भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 621, कुल 811 में से

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पृष्ठ 621

सर्गः ५ ] मनोहरकाण्डम् १०५

त्रयोदशपदा वापी ... रक्तं भद्रं पीतभद्रं तिर्यङ्नवपदात्मकम् ॥ ८ ॥ अष्टधा भुजगा रक्ता द्विपदा नयनस्तथा । अष्टमुद्रात्मकं रामतोभद्रं ते मयोदितम् ॥ ९ ॥ त्यक्त्वा पाशं भुजगांश्च कृत्वा षोडशपदम् । खण्डत्रयञ्चतुष्पदजं भद्रं लोहितं रसैः ॥ १० ॥ तिर्यक्तेषां पीतवर्णं ततोऽग्रे वेष्टनं तथा त्रिदशार्थं मालिका रक्ता त्रिपदा वा त्रिलोचना ॥ ११ ॥ अष्टमुद्रात्मकं चैतद्रामतोभद्रमुच्यते । पूर्ववत्तु सर्वं शेषमाद्यद्रव्याः सर्वं हि पूर्ववत् ॥ १२ ॥ मुद्रिकारूपपादांश्च षट्कं स्वेच्छं प्रपूरयेत् । चतुर्मुद्रात्मकं चैतन्मलिंगं वापि पूर्ववत् ॥ १३ ॥ तिर्यगूर्ध्वं त्रिमध्यश्च रेखाः कार्या तुल्यास्ततः । तासु चतुर्मुखार्थेषु कार्याः परिधयः क्रमात् ॥ १४ ॥ कुम्भारकशुक्लपीता द्वितीये परिधौ च । कार्यः पुनश्चतुःपार्थे परिधिः पीतवर्णकः ॥ १५ ॥ तदग्रे रक्तवर्णश्च परिधिर्हि नयनस्ततः । ततोऽष्टपदः परितः परिधिः पीतवर्णकः ॥ १६ ॥ ततः षष्ठपदाध्वे च पुनः पीताः प्रकारयेत् । आद्यस्थानं च सीमाख्याः पीता परिधयोऽथवा ॥ १७ ॥ रक्ता वेदांगताः कार्या द्वादशात पदेषु च कोणेष्वष्ट पूर्ववच्च मध्ये च मुद्रिकात्रयम् ॥ १८ ॥ ततो द्वितीयस्थाने हि चन्द्रः कृष्णो च शृंखला । सप्तदा वल्लरी च चतुर्दिक्षु चादिका ॥ १९ ॥ वल्ल्यऽनित्यार्जवं कार्यं रक्तं भद्रं हि षट्पदम् । त्रयोदशपदा कार्या वाप्या वेदांगताः सिताः ॥ २० ॥ षड्विंशन्पदजाः कार्यास्तिस्रः कृष्णपङ्क्तयः । योष्यास्त्रयोदशलक्ष्या हि लिंगमध्ये पदेषु च ॥ २१ ॥ रामाज्ञं राधकान्तेन मूर्ध्ना कण्ठेन पादयोः । मुद्रा चतुष्पदा ज्ञेयाः पदाभ्यां कण्ठ ईरितः ॥ २२ ॥ चतुष्पदा लिंगमथा षट्कं नेत्रं हि षट्पदा शान्त्रयञ्च शुक्लं द्वे पद रचयेद्द्विया ॥ २३ ॥ वाप्युपारष्ठकञ्चापि पीतं वैषट्पदानि च । नूपुरकान्नपादा पत्र पादानि चोपरि ॥ २४ ॥ मध्येऽथ सन्तोभद्रे पूर्ववच्चैव ना परम् । मत्तलक्ष्मामभद्रप्रपञ्च मपेरितम् ॥ २५ ॥

वल्लरी बनाये । ... से बारह पादका वापी बनाये । तीन पादका लाल रङ्गका एक दूसरा भद्र बनावे। इस नौ पादका एक तिरछा भद्र और बनावे ॥ ८ ॥ इन सबके भद्रोंका .... केवल दो पादका रहेगा। इस प्रकार अष्टमुद्रात्मक रामतोभद्र मैंने तुमको बतलाया ॥ ९ ॥ अथवा पाशा शृंखलाको छोड़कर काले रङ्गस नौ पादका लिङ्ग करावे । चार पादका एक खण्डबनावे और छः पदका लाल रङ्गका भद्र बनाय ॥ १० ॥ ऊपर बतलाये तिरछे और पीले पदमें सात या चार पादरूप फिर बनाकर लाल रङ्गका मालिका या तीन पादकं शिव बनावै ॥ ११ ॥ यह अष्टमुद्रात्मक रामतोभद्रभद्र है। पूर्ववत् साया और बडी तिरपन रेखावें खींचे ॥ १२ ॥ मुझे ओर चार प्रकारक छः छः पादांका अपन इच्छानुसार पहलेके समान पूर्ण करे। यह चतु- र्मुद्रात्मक रामो मुद्राभद्र कहता है। इसके सिवाय सब चीज पूर्ववत् रहता है ॥ १३ ॥ सात रेखावे सीधा ओर बड़ी तिहत्तर रेखाएं सब ओर क्रमात् चार बालि पोर घडी बना दे। १४ ॥ बारह पादोंका नाला, लाल तथा शुक्ल वर्णका भद्र बनावे। फिर उसके चारों ओर पल वर्णका परिधि बनावे ॥ १५ ॥ उसके आगे चारो वापस लाल रंगका परिधि बनावे। फिर आठ पादका परिधि उसके चारों तरफ बनावे ॥ १६ ॥ ऊपरके ओर छः पादका परिधि पीले रंगस बनावे। अन्तिम स्थानमें सीमा नामकी परिधियां अथवा लाल रंगस चार परिधियां बनावे। पहलेका तरह कोनक वशाम तान मुद्रायें बनावे ॥ १७ ॥ १८ ॥ इसके अनन्तर दूसर स्थानम चन्द्रमा बनाकर काल वर्णका शृंखला बनावे। सात पादकी वल्लरी अथवा बीरह यात्रीस वल्लरियांका निर्माण करे और लाल रङ्गस छः पादका भद्र बनावे। वास पादस सफेद रंगकी पा वापियां बनाये ॥ १९ ॥ २० ॥ तदनन्तर काल रंगस छब्बीस पादोंके तीन शिव बनावे । लिङ्गके मध्यवाले हाठकाम तरहसे विवो बनावे ॥ २१ ॥ फिर उत्तम स्थानसे कण्ठतक समान रामके नाम लिखे। इसमे चार पदसं मस्तक, दो पादसं कंठ, चार पादस लिंग और पार्श्वभाग, छः पादिसे स्कन्ध, तीन पादस पैर बनावे । सफेद रंगके दो पाद षटका रहने दे ॥ २२ । २३ ॥ अथवा ऊपरसे भो आठ चार डाकी बने क

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