श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 566, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५६० आनन्दरामायणे [ सर्गः २४
न कर्तव्यो रिपूणां च विश्वासश्च कदाचन । कार्पण्यं नैव कर्तव्यं दानकर्मसु सर्वदा ॥१२२॥ न द्यूतेन क्वचित् कार्यो क्रीडा दारिद्र्यसूचिनी । न श्रोतव्या कदा वार्त्ता मद्यानां च नरोत्तमैः । १२३ तीर्थयात्रा सदा कार्या कृच्छ्रकृच्छ्रादि ममाचरेत् । कार्यं लिंगार्चनं नित्यं कोटिलिङ्गानि श्रावणे ॥१२४॥ कर्त्तव्यानि नरोत्कन्या मठेष्वाप च कारयेत् । लघुरुद्रान्महारुद्रानतिरुद्रान्ममादरेत् ॥१२५॥ दानानि पुस्तकनां च कर्तव्यानि निरन्तरम् । कीर्तनानि च कार्याणि देवगारेषु वा गृहे ॥१२६ साधूनां पूजनं कार्यं नमस्कार्यः सदा रविः । ग्रामे ग्रामे वायुपुत्रप्रतिमाः सर्वदा पृथक् ॥१२७॥ सिन्दूराक्ताश्च तैलाक्ताः पूजनीया निरन्तरम् । चतुर्थ्यां गणराजस्य पूजनानि प्रकारयेत् ॥१२८। अपयेद्गणराजाय मोदकान्पूलपूरितान् । पञ्च खाद्यानि सिंदूरदूर्वादिन्यर्पयेन्मदा ॥१२९॥ सदाऽऽत्मचर्चा कर्त्तव्या स्तोत्रपाठान्प्रकारयेत् । गीतायाः पठनं वेदानध्यापयेन्मदा । १३०। सदैव शान्तिसूक्तानि पुण्यसूक्तान्यनेकशः । पुण्यं पुरुषसूक्तं च श्रीसूक्तादीनि वै पठेत् ॥१३१॥ सदा धर्मे मतिः कार्या कार्यों धर्मस्य संग्रहः । दुष्टबुद्धिः सदा त्याज्या पातकं परिमार्जयेत् । १३२। ज्ञातव्यं चपलं चायुः क्रूरो ज्ञेयो यमो महान् । दारुणा नारकी पीडा स्मर्त्तव्या हृदि सर्वदा ॥१३३॥ गतस्तातो मृता माता गतश्च प्रपितामहः । पितामहो गतश्चेति गमनं स्वं निरीक्षयेत् ॥१३४। गतं यथाऽत्र बालित्वं तारुण्यं च गतं यथा । यथा गच्छति वार्द्धक्यं स्मरेच्चै यमशासनम् ॥१३५।
और नौकरोंका सदा पालन करता रहे । अपने कलत्राणको प्रसन्न रक्खे । मित्रपर कोप न करे । १२१ ॥ कभी भी शत्रुपर विश्वास न करे और दानादि कर्मोंमें कभा कृपणता न करे । कभा जुआन खेले । क्योंकि यह दरिद्रता-को पास बुलानेवाला रोग है । अच्छे लोग कभी भांगकी बात भी न सुनें ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ सदा तीर्थों की यात्रा करे और कभी कभी कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत भा किया करे । प्रतिदिन शिवलिंगका पूजन करे और श्रावणम, सम एक करोड़ शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करे ॥ १२४ ॥ बन पड़े तो सदा ऐसा करे । लघुरुद्र, महारुद्र एवं अतिरुद्र इन तीनों यज्ञोंको बराबर करता जाय ॥ १२५ ॥ निरन्तर पुस्तकदान करे । घरमें अथवा देवालयमें जाकर प्रतिदिन कीर्तन करे ॥१२६॥ सब काल साधुओंका पूजन और प्रतिदिन सूर्यको नमस्कार करे । गाँव-गाँवमें हनुमान्जीकी मूर्तियाँ रक्खा जायें । १२७ ॥ तेलमें मिला सिन्दूर लगाकर नित्य उनकी पूजा की जाय । प्रत्येक चतुर्थी तिथिको गणेशजी का पूजन किया जाय । १२८ ॥ मोदक तथा पूरनपूरी आदि पकवान बनाकर गणेशजीको अर्पण करे और सिन्दूर-दूर्वा आदि भी चढ़ाये । १२९ ॥ प्रतिदिन आत्मज्ञान-सम्बन्धी चर्चा, स्तोत्रपाठ, गीताका अध्ययन तथा वेदोंका अध्ययन-अध्यापन करता रहे ॥ १३० ॥ नित्य शान्तिसूक्त तथा श्रीसूक्त आदिका पाठ किया करे ॥ १३१ ॥ सदा अपनी बुद्धि धर्ममें स्थित रक्खे और धर्मका संग्रह करता चले । दुष्ट बुद्धिका परित्याग करे और किये हुए पापोंसे छूटनेका उपाय करता रहे ॥ १३२ ॥ आयुको चंचल तथा यमराजको महाक्रूर समझे । नरककी दारुण पीड़ाओंका सदा स्मरण करता रहे ॥ १३३ ॥ यह सोचता रहे कि पिताजी चल गये, माता मर गयी, पितामह और प्रपितामह भी चल बसे, अब हमारी बारी है । जिस तरह बाल्यकाल गुजर गया, तरुणाई बीत गयी, उसी तरह यह बुढ़ा-