भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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६०० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

तं पूरणप्रकारं तु संक्षेपेणोच्यतेऽधुना । यथा लोकेऽञ्जनेन सम्यक्संवाद्य पूर्वतैस्सिद्धैः ॥ २३९॥ निधिः प्रत्यक्षतस्तस्य दर्शनं याति नान्यथा । एवमत्रापि सम्पूर्य साधनं यच्चतुष्टयम् । २४० । सम्पाद्य लभते शुद्धं रामेति पदमव्ययम् । मायाविद्येत्यितवर्णं यद् द्वयं तन्माधनं यथा ॥ २४१॥ शुद्धाविद्यामयं चेति प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः । साध्यं साधनं च शास्त्रञ्च मिथ्याऽविद्यामयं त्रयम् २४२॥ ज्ञानोत्तरमिति मतं तस्मात्तद्दुर्गमीरितम् । चतुष्पादसाधनं सम्पूर्णमित्यभिधीयते । प्रत्येकं साधनं यच्च चतुःसाधनमुच्यते ॥ २४३॥ विवेकवैराग्यशमादिषट्कं मुमुक्षुता चेति प्रसिद्धमेतत् । लक्षणानि प्रत्येकमुत्तमानि प्रोक्तान्यमीषां स्मृतिभूमिकासु २४४॥ साधनानां चतुष्कं च ह्येषणात्यागपूर्वकम् । संन्यासश्च गुरोः सेवाश्रवणादित्रयं ततः ॥ २४५॥ पूर्वोत्तरसमाधी च पुञ्ज एकादशात्मकः । एतेषां तु मयः साक्षान्प्राणाद्या मङ्गतिर्मया ॥ २४६॥ मुमुक्षया तु न्यासादि षष्णां साक्षाद्विहोच्यते । समाधिरुत्तराक्षापि पृथगेवेति सम्मतः ॥ २४७॥ पूर्वत्रयाणां न विना मुमुक्षा द्योममन्तः । पर्नेः सदानमर्चत्र पदानि पूरयन्त्यलम् ॥ २४८ सर्वाणि तानि प्रोच्यन्ते श्रोतृणामवबुद्धये । दशेन्द्रियाणि नैषां तु गोलकानि नवैव तु ॥ २४९। प्राणापानौ मनोबुद्धी तस्माद्धर्मश्च तन्मिताः । बुद्धर्शने यथाऽपीश क्रिया तन्वत्रता मता ॥ २५०॥ उभयेन्द्रियधर्माणामन्योऽमीसाधनाग्रहः । सप्तविंशतिसंख्यानि पदान्येतानि साधनैः २५१। योग्यानि लाञ्छितुं सम्यक् पूरयन्त्वेन सर्वथा । तदा यत्परमं ब्रह्म रामेति पदमव्ययम् । २५२॥ याति प्रत्यक्षतस्तेन कृतकृत्यो हि जायते । एतद्धता विधानेन रामतोभद्रमुद्रिके ॥ २५३। रामश्च कथितश्चाथ सर्वतोभद्रमीयन । स्वानतो नामरूपाणि संशयस्यापनुत्तये ॥ २५४॥

यदि उसके साथ सज्जन गुणिसे उसे सही समयपर ले जायँ तो वह अपनी साधना पूरा कर लेता है ॥२३७॥२३८॥ उसको पूर्ण करनेका प्रकार मैं यहाँ संक्षेपमें व्यक्त करता हूँ, जैसे संसारमें देखा जाता है कि आँखमें एक प्रकारका अंजन लगाकर गँवा दिए हुए खजानेको भी प्रत्यक्ष देख लेते हैं। उसी प्रकार पूर्वजो द्वारा बताये हुए मार्ग साधनाका सम्पादन करके प्राणो 'राम' इस शुद्ध और नाशरहित पदको प्राप्त कर लेता है। जिस तरह कि मायाया और अमित वर्णोंके शब्द सद्रूपकी प्राप्तिका साधन है, उसी तरह तत्त्वदर्शिंयोंने शुद्ध और विद्यमान साधन बतलाये हैं। साध्य, साधन और शास्त्र ये तीनों मिथ्या और अविद्यामय हैं ॥२३९-२४२॥ सकाम जितने भी सिद्धान्त हैं वे सब प्राणीको ज्ञानके पास पहुँचाते हैं। जितने चतुष्पाद साधन हैं, वे पूर्ण कहे जाते हैं और प्रायः सब साधन सङ्ख्यासे ही हुआ करते हैं ॥ २४३ ॥ स्मृतिकी भूमिकामें विवेक वैराग्य, शम, दम बादि ६ धर्म और मोक्षकी इच्छाका उत्पन्न होना ये सबके उत्तम चिह्न बतलाये गये हैं। २४४॥ इन सबमेंसे सबसे पहला साधन इष्णाओंका त्याग करना है। फिर संन्यास, गुरुकी सेवा, श्रवण, भजन, कीर्तन, पूर्वात्तर समाधि तथा एकादश प्रकारके पुञ्ज ही साधन हैं। इन सबके साथ प्राण आदिकी संगति होती है। २४५ ॥ - २४६ ॥ मोक्ष पानेके लिए षष्ठीवर छः प्रकारके न्यास आदि कार्य्य ज्ञान चाहिये। किन्तु उत्तर समाधि इसमें अलग ही रहेगी, यह बात सब लोग मान चुके हैं ॥ २४७ ॥ पूर्वके तीन समाधियोंके बिना मोक्ष नहीं प्राप्त हो सकता, इन साधनसमूहसे सब पद सरल होनेसे पूर्ण हो जाते हैं ॥ २४८ ॥ सुननेवालोंको बोध करानेके लिए उनके यहाँ बतला रहे हैं। उनके विचारमें कुल दस इन्द्रियां हैं और नौ गोलक हैं । २४९ । अनन्तर प्राण अपान, मन, बुद्धि, इन दोनोंके जितने प्रकार-के धर्म उत्पन्न हुए। बुद्धिसे ज्ञानकी उत्पत्ति हुई । ज्ञानेन्द्रिय अपने इच्छानुसार जो चाहे वह करे उसके लिए कोई नियम नहीं है । २५० । ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इन दोनों प्रकारका इन्द्रियोंके धर्मसे और उनके धर्मसे कोई सम्बन्ध नहीं है । इस तरह इन सत्ताइस प्रकारके पदोंको साधन करके पूर्ण करना चाहिए। ऐसा करनेपर जो अव्यय परब्रह्म रामका पद है वह प्रत्यक्ष दीखने लगता है। जिससे प्राणी कृतकृत्य हो