भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः २२ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५३७

विद्रूपं जितभूरूपं नतसद्दिक्पं नतमद्रूपं सप्तद्वीपजवर्षजकामिनिसन्नीराजितपृथ्वीपम् । नानापार्थिवनानौपायनमभ्यर्चिततोषितमद्रूपं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ॥९४॥ सत्सेव्यं मुनिभिर्गेयं कविभिः स्तुत्यं हृदि संधार्यं नानापण्डिततर्कपुराणजवाक्यादिकृतसत्काव्यम् । साकेतस्थितकौसल्यासुतगन्धाद्यङ्कितमद्भालं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ॥९५॥ भूपालं घनसन्नीलं नृपसद्बालं कलिमञ्जालं सीताजानिवरोत्पललोचनमन्त्रीमोचितसत्कालम् । श्रीमतीवरुतोपाय्यास्वादनसम्यक्शिक्षितसत्कालं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ९६॥ हे राजन् नवभिः श्लोकैर्भुवि पापघ्नं नवकं रूपं मे बुद्धया कृतमुत्तमन्तनमेतद्राघव मन्वीनाम् । स्त्रीपौत्रान्नादिकक्षेमप्रदमस्मन्मन्दरदक्षालं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ॥९७॥

श्रीरामचन्द्र उवाच

एवं स्तुत्वा रमानायं राघवं भक्तवत्सलम् । प्रणम्याज्ञां प्रभोः प्राप्य प्रययौ नारदो मुदा ॥९८॥ अमरा मुनयः सर्वे जग्मुस्ते स्वस्थलानि वै । एवं श्रीरामचन्द्रेण नररूपधरेण च ॥९९॥ कौतुकानि विचित्राणि कृतानि जगतीतले । कस्तान्वत्र क्षमो वक्तुं विस्तरेण द्विजोत्तम ॥१००॥ तेषु यद्यद्राघवेण स्मारितं स्निह वै मम । तत्प्रकथ्यते शिष्य तवाग्रे राघवोत्तम ॥१०१॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे सीतया तुलसीपत्रप्रसाधनं नाम द्वाविंश सर्ग ॥ २२ ॥


प्रभु वाल्मीकिसे नमस्कृत, प्रसन्न सीताके द्वारा लालित, दानीश पृथ्वीश, भ्रमरहारी, योगीन्द्राम नमस्कृत, जगतोके पालक और विशाल तालवृक्षोको काट गिरानेवाले रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । ९३ । विद्रूप, अच्छे-अच्छे राजाओको भी परास्त करनेवाले, अच्छे-अच्छे दिक्पालानसे नमस्कृत, बड़े-बड़े राजाओसे नमस्कृत, सप्तद्वीप तथा समस्त देशम उत्पन्न नारियोंसे नीराजित, पृथ्विके पालक, अनेक राजाओके द्वारा अनेक प्रकारके उपहार देकर प्रसन्न किये गये राजा राम जिन्होंने विशाल तालके वृक्षोको काट गिराया था, उन रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९४ ॥ जो मुनियोंके सेव्य, मत्रियोंमें गेय, हृदयमें धारण करने योग्य, अनेक पंडितों द्वारा विविध प्रकारके तर्क पुराण तथा काव्योमें संस्कृत एवं साकेत-निवासिनी कौसल्याके पुत्र हैं और गन्धादि द्रव्योंसे जिनका मस्तक अर्चतस है, सात तालके वृक्षोको काट गिरानेवाले आप रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९५ । भूपाल, मेघके समान श्यामस्वरूप, महाराज दशरथके अच्छे पुत्र, पापोंके लिए कालस्वरूप सीतापति, सुन्दर, कमलकी नाईं वालोवाले प्रबल कामके जालसे अपने मन्त्राको तत्काल छुड़ानेवाले पतिको बिना अर्पण किये कमलका फूल सूंघ लेनेपर सीताको भलीभांति शिक्षाके दाता, विशाल तालके वृक्षोंको काट गिरानेवाले उन रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९६ ॥ हे राजन् संसारके दायिनांका पाप नष्ट करनेवाले इन नौ श्लोकोंसे मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार आपकी स्तुति का है। मेरे वरदानसे यह स्तुति स्त्री-पुत्र आदि सब वस्तुओंको देनेवाली होगी। विशाल तालके वृक्षोका भेदन करनेवाले रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९७ ॥ श्रीरामदासने कहा— इस प्रकार भक्तवत्सल, रमानाथ, राघव, रामचन्द्रकी स्तुति करके और उनसे आज्ञा लेकर नारदजी प्रसन्नतापूर्वक यहाँसे विदा हुए ॥ ९८ ॥ तब सब देवता तथा मुनिगण भी अपने-अपने स्थान-को चले गये । नररूपधारी रामचन्द्रने ऐसे-ऐसे कितने ही कौतुक किये हैं। हे द्विजोत्तम ! विस्तारपूर्वक उनका वर्णन करनेके लिए इस संसारमें कौन समर्थ हो सकता है ? ॥ ९९ ॥ १०० । उन चरित्रामेसे स्वयं रामचन्द्रजीने जो जो चरित्र हमें स्मरण कराया है वह-वह उन्हींकी आज्ञासे मैंने तुम्हारे आगे कहा है ॥ १०१ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषा-टीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥