भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 618

६०२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

यच्च किञ्चिज्जगत्यत्र दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥२७१॥ इदं सर्वं यदयमात्मैकमेवाद्वितीयकम् । सर्वं खल्विदमिन्त्यादिश्रुत्यो यत्प्रवदन्ति हि ॥२७२॥ सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । संपश्यन्नात्मयाजीति परमात्मा मनोर्वचः ॥२७३॥ एतादृशेन वै धेनो भूत्वा जगत्स्वरूपकः । कृतकृत्यः स्वयं तीर्त्वा सर्वांस्तारयतीति च २७४॥ अत्राक्तं श्रूयतेऽथाय ज्ञात्वाऽन्तं दृढनिश्चयम् । किं बहुक्तेन चोद्दिष्टं संक्षेपेणोपसंहृतम् ॥२७५॥ नारायणाच्युत जनार्दन वासुदेव गोविन्द माधव मुकुन्द रमेश विष्णो । मत्स्यैणपार नरसिंह परावरात्मन्सामोपनाय शिव वामन पाहि विश्वम् । २७६ । येनेदं विकृतं विश्वं विशता येन चेतनम् । यस्मिन् यत्प्रतिष्ठं च तस्मै सर्वात्मने नमः२७७॥ इदानीं रामतोभद्रस्याहोसरड्लस्य च । नानाभेदाः प्रकल्प्यन्ते लघुमुद्रान्वितस्य हि ॥२७८॥ पूर्वोक्तंऽष्टाविंशतीनां रेखावृन्दं प्रकल्पयेत् । परिधी द्वादशैकां तन्वन्तरकोष्ठकानि योजयत् ।२७९॥ प्रथमे लिखित्त्वेकाशावृतुषोडशपादकम्तः चाप्यः षोडशपादानांनवेष्टादशदान्विता, २८०॥ भद्रं नत्वमिमं चाथ द्वितीयेऽर्कमिताः शिवः । वाष्यत्योदशमिता रूपाष्टादशदान्विताः २८१॥ भद्रमर्कपदं शेषं पथार्थं प्रकल्पयेत् । ध्वट् यास्मनोभद्रप्रत्र च वषत्परम् ।२८२। अथवाऽऽद्ये रसमुद्रा ग्समा वापिकाश्च परः । त्रयोदश पदाः कार्या १६ नन्दस्वसंयतकम् ।२८३॥ द्वितीये पञ्च मुद्राश्च लिङ्गषट्क च वापिकाः । तन्मिाथ भद्रकर्मपदंमण्डूष्मावधि ।२८४॥ तुर्यपञ्चतुर्यनेत्रचन्द्रसम्स्याथ मुद्रिका । पर्णनेत्रनेत्रनवनेत्रेन्दुसंख्यानेका ॥२८५॥ भद्रं षट्पदसङ्कीर्ण षट्पदं विंशपादकम् । षोडशां त्रिशुमपादं क्रमाज्ज्ञेय विचक्षणैः ।२८६॥

पावन किया गया है। वही मुक्तिका कारण है और उसका वोध होनमे तो प्राणी साक्षात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २६६ । २७० ॥ इस जगन्म बाहिर-भीतर जो कुछ देखा और सुना जाता है, उन मबम व्याप्त होकर वह नारायण स्थित है। २७१ ॥ इस जगन्म जो कुछ है उभम एकमात्र वही अद्वितीय आत्मा है। "सर्व खल्विदं ब्रह्म" आदि वाक्योस श्रुतियां भी यही बात कहती है ॥ २७२ ॥ जो प्राणी संसारकी सब वस्तुओमे अपनेको देखता है और सब प्राणियोंका प्राणांदवन् अपनेमे देखता है। उन अ माज्ञानक लिये यह कोई साधारण बात नहीं है। यह मनु भगवानका कथन है ॥ २७३ ॥ इस प्रकारक ज्ञानस ता बंधी दृढ होकर अपनीको कृतकृत्य मानते हुए स्वयं तो तरते ही है साथ ही अपने अन्य जनोंको भी यह श्लोकाहूत पिलाकर भवसागरसे पार उतार देते हैं २७४ ॥ यहांपर बतलाया हुआ इतिहाव वशिष्ठादिका विद्वान लोग अच्छी तरह जानते हैं। अधिक कहना सुनना व्यर्थ है। संक्षेपम इस श्लोकका उपसंहार कर दिया गया है। २७५॥ हे नारायण, अच्युत जनार्दन, वासुदेव, गोविन्द, माधव, मुकुन्द, रमेश, विष्णो, मत्स्य, मण्डूक, कच्छप, सूकर, नृसिंह, परावरगत्मन्, राम, गरुडगामिन्, शिव, वामन ! आप इस त्रिष्णकी रक्षा क जिए ॥ २७६ ॥ सर्वव्यापी जीवोंमें प्रविष्ट होकर जिसने इस विश्वको सचेत किया है, जिसमें सब जीव स्थित हैं, जिसमें सब प्रतिष्ठित हैं, ऐसे सर्वात्मा रामको प्रणाम है । २७७ । अब लघुमुद्रार्क साथ-साथ एक सौ आठ रामतोभद्रोक अनेक भेद बतलाते हैं ॥ २७८ ॥ पूर्वोक्त २८ रेखाओंका वृत्त करे । उसमें २१ परिधि अधिक बनावे। फिर उनमें विलो- की योजना करे ॥ २७९ ॥ प्रथम पंक्तिमे १४ ईश और सोलह पादाका २४ भद्र बनाते ॥ २८० ॥ फिर दूसरे पंक्तिम १२ शिव और १८ पादाकं १२ वापी बनाना चाहिए । पहलोकी तरह १८ पादोंका भद्र बनावे । यह रामतोभद्र १०८ रुपका है । २८१ ॥ २८२ ॥ अथवा ६ मुद्रा, ६४ ईश और १३ पादसे छै वापिकायें बनावे और १६ पादका भद्र बनावे ॥ २८३ ॥ दूसरी पंक्तिम पांच मुद्रा बनावे और लिंग तथा छ ही वापी बनावे। आगे आठवी पंक्तिमे लेकर चार, पांच, दो, एक, इन संख्याओंके मुद्राय बनावे। फिर छ, दो, दो, दो, दो, एक इस क्रमसे शिवकी रचना करे इनमें छः पदका, बारह पदका, दो पादका बीस पादका सोलह पादका, चार पादका क्रमशः प्रत्येक पंक्ति यमे भद्र बनेंगें । ऐसा विद्वानों को जानना चाहिए ।२८४-२८६॥