श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 617, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ६०१
कल्याणं सर्वतः पुंसां चिंतनाद्यस्य ब्रह्मणः तद्ब्रह्मवाचक मुख्यं मंगलानां च मंगलम् ॥२५५॥
यत्र यद्व्यज्यते साक्षान्नाम्ना तदुदीर्यते । अधिदैवं तथाऽध्यात्मं सर्वतोभद्रमुच्यते ॥२५६॥
विविच्यतेऽत्रोभयं च प्रोच्यते वस्तुव्यक्तये । अधिदैवे तु यद्ब्रह्म तद्वाह्यमुदनेऽमरम् ॥२५७
अंडहृद्गतलोकोस्तु सर्वतोभद्रमुच्यते । तेनैव भद्र सर्वेषां लोकानामिति हि स्थितिः ॥२५८
तत्र स्वर्णमयं वेश्म निर्मितं प्रभुणा स्वयम् । दक्षपाणिरिति ज्ञेय यत्र कार्यचितिः स्वयम् । २५९
न्यासेन सर्वसत्त्वानां गतानां सर्वयोगिनाम् प्राणोपासननिष्ठानां त्रयणां नित्यकल्पने २६०
ब्रह्मणा सह ते सर्वे इति स्मृतिरुशामसः । क्रममुक्तेर्भयं पथाः श्रुतिस्मृतिमतोऽमलः । २६१
आध्यात्म हृदये यत्तत्सर्वतोभद्रमीर्यते । तेन भद्रेण कल्याणं सर्वेष्ववयवेष्विह २६२
तत्र यत्पुण्डरीकं तद्ब्रह्मणः स्थानमुच्यते । श्रुतावेव प्रसिद्धिरिति दहरश्रुत्यवेक्षनम् २६३
साधनसम्पन्नंयुक्ताश्निन्दिन्यन्ते तु समाहिताः । गुरुपदिष्टया युक्त्या तेषां ब्रह्म प्रकाशते ।२६४
परमः पुरुषो भूमौ न म्वाधमन्धयोरि । इत्यादिश्रुता यन्प्रोक्तं तच्च पारोक्ष्यमित्यपि । २६५
आह चाहमेवाधस्तादित्यादिसमदशामिताम् । गूढःनासां॑पि सर्वषां देहेऽहमिति दृश्यते २६६ ।
माभून्भ्रम इत्याधपारुवाक्यानि पुनर्वचः । एकात्मरूपयोरूषयोर्भेदशङ्कानिवृत्तये । २६७।
सर्वाषूपनिषत्स्वेवं ब्रह्म द्वैतं सुनिश्चितम् । ब्रह्मैवेददमृतमित्याह चाथर्वणः श्रुतः । २६८-
तत्त्वमेव त्वमेवैतदिति कण्ठव्यगं वचः तत्त्वमसीति छांदोग्ये ब्रह्माऽत्मैक्यं न भेदधीः २६९।
एकत्वं पदयोः स्पष्टं श्रुत्या यत्प्रतिपादितम् । साक्षात्मुक्तेः कारणं तद्वाधान्नैषां स एव हि ॥२७०॥
जाता है इतने विचारोंसे रामनेभद्रकी मुद्राएं बनायी और रामस्वरूप को बतलाया अब सन्देह नष्ट करनेके लिए प्रसंगवश सर्वतोभद्रका स्वरूप बतला रहे हैं ॥२५१-२५४॥ जिस ब्रह्मका स्मरण करनेसे प्राणियोंका सब प्रकार कल्याण होता है उसे लोग भद्र कहते हैं। भद्र एक वस्तु है और मङ्गलका भी मङ्गलकारी है ॥ २५५ । जहां कि वह ब्रह्म साक्षात् रूपमें अधिदेव या अध्यात्म रीतिसे व्यवसमान होता है, उसीको लोग सर्वतोभद्र कहते हैं ॥ २५६ ॥ अब यहाँ इसकी वास्तविक्ताको दिखानेके लिए उन दोनों प्रकारोंको दिखलाते हैं। अधिदैवके अन्तर्गत जो भद्र रहता है उस विप्रस्त भद्रका पहल बतलाते हैं ॥ २५७ ॥ इस अण्डको हरण करनेवाला लोक ब्रह्मलोक कहलाता है और उसीकी सर्वताभद्र संज्ञा भी है क्योंकि उसी लोकसे सबका कल्याण होता है और उसीके सहारे सब प्रजाका स्थिति बनी हुई है ॥ २५८ ॥ वहाँपर प्रभुने स्वयं एक सुवर्णमय घर बनाया है। उसे पक्ष या फाजंको नेत्राता, जो चाहे भी कह ली ॥ २५९ ॥ न्यासके द्वारा सब प्राणीभी सब वाशिदों तथा प्राणकी उपासना में लगे हुए प्रणियोंका वह नित्य पद दीखन लगता है ॥ २६० ॥ इससे ब्रह्म भी भासमान होने लगता है। यह स्मृतिका मत है और वेद भी इसी मतको स्वीकार करत है वास्तवम तो यह पवित्र मार्ग श्रुति और स्मृति इन दोनोंको मान्य है ॥ २६१ ।, अध्यात्मका जो हृदय है उसे लोग सर्वत भद्र कहते हैं । उस भद्रसे सब अवयवयोंका कल्याण होता है । २६२ ॥ वहाँपर जो कमल है, वह ब्रह्मका स्थान है, श्रुतियोंमें भी यह बात प्रसिद्ध है कि साधनरूपा सम्पत्तिके सम्पत्तिशाली जो लोग यहाँ रहते हैं उन लोगोंको गुरुजनोंकी उपदिष्ट मुक्ति द्वारा ब्रह्म प्रकाशमान दीखने लगता है । २६३ , २६४॥ नीचे, ऊपर तथा मध्य इन तीनों स्थानोंमें वह दृश्य विद्यमान रहता है । इन श्रुतिओग जो कुछ कहा गया है, वह परोक्षमे नहीं प्रत्यक्ष ही जानना चाहिये ॥ २६५ ॥ प्रभुने स्वयं कहा है कि सूर्य आदिके मध्य में संसारमें व्याप्त रहता हूँ और सबारी मृगोंके शरीरमे भी रहता हूँ ॥ २६६ ॥ किसीको भ्रम न हो इस विचारमे 'आत्मा एव' आदि वाक्योंको फिर-फिर दुहराया गया है । 'एकात्मारूपी उस आत्मार्क बदकी शंकाको निवृत्त करनंक लिए सब उपनिषदोंमे उस ब्रह्मको अद्वैत बतलाया गया है । 'ब्रह्म एव इदं अमृतं' आदि अथर्व वेदन कहा गया है ॥ २६७ ॥ २६८ ॥ 'त्वमेवेद' तथा 'त्वमेवैतत्' इन श्रुतियोहि तथा 'तत्त्वमसि इस छान्दोग्यके महावाक्यसे ब्रह्मके एकत्वका प्रति-