भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 575

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ७५९

अस्त्रेणोन्मुक्तमात्मानं ज्ञात्वा पैतामहाद्वरात् । मर्षयन्ग्राक्षसान्वीरो मन्त्रिणांस्तानपीडयत् ॥ ७६॥ ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कां ऋते सीतां च मैथिलीम् । रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपिः ॥ ७७॥ सोऽभिगम्य महात्मानं कृत्वा रामं प्रदक्षिणम् । न्यवेदयदमेयात्मा दृष्टा सीतेति तत्त्वतः ॥ ७८॥ ततः सुग्रीवसहितो गत्वा तीरं महोदधेः । समुद्रं क्षोभयामास शरैरादित्यसन्निभैः ॥ ७९॥ दर्शयामास चात्मानं समुद्रः सरितां पतिः । समुद्रवचनाच्चैव नलं सेतुमकारयत् ॥ ८०॥ तेन गत्वा पुरीं लङ्कां हत्वा रावणमाहवे । रामः सीतामनुप्राप्य परां व्रीडामुपागमत् ॥ ८१॥ तामुवाच ततो रामः परुषं जनसंसदि । अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं प्रति ॥ ८२॥ ततोऽग्निवचनात्सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम् । कर्मणा तेन महता त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ८३॥ सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः । बभौ रामः सुसंतुष्टः पूजितः सर्वदैवतैः ॥ ८४॥ अभिषिच्य तु लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम् । कृतकृत्यस्तदा रामो विज्वरः प्रमुमोद ह ॥ ८५॥ देवताभ्यो वरं प्राप्य समुत्थाप्य च वानरान् । अयोध्यां प्रस्थितो रामः पुष्पकेण सुहृद्वृतः ॥ ८६॥ भरद्वाजाश्रमं गत्वा रामः सत्यपराक्रमः । भरतस्यान्तिके रामो हनूमन्तं व्यसर्जयत् ॥ ८७॥ पुनराख्यायिकां जल्पन्सुग्रीवसहितस्तदा । पुष्पकं तत्समारुह्य नन्दिग्रामं ययौ तदा ॥ ८८॥ नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः । रामः सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान् ॥ ८९॥ न पुत्रमरणं केचिद्द्रक्ष्यन्ति पुरुषाः क्वचित् । नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रताः ॥ ९०॥ प्रहृष्टमुदितो लोकस्तुष्टः पुष्टः सुधार्मिकः । निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जितः ॥ ९१॥ नाग्निरजं भयं किञ्चिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तवः । न वातरजं भयं किञ्चिन्नापि ज्वरकृतं तथा ॥ ९२॥ न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्करभयं तथा । नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च ॥ ९३


॥ ७४ ॥ ७५ ॥ इसके बाद ब्रह्माके वरदानसे निजबन्धनसे अपनेको मुक्त जानकर हनुमान्ने रावणके मन्त्रियों तथा बड़े बड़े राक्षसोंको मारा। तदनन्तर सीताके निवासस्थानको छोड़ सारी लङ्का जलाकर रामको सीताका वृत्तान्त सुनानेके लिये लौट आये ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ वही हनुमान्ने महात्मा राघव दूतोंके पास जाकर उनकी प्रदक्षिणा की और लङ्काका सारा वृत्तान्त सुना दिया ॥ ७८ ॥ तदनन्तर राम सुग्रीवके साथ समुद्रतटपर गये और सूर्यके समान अपने तेजस्वी बाणोंसे समुद्रको क्षुब्ध किया ॥ ७९ ॥ तब नदियोंका पति समुद्र हाथ जोड़कर रामके समक्ष आया और उसकी सलाहसे रामने नल द्वारा सेतु तैयार करवाया ॥ ८० ॥ उस सेतुसे लङ्कामें पहुँचकर रामने रावणको मारा फिर सीताको पाकर वे कुछ लज्जित हुए ॥ ८१ ॥ उस समय रामने भरी सभामें सीताको कुछ कटु वचन कहे जिसको सीता सहन न कर सकीं और आगमें प्रविष्ट हो गयीं ॥ ८२ ॥ तदनन्तर अग्निके वचन सुनकर रामने सीताको निष्पाप समझा। रामके इस कर्मसे सचराचर त्रिलोकी देवता तथा ऋषि सब लोग प्रसन्न हुए। प्रसन्न हृदय राम देवताओंसे पूजित होकर बहुत शोभित हुए ॥ ८३ ॥ ८४ ॥ तदनन्तर लङ्काके सिंहासनपर विभीषणका राजतिलक देकर राम सन्ताप-से मुक्त, कृतकृत्य एवं आनन्दित हुए ॥ ८५ ॥ वहाँ देवताओंसे वर पाकर वानरों तथा प्रियजनोंके साथ पुष्पक विमानसे अयोध्याको लौट पड़े ॥ ८६ ॥ भरद्वाजके आश्रम प्रणाम पहुँचकर सत्यपराक्रम रामने हनुमान्‌को भरतके पास भेजा ॥ ८७ ॥ फिर परस्पर वार्तालाप करते हुए सुग्रीवके साथ पुष्पकविमानपर बैठे राम नन्दिग्रामको चले ॥ ८८ ॥ वहाँ पहुँच कर भाइयोंके साथ जटा त्यागकर निष्पाप रामने सीताको पाकर पुनः राज्य प्राप्त किया ॥ ८९ ॥ रामके राज्यमें लोग हृष्ट, पुष्ट, सन्तुष्ट, सुखी, धार्मिक, नीरोग तथा दुर्भि-क्षादिके भयसे रहित रहते थे। उस समय पिताके सामने किसीके पुत्रकी मृत्यु नहीं होती थी। उस राज्यकी स्त्रियाँ सौभाग्यवती एवं पतिव्रता होती थीं ॥ ९० । ९१ ॥ उस समय अग्निका भय, जलमें डूबनेका भय, वायुसंबंधी भय, ज्वरादिका भय, पेटकी चिन्ता तथा चोर आदिका भय नहीं रहता था। सारे नगर और सारे राष्ट्र धन-धान्यपूर्ण थे ॥ ९२ । ९३ ॥ इस राज्यमें सत्ययुगकी भाँति सब लोग सदैव सुखी रहते थे। सो