भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 623

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् १०७

षट्त्रिंशत्पदजे ज्ञेये द्वे वापीशङ्करे मिने । द्वाभ्यां शिवञ्च वै नेत्रे मिते शेषपदानि हि ॥४३॥ रक्तकानि चत्वारि पीठानि शिवकर्णयोः। स्थाने तृतीये मुद्रश्च शंभो द्वौ शङ्करौ स्मृतौ । स्थाने चतुर्थे मुद्राश्च चत्वारश्शिवाह्वयाः स्मृताः ॥४४॥ एवमग्रे क्रमेणैव विशेषं शृणु सादरम् । स्थाने पञ्चदशे मुद्राश्चतुर्दश शिवाह्वयाः ॥४५॥ पञ्चदशे हि लिङ्गानां षण्णां शिया लिखेत् । काणान्धयोस्तयोः कार्यौ द्वौ शिवौ च त्रिपटपदी ॥४६॥ अष्टमुद्रात्मके भद्रे सरितो न कृती यथा । मण्डलस्यो लिङ्गवृद्धिं कर्तव्या परमावधि ॥४७॥ स्थाने द्वाविंशतितमे भद्रं द्वाभ्यां योजितम् । त्रिपत्रिञ्च लिङ्गानि बहिः परिधयस्ततः ॥४८॥ एवं युक्त्या रचयैवै शेषं सर्वं पुरोदितम् । अष्टोत्तरशतं च रामलिंगात्मकं स्थितम् । समासनं यन्त्रेषु हि सर्वस्वपानितुष्टिदम् ॥४९॥ तिर्यगूर्ध्वं पञ्चाशदभूर्वेखाश्च पूर्ववत् । अष्टमुद्रात्मकं मध्ये परिधयः समन्ततः ॥५०॥ तिर्यगूर्ध्वं द्वादशान्ते बहिः परिधयस्तथा । मध्यं सोपानविध्वंस्यं नान्यत्स्थले कदा ॥५१॥ नैऋत्यन्ते द्वैमुद्रा विनेपत्रं तु सर्वतः । सिता वापीतृतीयाथ ह्यग्रे च चतुर्थके ॥५२॥ पञ्चमे दश तन्मुद्रा ईशे शंभौ पुरोदितम् । अष्टोत्तरशतं रामतोभद्रं ते मयोदितम् ॥५३॥ तिर्यगूर्ध्वं त्रिपूणां रेखाः कार्याश्च पूर्ववत् । स्थापितं रामभद्रत्रयमेके पुरोदितम् ॥५४॥ तदत्र मध्ये लेखा हि सव्यमुद्रा श्वेतेसिता । वापी कार्या द्वादशान्तं परिधयश्च पूर्ववत् ॥५५॥ तिर्यगूर्ध्वं शुभा कार्या बहिः परिधयस्तथा । स्थाने तृतीया मुद्राश्च तिम्रो द्वौ शङ्करौ वरौ ॥५६॥ चतुर्थे वेदमुद्राश्च त्रपग्ने शङ्कराः स्मृताः । पञ्चमे पञ्च मुद्राश्च चत्वारश्च हग वराः ॥५७॥ षष्ठे स्थाने च षण्मुद्राः शिवाः सप्त प्रकीर्तिताः । काणान्धयोस्तयोः कार्या द्वौ हरी च त्रिपटपदी ॥५८॥

बनावे। बारह बादके दोनों पार्श्व में ... बनावे ॥४२॥ छब्बीस पदसे शिव तथा वापी बनावे औ ... ॥४३॥ बाकी काण्डेन्द्रामस पाँच कोष्ठक लाल रङ्गसे, चार पद्मकुण्ड दम्पती तथा शेष ... पण्डित तिन मुद्राय और दो शङ्कर बनावे। चौथी पङ्क्तिमें चार मुद्रायें और तीन शिव बनावे। ॥४४॥ इस प्रकार वसन्तके अग्र पर इसमे जो कुछ विशेषतायें है, उन्हे बतला रहाहूं। चौदहवें पंक्तिमें चौदह मुद्रा और सोलहवें पंक्तिमें शिव बनावे॥४५॥ वही क्रम पन्द्रहवीं पंक्तिमें भी रहेगा। बाकी सत्र ... पूर्ववत् करन चाहिये। द्वावाक काणो अन्धाय नीनो पार्श्व के दो शिव बनावे ॥४६॥ अष्टमुद्रात्मक भद्रक ... लिंगानुसार बनाकर चार प्रलयात्मक मुद्राके अनुसार लिङ्गको वृद्धि करता जाय ॥४७॥ बाईसवीं पंक्तिमें बाईस मुद्रायें बनावे। उन्तीस तीन लिङ्ग बनाकर बाहरकी परिधियाँ भी बनावे ॥४८॥ इस प्रकार युक्ति के साथ इस रामतोभद्रको बनावे। शेष अंश पहलेके समान ही रहेगा। यह मण्डोत्तरशतक चक्र रामतोभद्र रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाला सर्वश्रेष्ठ आसन है॥४९॥ सीधी तथा तिरछी १५५ रेखायें खींचें और अष्टमुद्रात्मक रचना करे। उसके बीचमें भद्र रहेगा। चारो ओरसे बारहवीं पंन्तिके बाद परिधियां रहेगी। मध्यमे सोपानादिच्छिद्र रहेगी और किसी दनिपर कुछ भी नहीं रहेगा। ५०।५१॥ इसकी दूसरा पंक्तिम चार मुद्राय रहेगी। तीसरी पंक्तिमे कुछ विशेषता है, सो बतलाते है। आठवों और चौथी पंक्तिमें क्रमश तीन वापी और तीन मुद्रायें बनावे ॥५२। पाचवी पंक्तिमें दस मुद्रायें बनाकर बाकी पूर्ववत रक्खे। यह मैने तुमको अष्टोत्तरशत रामतोभद्र बतलाया ॥५३॥ सीधी और तीखी २०३ रेखाएं खींच । फिर पूर्वोक्त रीति के अनुसार भद्रत्रयात्मक रामतोभद्रकी रचना करके उसीके समान समस्त लिंगोकी स्थापना करे ॥५४॥ इसके मध्य पहली पंक्तिमें सफेद रंगका एक भद्र और सफेद रङ्गकी ही एक वापी बनावे। फिर पहलेकी तरह बारह पंक्तियोंके बाद परिधियां बनावे ॥५५॥ बाहरको तीखी और सीधी परिधियां बनाकर तीसरी पंक्तिमे पाँच मुद्रा और दो शिव बनावे ॥५६॥ चौथी पंक्तिमें चार मुद्रा और तीन शंकर बनावे पाँचवीं पंक्तिमें पाँच मुद्रा और चार शिवकी रचना करे ॥५७॥