श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 555, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग २३ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३९
तः परस्परं श्रुत्वा राजदूताः सहस्रशः । नानादेशेषु सर्वत्र वार्तेनेऽपि तदा सुता ॥१६॥ राजसेवां परित्यज्य अगमंस्ते स्वगृहाणि हि । ततः सर्वे स्वगृहेष्वानन्दरामायणस्य च ॥१७॥ केचित्पारायणं चक्रुः केचित्छ्रवणं मुदा । कचित्पठनं राजन् केचिच्चक्युश्च कीर्तनम् ॥१८॥ केचिच्चक्युश्च व्याख्यामेवं तन्निष्टमानसाः । बभूवुः सकला दूताः कोटिशो जगतितले ॥१९॥ तदा केन धनं लब्धं केन लब्धं महद्धनम् । केन राजपदं लब्धं केन लब्धं गृहं वरम् ॥२०॥ केन ग्रामाधिकारश्च केन लब्धा कपिर्बरा । केन वृत्तिः शुभा लब्धा केन स्वर्गे मनोरथः ॥२१॥ केन लब्धं तु पाताल केनांशा विविधाः शुभाः । लब्धं कैश्चिन्मखपदं लब्धं स्वर्गे मनोरथम् ॥२२॥ केचिदिन्द्रपदं प्राप्ताः केचिदग्निपुरं गताः । केचिद्ये धर्मराजस्य लोकं वा निर्ययुस्त्वपि ॥२३॥ वरुणस्याथ वायोश्च कुबेरस्येश्वरस्य च । लोकान् जग्रमुस्तदा दूतास्तद्गुताभिकामवत् ॥२४॥ केचिन्जाम्बूपदलोकं केचित्सुवपदं गताः । केचिते ब्रह्मलोकं च वैकुण्ठं चापि केचन ॥२५॥ एवं यथा यस्य पुण्यं दूतस्यान्यजनस्य च । आनन्दरामचरितपाठश्रवणतश्चभूत् ॥२६॥ तथा तस्य गतिर्जाता सर्व एवातरातले । तदा कोऽपि न राज्याद्योदूतो देशान्तरेष्वपि ॥२७॥ त्यक्त्वा सेवां समस्ताश्च राजरस्याथ ते गताः । रामं दृष्ट्वा गताः केचिदपृष्ट्वैव गताः परे ॥२८॥ एवं सर्वत्र देशेषु दूताभावोऽभवत्तदा । एकदा राघव द्रष्टुं गन्तुं सर्वे नृपास्तथाः ॥२९॥ सैन्यान्याज्ञापयामासु र्स्थानानि तु पृथक्पृथक् । तदा कुत्रापि सैन्यानि ददृशुर्न नृपासमाः ॥३०॥ आः किमेतदिति प्रोक्तवास्त्वहूद्भिः सुतादिभिः । दद्युस्ते राघवं द्रष्टुं विस्मयाविष्टमानसाः ॥३१॥ तावागतान्नृपान् ज्ञात्वा नान्पुरा गन्तुमादरात् । आकारयन्स्वसैन्यानि न तदा प्राप लक्ष्मणः ॥३२॥
मन्त्रियेश्वर बिदा किया। यह घटना एक अद्भुत प्रकारका घट गया ॥ १४ ॥ व १५ ॥ फिर क्या था, जब रामके दूतोंका यह खबर मिला तो सब राजपुत्र तथा अन्यान्य दूतगण दूताङ्ग दूत प्रसन्नतापूर्वक अपना अपना नौकरी छोड़कर घर चले गये। परस्पर पूछकर आनन्दरामायणका पाठ करना प्रारम्भ किया ॥ १६ ॥ १७ ॥ कुछ इसे दूसरेके मुखसे सुनने लगा, कुछ इसका पारायण करने लगे और कुछ लोग इसके संकीर्तनमें लग गये ॥ १८ ॥ कुछ लोग इसकी व्याख्या करने लगे और कुछन लोग आत्म भावना चित्तवृत्ति हटाकर इसी आनन्दरामायणमें लगा दी। इस तरह राजमज छोड़कर आनन्दरामायणका आधार रखनेवालोंकी संख्या संसारके कण्टाकके समान हो गयी ॥ १९ ॥ ऐसा प्रभाव हुआ कि फल मिला, कुछ बहुत अधिक सम्पदा मिली, किसीको राज्यपद प्राप्त हुआ और किसका उच्चकोटिका घर मिला ॥ २० ॥ कुछका ग्रामका अधिकार मिला, किसको अच्छी सती मिली, किसीको सुन्दर आजीविका मिली और जिसका मनोरथ स्वर्गलोक प्राप्त हुआ ॥ २१ ॥ किसको पाताललोक मिला और कुछ लोगोंको विविध प्रकारके अच्छे अच्छे लोक प्राप्त हुए और कुछ लोगोंको सूर्यलोक मिला ॥ २२ ॥ कुछ लोगोंको इन्द्रपद प्राप्त हुआ, कुछ अग्निदेवताका रूप, कुछ धर्मराजके लोक तथा कितने ही लोग निर्ऋतिदेवका लोक बन गये ॥ २३ ॥ कुछ वरुणलोकका, कुछ वायुलोकका, कुछ चन्द्रलोकका, कुछ सूर्यलोककी, कुछ ब्रह्मलोकका तथा कुछ लोग वैकुण्ठलोकमें जा पहुंचे ॥ २४ ॥ २५ ॥ इस तरह आनन्दरामायणके पाठसे उन दूतों तथा अन्य लोगोंको भी वे ही लोक प्राप्त हुए, जिनका जैसा पुण्य था। इस प्रकार पृथ्वीलोकमें सबका शुभ गति प्राप्त हुई। उस समय अयोध्या तथा देशान्तरमें भी कोई सिपाही नहीं रहा ॥ २६ ॥ २७ ॥ सब रामके यहां सेवा त्याग हटाकर चले गये थे। उनमेंसे कुछ लोग तो रामसे पूछकर गये थे, कुछ बिना पूछे-जांचे ही चले गये ॥ २८ ॥ इस तरह उस समय सारा देश दूतविहीन हो रहा था। एक बार संसारके जितने अच्छे-अच्छे राजे थे, वे सब रामचन्द्रजीके दर्शनमें जानेके लिये तैयार हुए। उन्होंने जब साथ चलनेके लिए सेना बुलायी तो पता चला कि सेना है ही नहीं ॥ २९ ॥ ३० ॥ यह खबर पाकर राजा लोग कहा-आहू, यह क्या हुआ, विस्मितभावसे वे अपने-अपने मित्रों और पुत्रोंको साथ लेकर अयोध्या आये ॥ ३१ ॥ जब श्रीरामके सन्मुखका यह सम्बाद मिलना