भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 624
१०८आनन्दरामायणे[ सर्ग ५

अष्टमुद्रान्वके भद्रे मलिमे च कृती यथा । स्थाने च सप्तमे मुद्राः सप्त शिवानि चाष्ट वै ॥५९॥
कोणस्थगृहयोः कार्यों द्वौ हरौ च 'प्रपृष्ठयोः । अष्टोत्तरशतं रामलिङ्गात्मकं स्मृतम् ॥६०॥
षष्ठे स्थाने कोणगेहेऽथवा शम्भुं न कारयेत् । स्थाने तृतीये मुद्रे द्वे वापी द्वौ द्वौ हरावपि ॥६१॥
एकच्छतात्मकं भद्रं रामलिङ्गात्मकं मतम् । अष्टोत्तरसहस्रं रामतोभद्रमीरितम् ॥६२॥
पञ्चैव मुद्राः कर्तव्या अते स्थाने हि पञ्चमे । पंच मुद्राः पञ्च वापीः कृत्वा रामतोभद्रमीरितम् ॥६३॥
अष्टोत्तरसहस्रे श्रीरामतोभद्रके वरे । वापीमुद्रादिषट्कं कर्तव्यं रामतोभद्रमीरितम् ॥६४॥
सहस्रराममुद्राणां रामतोभद्रमीरितम् । अष्टोत्तरसहस्रे श्रीरामतोभद्रमीरितम् ॥६५॥
स्थाने चतुर्दशे कोणगेहे शम्भुं न कारयेत् । मुद्राद्वयं तथा वापीं कुर्यात् शेषेषु न कारयेत् ॥६६॥
सहस्रममुद्राणां रामलिंगात्मकं विदुः । षोडशगवाक्षके कुर्याद्वापीत्रयं तथा ॥६७॥
मध्यमुद्रास्थले वाप्यस्तिस्रः कार्या महत्तमाः । सर्वतोभद्रवत्सर्वं कर्तव्यं रामतोभद्रके ॥६८॥
अथवाऽऽद्यस्थले मध्यमुद्रासु वेददिक्षु च । त्रिष्वेव कोणगेहेषु कुर्याद्वापीत्रयं तथा ॥६९॥
वाप्यश्चतस्रश्चाप्यथ नवमुद्रात्मकं शुभम् । रामतोभद्रसंज्ञं स्याच्छ्रीरामप्रीतिवर्धनम् ॥७०॥
तिर्यगूर्ध्वं बाणपूर्णभूमिरेशाश्च पूर्ववत् । त्रयोदशात्मकं कुर्याद्रामतोभद्रमुत्तमम् ॥७१॥
मुद्रामध्ये हि द्वे वापी परिधयोऽर्कमेधया । कृत्वा द्वौ नवद्रमध्ये परिधयः कृता दृढाः ॥७२॥
बाल्यं रामतोभद्रं तोषदं तत्त्ववादिनाम् । कोणगेहेषु लिङ्गानि नैकस्थाने हि पश्चिमे ॥७३॥
कार्ये वापीस्थले लिंगं पञ्चविंशतिमं परम् । पञ्चविंशतिमूर्ती रामलिंगात्मकं विदुः ॥७४॥
अथोच्यन्ते दैवतानि रामासनगतानि च । मध्येऽथ सर्वतोभद्रे मण्डले तन्मृदात्मकम् ॥७५॥
ततो बहिस्तु लिंगेषु रुद्रं वापीषु वै नलम् । सर्वाश्च देवता मध्ये दिशि दिक्पालकान् क्रमात् ॥७६॥
पीठेषु च गृहस्थासु मुगदं परिकल्पयेत् । एवं पूजाविधिं कुर्यात् मन्त्रैर्वैदिकतान्त्रिकैः ॥७७॥

छठी पंक्तिमें छः मुद्रा तथा सात शिव बनावे, सातवें में भी सात मुद्रा और आठ शिव बनावे ॥ ५९ ॥ लिंगयुक्त अष्टमुद्रात्मक रामतोभद्र बना लेना। उसके सम्बन्धी पूर्ववत् आठ मुद्रा और आठ लिंग बनावे ॥ ५९ ॥ कोणवाले दोनों घरोंमें दो दो पार्वती के शम्भु बनावे। इस तरह अष्टोत्तर-शतलिंगात्मक रामतोभद्र बतलाया ॥ ६० ॥ छठी पंक्तिमें कोणवाले घरमें शिवको न बनावे। तीसरी पंक्तिम एक मुद्रा, दो वापी तथा दो शिवका स्थान बनावे ॥ ६१ ॥ एकशतात्मक रामतोभद्र कहलाता । पूर्वोक्त अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्रके चौदहवें पंक्तिमें केवल छः मुद्रा बनावे । पाँचवी पंक्तिमें पाँच मुद्रा और पाँच वापी बनावे तो इसे लोग अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्र कहते हैं ॥ ६२ ॥ ६३ ॥ पूर्वोक्त अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्रकी पांचवीं पंक्तिम छः वापी और छः मुद्रा बनानेसे इस अष्टसहस्र रामतोभद्र कहते हैं । रामलिंगात्मक अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्रके चौदहवीं पंक्ति के कोणवाले घरमें शिव-की रचना न करे और मुद्राके स्थानमें बीच-बीच दो वाषिय बनावे और कुछ न बनावे, ६४ ॥ ६५ ॥ ६६ । इसे लोग रामलिंगात्मक सहस्ररामतोभद्र कहते हैं । षोडश रामतोभद्रकी पहली पंक्ति के दोनों दिशामें स्थित मध्यमुद्राके स्थानपे बड़ा बड़ी तीन वावियां बनावे तो लोग इसे रामलिंगात्मक रामतोभद्र कहते हैं ॥ ६७, ६८ ॥ अथवा पहली पंक्ति के मध्यमें मुद्राओं तथा आगे आगे चार वापियां बनावे और तीन दिशामे तीन वापियां रचना करे ॥ ६९ ॥ रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाला यह नौ मुद्रात्मक रामतोभद्र है ॥ ७० ॥ टेढ़ी और सीधी पन्द्रह रेखायें पूर्ववत् त्रयोदशमुद्रात्मक रामतोभद्रके समान खींचे । उसके बीचमें तीन मुद्राएं बनाये ॥ ७१ ॥ मुद्राके बीचमें दो वापियोंकी रचना करे और मध्यम सूर्य बनाकर परिधि बनावे। दो-दो याद्वा परिधियां बनावे इसे लोग तत्त्वमुद्रात्मक रामतोभद्र कहते हैं ॥ ७२ ॥ यह रामतोभद्र तत्त्ववादियोंके लिए आनन्ददायक है। कोने के घरोंमें शीवोंकी रचना करे । पश्चिमकी ओर कुंडके स्थानमें पच्चीस लिंग बनावे । यह पञ्चविंशतिमूर्तिरत्नक रामतोभद्र कहलाता है ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ अब रामासनके देवताओको बतलाते हैं। सर्वतोभद्रके बीच तथा सर्वतोभद्रके