श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 620, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६०४] आनन्दरामायणे [सर्गः ५
वाच्योऽपि तन्मिताः कार्या भद्राणि वक्ष्यमाणतः तच्चकोष्ठं कला कोष्ठं तुर्यकोष्ठं च षट्पदम् ॥३०५॥ षट्पदं च कलाकोष्ठं शेषं सर्वं पुरोदितम् । अथवा प्रथमाद्यावत्पञ्चमस्थानकाद्वि ॥३०६॥ षट् षट् पञ्च तुर्यवह्निक्षुद्राश्च मध्यशङ्करान् । तुर्यनैऋतिनेत्राक्षिमर्यादापरिधींस्तथा ॥३०७॥ विशेषस्तु लिंगद्वयं वार्ण. षट् त्रिपदं पदम् । भद्रसङ्ख्येन्दुकलेन्दुकलाचतुरस्रम्भिकान् ॥३०८॥ प्रकल्प्यारचयेद्बुद्ध्या शेषं सर्वं पुरोदितम् । एवं नानाविधा भद्रा बहवः सन्ति भो द्विजः ॥३०९॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे श्रीरामदासविष्णुदास- सम्वादे सबहुरामतोभद्रविस्तारो नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चमः सर्गः
( रामलिंगतोभद्र तथा अनेक लिंगतोभद्रोंका रचनाप्रकार )
श्रीरामदास उवाच
पूर्वोक्तक्षेत्रसुदीर्घे रामतोभद्रविस्तरान् । वदान्यहं तवाग्रे हि विष्णुदास शृणुष्व तान् । १ ॥ तिर्यगूर्ध्वरक्तरेखा एकषष्टिमिताः शुभाः । अन्तःकृष्णान्तरुक्शुक्लपीताः परिधयः क्रमात् । २ । द्वादशांते पीतकृष्णाक्तशुक्लाः पुनः स्मृताः । पञ्चमः पीतवर्णोऽपि सर्वतोभद्रमालिखेत् । ३ । बहिः पंक्तौ द्वादशांते सीमापरिधयः स्मृताः । पीता वा लोहिता कार्या मध्ये द्वौ परिधी स्मृतौ । ४.। ततो मध्यगृहयोर्द्वे मुदिके वेदवर्णके । चतु पार्श्वेषु चत्वारि नामानि पूर्ववल्लिखेत् ॥ ५ ॥ कोणगेहेषु कार्णन्दुस्त्रिपदः शुक्लवर्णकः । एकादशपदा कृष्णा शृङ्खला पीतवर्णका । ६ । दशपदा शृङ्खलाऽन्या बह्विगे हरिता स्मृता । एकोनविंशत्पदजा भद्रं रक्त नवान्तकम् । ७ ॥
चार पाँच, तीन, दो अथवा एक मुद्रा बनावे और सम्मुख परिधियोंकी ओर छट्ठे स्थानोंमें चार-चार शिवोंकी रचना करे । विशेषता केवल इतना रहेगा कि पाँच वा नौ-नौ पदोंके लिंग बनेंगे। बाधियाँ पूर्वोक्त संख्याके अनुसार ही रहेगा, किन्तु भद्रका सङ्ख्या वक्ष्यमाण संख्याके अनुसार रहेगा। कुछ भद्र पच्चीस कोष्ठकका, कुछ सोलह कोष्ठकोंके, कुछ चार कोष्ठकके, कुछ छ कोष्ठकोंके, फिर छः कोष्ठको, कुछ सोलह कोष्ठकोंके, इस प्रकार भद्र बनेंगे। बाकी सब पहलेके समान ही होंगे। अथवा पहली पंक्तिसे पाँचवी पंक्ति पर्यन्त ॥ ३०२-३०६ ॥ छः, पाँच, चार, तीन मुद्राएं बनावे क्रमशः चार, व, दो, दो, दो शिवोंकी रचना करे और मर्यादा तथा परिधियोंको ठीकसे बन कर रखव ३०७, विशेषता इतना है कि पांच, तीन, छ, तीन, छः पदका लिंग बनावे । इसमें भद्रकी संख्या सोलह, सोलह तथा छः रहेगा इस तरह कल्पना करके अपनी बुद्धिसे रचना करे। बाकी सब पूर्ववत् रहेगा। इस प्रकार हे द्विज! इस भद्रके बहुतेरे भेद हैं, ॥ ३०८ ॥ ३०९ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे चतुर्थ सर्ग ॥ ४ ॥
श्रीरामदास कहते हैं - हे विष्णुदास ! अब मैं तुम्हारे आगे पूर्वोक्त रामतोभद्रका विस्तार बतलाता हूँ। उसे तुम सावधान मनसे सुनो ॥ १ ॥ भद्र बनानेके लिए चाहिए कि बड़ा लोट सावों ६१ रेखायें खींचे। बन्तमें काली, लाल, सफेद तथा पीली परिधियाँ बनावे ॥ २ । बारहवीं पंक्ति के आगे पीत, कृष्ण, रक्त तथा शुक्ल रङ्गकी सीमापरिधियाँ रहेंगी। चाहे तो पाँचवां स्थान पीले रङ्गसे भी बना सकता है। बारहके बाद बाहरकी पंक्तिमें पीले या लाल रङ्गकी परिधि रहेगा। बीचम और दो परिधियां बनेंगी ॥ ३ ॥ ४ । इसके अनन्तर मध्यके दोनों घरोंमें चार रङ्गोंको दो मुद्राएं बनेंगी। इसके अनन्तर चारों बगल पूर्ववत् चार नाम लिखने चाहिए ॥ ५ ॥ कोणवाले कोष्ठकमें तीन पाद और शुक्लवर्णका इन्दु बनावे। ग्यारह पादकी शृङ्खला बनावे और उसे कृष्ण वर्णकी रखे । दस पादकी एक दूसरी शृङ्खला पीले रङ्गसे बनावे । हरे रङ्गसे उन्नीस पादकी