भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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३०६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

एतद्द्वादशमुद्राभी रामलिङ्गात्मकं शुभम् । प्रालम्ब्य विविधं च रामतोभद्रमादरात् ॥ २६ । तिर्यगूर्ध्वमेकसप्त रेखाः सर्व हि पूजयेत् । चतुर्मुद्रात्मकं तद् यथा तद्वच्च मध्यमे । २७ । आद्ये तिस्रः स्थले मुद्रा मध्यमपारश्वयोस्तथा । मध्ये नवमुद्रा ज्ञेयास्ततो द्वे द्वे शुभे स्मृते ॥ २८ । ततः षोडशमुद्राभी रामतोभद्रमादरात् । अन्तर्गहं कुरु लिङ्गं मलिङ्गं पाङ्‌ङ्गात्मकम् ॥ २९॥ तिर्यगूर्ध्वभूमिवार्याणवेदरैखाः ४२१ सुलोहिताः । अष्टमुद्रा मके मध्य रामतोभद्गके लिखेत् ॥ ३०॥ तिर्यगूर्ध्वं परिधयः षोडशैष समन्ततः । द्वौद्वौत रक्ता वर्णा वा बहिः परिधिपोऽपि च ॥ ३१ । पूर्ववत् कोणगेहेषु मुद्राणां च क्रमोगुना । उक्ते द्वे मुद्रिके पूर्वं तद्वा वेदमुद्रिकाः । ३२ । मध्ये सर्वत्र परिधिद्वयं मान्यन्यथा कदा । ततो रक्तान्तो वद्योवणः पञ्चम स्थले । ३३ । षण्मुद्रिका वेद वाष्यश्चतुर्शीतिपादकाः । मध्यन्तरतुषडंश कृष्णं द्वादशपादकम् ॥ ३४॥ वापीपार्श्वेषु भद्रानि चत्वारि लोहितानि च पृथक् पृथक् पञ्चदशपवैर्गानि तानि हि । ३५ । षष्ठे स्थाने द्वादशैव मुद्रा ह्यग्रे चतुर्दश । पञ्चाष्टादशाय विंशद्विंशमुद्रिकाः ॥ ३६॥ चतुर्विंशाय षड्विंशा ह्यष्टाविंशत्युमुद्रिकाः । निजस्थानस्थितमुद्राणां स्थान षोडष मुद्रिकाः ॥३७॥ वाप्यः षोडश विज्ञेया मध्ये वापीद्वयं स्मृतम् । अष्टादशसहस्र च रामतोभद्रमारितम् । ३८॥ तिर्यगूर्ध्वं द्वि वस्वंङ्कवाणरेखाः सुलाहिताः सर्वाकार नतोभद्रयमक्क पुरातनम् ॥ ३९॥ तदत्र मध्ये लेख्यं हि मध्यमुद्रास्थले ततः । द्वि तत्वपद तप्तारे कृष्णवणे प्रकल्पयेत् । ४०॥ षट्त्रिंशन्नामनामानि वै लेख्यानि च हस्तिना । कर्णिकार्णेषु केश्रीनि चामेव शिरःस्मृतम् । ४१। कटिश्चतुष्पदैः कार्या पार्श्व द्वादशपादकं मध्यानिरीक्ष्यतंव्या मूलं लिङ्गमदात्मकम् ॥४२॥

उनके आदिवात तीन पादाका लाल रहत और सब पत्त रङ्ग राखे । २८ । उनके बादम पूर्ववत् सर्वतोभद्रकी रचना करे। इस प्रकार मैन तुम्हारे पास सर्वतोभद्र बतलाया । २५ । यह द्वादश मुद्राओस युक्त लिङ्गात्मक रामतोभद्र आदरके साथ ध्यान या पूजन करने योग्य है ॥ २६ ॥ सदा ओर बड़ा उचासी रेखाय पहलकी तरहै खींचे । ऊपर जा चतुर्मुद्राके समान बतलाये आये है, उसी तरह बीचमें भद्रको रचना करे । २७ । बर्दिको परम तीन मुद्राये बना, कर पहूद्रक समान सामाका पाराच बनावे । बीचम तीन-तीन और अन्यम भ वतन्यन व वार्या दन शुभ दु । २८ ॥ यह पाङ्गमुद्राका क रामतोभद्र मैन तुमका बतलाया। और इसके मद्येभगव शिवक भारचना कर दा जाय तो यह सलङ्ग- रामतोभद्र हो जायगा ॥ २९ ॥ इनक क्रम इस प्रकार हे-सवा और ताक्ष ४२१ रखाय लाल रसिस खींच। उनके बीचम अष्टमुद्रामक रामत भद्र लिसे । ३० ॥ इसके चारा ओर दस रङ्गोकी पारोवग रहगा, व परिधियो द्वादश पादक अन्दरवर बनाना मङ्ग ॥ ३१ ॥ पहिलेकी तरह बतलाये हुये मुद्राओका क्रम बतला रहे हैं। सबक ऊपर दो मुद्राय और उनके नाचे चार मुद्राय बनावे । ३२ ॥ सब तरफ दो परिधिवां बनावे । इसके बाद छ मुद्राये बनावे फिर आठ मुद्र व बनावे। पचम स्थानम कुछ विषमता हे, सो बत्ताते हैं। ३३॥ इसमे छः मुद्राय, चौरासी पादकी चार वापीयों और वापीके अन्दर १ कृष्ण रङ्गस बारह पादका कुंड बनावे ॥ ३४ ॥ वापीके आस-पास लाल रङ्गके चार भद्र बनाए । व अङ्गल अलग पन्द्रह पादोके बन य जायेंगें । ३५॥ छठी पंक्तिम केवल बारह ही मुद्रायें रहगो । अगे चौदह, फिर बास, बाइस, चौबास, छव्यास, अट्टा- इस, रीस, बतीस, ये मुद्राय रहण । ओर अपन स्थानपर पूर्ववत् व सोलह मुद्राय रहेगा। इसमें वाप्या भी मालह रहेंगी और मध्यम दा वाविया रहगो । इस तरह मैन तुम्ह अष्टादशसहस रामतोभद्रका क्रम बतलाया ॥ ३६-३८ ॥ लाल रङ्गत खङ्ग, बड़ा ओर ५६८ रेखाएं। जैसा कि मैन पहले ही सर्वांतोकारमक रामतोभद्रकी रचनाका प्रकार बतलाया है। उसी तरह यहाँ भी बनावे। उसके बीचमे मुद्राकी जगहपर बहत्तर पादक शिवका रचना करे। इसका कण लाल रहेगा। अथवा हाथसे ३६ रामनाम लिखे। काले रंगसे उनकी कणिका और चार पादसे सिर बनावे ॥ ३९-४१ ॥ चार पदको कटि