श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 567, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ६५१
गता दंता गते नेत्रे श्लथा जाता त्वगत्र हि । कृष्णकेशाः सिता जाता मृत्युर्ज्ञेयः पुरःस्थितः ॥१३६॥
दाने विलंबो नो कार्यः कार्यं चित्तं सुनिर्मलम् । तुषद्वच्च धनं देयं मा कार्पण्यात्प्रसङ्गत्वम् ॥१३७॥
एवं श्रीरामदूतास्ते सप्तद्वीपांतरस्थितान् ।
श्रावयित्वा गधवाज्ञां महादुंदुभिनिःस्वनैः ॥१३८॥
अयोध्यां स्वां ययुः सर्वे रामं वृत्तं न्यवेदयन् ।
संश्राविता तवाज्ञास्मिन्नाज्ञा भग्नान् जनान्मुहुः ॥१३९॥
सप्तद्वीपेषु सर्वत्र दुंदुभीनां महास्वनैः । दत्तेशं वचनं श्रुत्वा रामस्तुष्टोऽभवत्तदा ॥१४०॥
एवं रामेण भूम्यां हि चरित्राणि महान्ति च । आचरित्राण्यनेकानि कस्तान्प्रवक्तुं वदिष्यति ॥१४१॥
एवं शिष्य मया प्रोक्तं राज्यकांडं मनोहरम् ।
चतुर्विंशत्सुवर्गैश्च महामङ्गलकारकम् ॥१४२॥
राज्यकांडं नृपा यत्र पठन्ति भक्तिसत्पराः । न ते राज्यात्परिभ्रष्टा भवन्ति हि कदाचन ॥१४३॥
राज्यकांडं महापुण्यं महामांगल्यदायकम् । ये शृण्वंति नरा भूम्यां ते मांगल्यं भजन्ति हि । १४४॥
एकैकरधितैः सर्गेरैकैकेन क्षयेन च । मन्त्रवत्पंचाशिद्दिनानुष्ठानं सुसिद्धिदम् ॥१४५॥
आधिपत्यं नराः प्राप्य राज्यकांडं पठन्ति ये ।
आधिपत्यान्परिभ्रष्टा न भवन्ति कदाचन ॥१४६॥
राज्यकांडं पठित्वा तु रणे वादे जयो भवेत् । शरणं शत्रवः शीघ्र यान्त्येतत्कवचादिना । १४७॥
आनन्दरामायणमध्यमार्थं ये राज्यकांडं मनुजाः पठन्ति ।
राज्याच्च्युता राज्यपदं लभन्ते भवन्ति भ्रष्टा न तु ते पदस्थाः ॥१४८॥
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं तत्रापि कांडेपु विचित्रमुत्तमम् ।
श्रीराज्यकांडं परमं सुखौघ्यदं महाऽतिभक्त्या श्रवणोपमादगात् ॥१४९॥
अवस्था भी चली जायगी, यह सोचकर यमके कठोर शासनका स्मरण करे ॥ १३४ ॥ १३५ ॥ दांत टूट गये, आँखोंसे कम सूझने लगा, शरीरके चमड़े ढीले पड़ गये और काले-काले बाल श्वेत हो गये । तब यह समझे कि अब मृत्यु सामने आकर खड़ा है ॥ १३६ ॥ दानमें विलम्ब न करे और अपना चित्त निर्मल रक्खे । भूसीकी तरह समझकर धनका दान करे । कंजूस बनकर उसकी रक्षा न करे ॥ १३७ ॥ इस तरह सातों द्वीपोंमें रहनेवालोंको रामकी आज्ञा सुनाकर वे दूत रामके पास लौट गये और उनको सब समाचार सुनाते हुए कहने लगे- हे राघव ! हमने सप्तद्वीपके निवासियोंको दुन्दुभीकी गर्जनाके साथ आपकी आज्ञा सुना दी । उनकी बात सुनकर राम प्रसन्न हुए ॥ १३८-१४० ॥ इस प्रकार रामने इस पृथिवीतलपर कितने ही बड़े-बड़े काम किये । उन सबको पूरी तरह बतलानेवाला कौन है ? ॥ १४१ ॥ हे शिष्य ! इस रीतिस मैंने तुम्हें चौबीस सर्गोंमें महा मङ्गलकारक मनोहारी राज्यकाण्ड सुनाया ॥ १४२ ॥ भक्तिपरवर होकर राजा लोग यदि इस राज्यकाण्डको पढ़ेंगे-सुनेंगे तो वे कभी भी अपने-अपने राज्यसे च्युत न होंगे ॥ १४३ ॥ यह राज्यकाण्ड बड़ा पवित्र और महामङ्गलदायक है । जो मनुष्य पृथिवीतलपर इसे सुनेंगे, उनका सदा कल्याण होगा ॥ १४४ ॥ प्रतिदिन एक-एक सर्ग बढ़ाता हुआ और पूरा होनेपर एक-एक कम करता हुआ यदि इसका अनुष्ठान करे तो यह सब प्रकार-की सिद्धियां प्रदान करता है ॥ १४५ ॥ कहींका आधिपत्य पाकर जो इसका पाठ करते हैं, वे अपने आधिपत्यसे कभी भी भ्रष्ट नहीं होते ॥ १४६ ॥ राज्यकाण्डका पाठ-पूजन आदि करनेसे शत्रु शीघ्र अपनी शरणमें आ जाते हैं ॥ १४७ ॥ आनन्दरामायणके अन्तर्गत इस राज्यकाण्डको जो लोग पढ़ते हैं वे यदि राज्यसे भ्रष्ट हो गये हों तो फिर राज्याधिकारी हो जाते हैं । फिर कभी वे उससे भ्रष्ट नहीं होते ॥ १४८ ॥ पहले तो आनन्दरामायण ही उत्तम है, फिर उसके सब काण्डोंमें यह राज्यकाण्ड उत्तम है । यह हर तरह सुखदायक