श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 573, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६५७
प्रविश्य तु महारण्यं रामो गजबलैश्वरः । विराधं राक्षसं हत्वा सुभगं ददर्श सः ॥ ४१ ॥ सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च ह्यगस्त्यभ्रातरं तथा । अगस्त्यवचनाच्चैव जग्राहैन्द्रं शरासनम् ॥ ४२ ॥ खङ्गं च परमप्रीतस्तूणी चाक्षयसायकौ । वनेष्ववसतस्तस्य समञ्च वनचरैः सह ॥ ४३ ॥ ऋषयोऽभ्यागमन् सर्वे वधाया सुररक्षसाम् । स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां वधाय च ॥ ४४ ॥ प्रतिज्ञातश्च रामेण वधः संयति रक्षसाम् । ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासिनाम् ॥ ४५ ॥ तेन तत्रैव वसता जनस्थाननिवासिनी । विरूपिता शूर्पणखा राक्षसी कामरूपिणी ॥४६॥ ततः शूर्पणखावाक्यादुद्युक्तान् सर्वराक्षसान् । खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ॥४७॥ निजघान रणे रामस्तेषां चैव पदानुगान् । वने तस्मिन्निवासराञ्जनस्थाननिवासिनाम् ॥४८॥ रक्षसां निहतान्यासन्सहस्राणि चतुर्दश । ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥४९॥ सहायं वरयामास मारीचं नाम राक्षसम् । वार्यमाणः सुबहुशो मारीचेन स रावणः ॥५०॥ न विरोधो बलवता क्षमो रावण तेन ते । अनादृत्य तु तद्वाक्यं रावणः कालचोदितः ॥५१॥ जगाम सहमारीचस्तस्याश्रमपदं तदा । तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ ॥५२॥ जहार भार्यां रामस्य हत्वा गृध्रं जटायुषम् । गृध्रं च निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम् ॥५३॥ राघवः शोकसंतप्तो विललापाकुलेन्द्रियः । ततस्तेनैव शोकेन गृध्रं दग्ध्वा जटायुषम् ॥५४॥ मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं स ददर्श ह । कबन्धं नामरूपेण विकृतं घोरदर्शनम् ॥५५॥ तं निहत्य महाबाहुर्ददाह स्वगतश्च सः । स चास्य कथयामास शबरीं धर्मचारिणीम् ॥५६॥ श्रमणां धर्मनिपुणामभिगच्छेति राघव । सोऽभ्यगच्छन्महातेजाः शबरीं शत्रुसूदनः ॥५७॥ शबर्या पूजितः सम्यग्रामो दशरथात्मजः । पम्पातीरे हनुमता सङ्गतो वानरेण ह ॥५८॥
राम वहाँ नित्य गन्धर्वादिसे पूजित होकर दण्डकारण्यको चल पड़े ॥ ३९ । ४० ॥ कमलोंके सदृश नेत्रवाले रामने उस महा वनमें जाकर विराधको मारा और सुभगको पवित्र किया । ४१ ॥ उस वनमें सुतीक्ष्ण, अगस्त्य तथा अगस्त्यके भाई अगस्तिसे मिले। वहीं इन्द्रके दिये हुए इन्द्रधनुष, तलवार, तरकस तथा बाण ग्रहण किये और वनचरोंके साथ निवास करने लगे ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ एक दिन वहाँके सब ऋषि राक्षसोंके वधका अनुरोध करनेके लिये रामके पास आये। तदनन्तर रामने दण्डकारण्यनिवासी उन अग्निके समान तेजस्वी ऋषियोंके सम्मुख युद्धमें सब राक्षसोंका वध करनेकी प्रतिज्ञा की ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ वहीं ही रामने जनस्थाननिवासिनी तथा कामरूपिणी राक्षसी शूर्पणखाकी नाक-कान काटकर कुरूप किया ॥ ४६ ॥ तदनन्तर रामने शूर्पणखाके दुःखसे आये हुए खर-त्रिशिरा सहित खर, त्रिशिरा तथा दूषणादि राक्षसोंको मारा और जनस्थाननिवासी चौदह हजार राक्षसोंको यमलोक पहुँचा दिया। इस प्रकार अपनी जातिका संहार होना सुनकर रावण क्रोधसे मूर्च्छित हो गया और उसने सहायताके लिए मारीच नामक राक्षसको बुलाया। मारीचने अनेक प्रकारसे समझाते हुए कहा- हे रावण ! बलवान्के साथ विरोध करना ठीक नहीं है, किन्तु कालप्रेरित रावणने उसकी एक भी बात नहीं मानी और उसके साथ रामके आश्रमपर पहुँचा। वहाँ वह मायावी मारीच मृग बनकर राजा दशरथके पुत्र राम और लक्ष्मणको दूर भगा ले गया । ४७-५२। इसी बीचमें रावण जटायु नामके गिद्धको मारकर रामकी भार्याको हर ले गया। गिद्धको मरा हुआ देख एवं सीताका हरण सुनकर राम अत्यन्त संतप्त होकर विलाप करने लगे और उसी शोकावस्था में जटायुको अपने हाथोंसे जलाकर परम पद पहुँचाया ॥ ५३ । ५४ । वनमें सीताकी खोजमें ढूँढ़ते रामने एक महाभयङ्कर तथा विचित्र रूपवाले कबन्ध नामक राक्षसको देखा ॥ ५५ ॥ महाबाहु रामने उस मारकर जला दिया। जब वह स्वर्गको जाने लगा तो उसने धर्मचारिणी शबरीका पता बताया ॥ ५६ ॥ और कहा-हे राघव ! वह धर्मनिपुणा श्रमणा नामकी शबरी है, आप उसके पास जाइये। तदनुसार महातेजस्वी एवं शत्रुविनाशकारी रामचन्द्रजी शबरीके पास गये ॥ ५७ ॥ शबरीने रामका बड़ा आदर किया। वहींसे पम्पासरोवरपर जाकर राम हनुमान्जीसे मिले ॥५८॥