजन करने लगीं ॥ २६ ॥ इसी समय वीणा बजाते और हरिकीर्तन करत हुए नारदजी वहाँ आ पहुँचे ॥ २७ ॥ वे आते ही "मुझ दीन-