भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५५८ आनन्दरामायणे [सर्गः १

हनुमद्वचनाच्चैव सुग्रीवेण समागतः। सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबलः ॥५९॥ आदितस्तद्यथावृत्तं सीतायाश्च विशेषतः। सुग्रीवोऽपि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानरः ॥ ६०॥ चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम्। ततो वानरराजेन वैरानुकथनं प्रति ॥६१॥ रामायावेदितं सर्वं प्रणयाद्दुःखितेन च। प्रतिज्ञातं च रामेण तदा वालिवधं प्रति ॥६२॥ वालिनश्च बलं तत्र कथयामास वानरः । सुग्रीवः शक्तिमथापीक्ष्य वीर्येण राघवे ॥६३॥ राघवप्रत्ययार्थं तु दुन्दुभेः कायमुत्तमम्। दर्शयामास सुग्रीवो महापर्वतसन्निभम् ॥६४॥ उत्स्मयित्वा महाबाहुः प्रेक्ष्य चास्थि महाबलः। पादाङ्गुष्ठेन चिक्षेप संपूर्णं दशयोजनम् ॥६५॥ बिभेद च पुनस्तालान्सप्तैकेन महेषुणा। गिरिं रसातलं चैव जनयन्प्रत्ययं तदा ॥६६॥ ततः प्रीतमनास्तेन विश्वस्तः स महाकपिः। किष्किन्धां रामसहितो जगाम च गुहां प्रति ॥६७॥ ततोऽभर्जद्धरिवरः सुग्रीवो हेमपिङ्गलः। तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वरः ॥६८। अनुमान्य तदा तारां सुग्रीवेण समागतः । निजघान च तत्रैनं शरेणैकेन राघवः ॥६९॥ ततः सुग्रीववचनाद्धत्वा वालिनमाहवे। सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत् ॥७०॥ स च सर्वान्समानीय वानरान्वानरर्षभः । दिशः प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम् ॥७१ । ततो गृध्रस्य वचनात्सम्पातेर्हनुमान्बली । शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे लवणार्णवम् ॥७२। तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम्। ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकां गताम् ॥७३। निवेदयित्वाऽभिज्ञानं प्रवृत्तिं च निवेद्य च । समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम् ॥७४। पञ्च सेनाग्रगान्दृष्ट्वा सप्त मन्त्रिसुतानपि। शूरमक्षं विनिष्पिष्य ग्रहणं समुपागमत् ॥७५॥

हनुमान्‌जीके कहनेपर राम सुग्रीवसे मिले और महाबली रामचन्द्रजीने उसे अपना सारा हाल कह सुनाया ॥ ५९॥ रामने भी शुरूवसे अपना सब वृत्तान्त कहा और सीताहरणका हाल विशेषरूपसे वर्णन किया । सो सुनकर सुग्रीवने प्रसन्नचित्तसे अग्निको साक्षी देकर रामसे मित्रता की और वानरराज सुग्रीवने भी बालिके साथ अपने वैरका हाल बतलाया ॥ ६०। ६१ । दुःखित सुग्रीवने बड़ी नम्रता तथा प्रेमपूर्वक रामसे अपना सब हाल कहा। यह सुनकर रामने बालिका मारनका प्रण किया । ६२। तब सुग्रीवने बालिके बलका वर्णन किया क्या कि उसे सन्देह था कि वे बालिका भार सकेंगे या नहीं ॥ ६३ । तत्पश्चात् सुग्रीवने रामकी परीक्षा लेनेके लिए पर्वतके समान लम्बा चौड़ा दुन्दुभि राक्षसका कङ्काल दिखाया ॥ ६४ ॥ महाबाहु रामने मुस्कराकर उसे देखा और उस राक्षसके ठठंगोका पैरके अँगूठेसे उठाकर दश योजन दूर फेंक दिया ॥ ६५ ॥ फिर सात तालके वृक्षोंको एक ही बाणसे काट तथा पर्वत और रसातलको भेदकर उस वक्त हृदयमें यह दृढ़ विश्वास उत्पन्न कर दिया कि हम वालिको मारनस समर्थ हैं । ६६ । रामके पराक्रमको देखा तो विश्वास करके सुग्रीव बड़ी प्रसन्नतापूर्वक रामके साथ किष्किन्धा नामके पर्वतकी गुफाके द्वारपर पहुंचा ॥ ६७ ॥ वहाँ पहुंचकर सुवर्णके समान पीतवर्ण वानरश्रेष्ठ सुग्रीवने घोर गर्जना की । उस भयङ्कर गर्जनको सुनते ही बन्दरोंका राजा बालि किष्किन्धाके बाहर निकल आया । ६८ ॥ उस समय ताराकी बात न मानते हुए और उसका अनादर करके बालि सुग्रीवके साथ युद्ध करनेके लिए आया और एक ही बाणसे उसे रामने यमपुर पहुंचा दिया । ६९ । सुग्रीवसे की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार वचनबद्ध होनेके कारण रामने बालिकी मृत्युके पश्चात् किष्किन्धाका राज्य सुग्रीवको दे दिया ॥ ७० । इसके अनन्तर कपिराज सुग्रीवने सीताका पता लगानेके लिए दसों दिशाओमें व सम बंदरोंको भेजा ॥ ७१ ॥ सम्पाती गिद्ध द्वारा सीताका पता पाकर महाबली हनुमान्‌ने सौ योजन विस्तृत क्षारसमुद्रक लांघकर पार किया ॥ ७२ ॥ रावणसे सुरक्षित लङ्कामें जाकर हनुमान्‌ने अशोक वनमें बैठी तथा रामका ध्यान करती हुई सीताको देखा ॥ ७३ । तब हनुमान्‌जीने सीतासे रामका सारा समाचार एवं सन्देश कहा । सीताको आश्वासन देकर रणमें पाँच सेनापतियों, सात मन्त्रिपुत्रों और परमवीर अक्षयकुमारको मारकर स्वयं ब्रह्मापाशमें बंध गये