श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ५ ] सारकाण्डम् ४७
ततः पूर्णे वर्षे प्राप्ते यदा यास्यसि भूतलम् । सूर्यवंशेऽद्भुतो राजा विख्यातंस्त्वं भविष्यसि ।।२६।। नाम्ना दशरथस्तत्र भार्याद्वययुतः पुमान् । तृतीयेयं तदा भार्या पुण्यश्लेषार्धभागिनी ।।२७।। कलहा कैकेयी नाम्नी भविष्यति न संशयः । तत्रापि तव सामीप्यं विष्णुर्दास्यति भूतले ।।२८।। आत्मानं तव पुत्रत्वं प्रकल्प्यामत्कार्यकृत् । रामनाम्ना रावणादीन् हत्वा राज्यं करिष्यति ।।२९।। तवाजन्मव्रतादस्माद्विष्णोस्तुष्टिकरात्परम् । न यज्ञा न च दानानि न तीर्थान्यधिकानि वै ।।३०।। अतस्त्वमग्रेऽपि धर्मज्ञ नित्यं विष्णुव्रते स्थितः । त्यक्तमात्सर्यदम्भोऽपि भव त्वं समदर्शनः ।।३१।। कार्तिके माधवे माघे चैत्रे मन्मथतुष्टये । प्रत्यब्दं त्वं धर्मदत्त प्रातःस्नायी सदा भव ।।३२।। एकादशीव्रते निष्ठ तुलसीवनपालकः । ब्राह्मणानपि गाश्चापि वैष्णवांश्च सदा भज ।।३३।। मसूरिकास्तालाबुं वृन्ताकादीनि खाद मा । एवं त्वमपि देहान्ते तद्विष्णोः परमं पदम् ।।३४।। प्राप्स्योषि धर्मदत्त त्वं तद्भक्त्यैव यथा वयम् । पुण्यशीलसुशीलाख्यौ जयश्च विजयस्तथा ।।३५।। धन्योऽसि विप्रार्थ्य यतस्त्वयैतद्व्रतं कृतं तुष्टिकारं जगद्गुरोः । यदर्थमोघात्फलमन्मुरारेः प्रणीषतेऽस्माभिरियं सलोकताम् ।।३६।।
मुद्गल उवाच
इत्थं तौ धर्मदत्तं तमुपदिश्य विमानगौ । तया कलहया सार्द्धं वैकुण्ठभवनं गतौ ।।३७।। धर्मदत्तोऽप्यसौ राजन् प्रत्यब्दं तद्व्रते स्थितः । देहान्ते परमं स्थानं भार्याभ्यामन्वितोऽन्वगात् ।।३८।। बहून्यब्दसहस्राणि स्थित्वा वैकुण्ठसद्मनि । ततः पुण्यक्षये जाते जातोऽमित्वं नृपो महान् ।।३९।। त्रिभिः स्त्रीभिर्दशरथ ते विष्णुः पुत्रतां गतः । शमोऽथ लक्ष्मणः शेषो भरतोऽब्जोऽरिमर्दनः ।।४०।। एवं सर्वं मयाऽऽख्यातं यथा पृष्टं त्वया मम । धन्यस्त्वं यस्य तनयः साक्षात्न्नारायणोऽभवत् ।।४१।।
इसलिए तुम भी दोनों स्त्रियोंके साथ कई हजार वर्ष पर्यन्त उनके सान्निध्यको प्राप्त होओगे ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् पुण्य क्षीण होनेपर जब तुम पुनः पृथ्वीपर आओगे, तब सूर्यवंशमें बड़े प्रख्यात राजा बनोगे ॥ २६ ॥ दोनों स्त्रियां तुम्हारे साथ रहेंगी और तुम श्रीमान् दशरथ नामके राजा बनोगे। उस समय यह आध पुण्यकी भागिनी कलहा निःसन्देह कैकेयी नामकी तुम्हारी तीसरी स्त्री होगी। वहाँ पूर्वापर भी भगवान् सदा तुम्हारे सन्निकट रहेंगे ॥ २७ । २८ ॥ वे प्रभु देवताओंका कार्य साधन करनेके लिए अपने आपको तुम्हारा पुत्र बनावेंगे तथा रामनाम धारण करके रावण आदिको मारकर राज्य करेंगे ॥ २९ ॥ विष्णुको प्रसन्न करनेवाले तुम्हारे जन्मसे लेकर किये हुए इस व्रतसे बढ़कर कोई यज्ञ, दान तथा तीर्थ आदि नहीं हैं। ३०॥ इस कारण आगे भी तुम धर्मज्ञ, नित्य विष्णुक व्रतमें स्थित और मात्सर्य दम्भ आदिसे रहित होकर समदर्शी बनो ॥ ३१ ॥ हे धर्मदत्त ! प्रतिवर्ष कार्तिक, वैशाख, चैत तथा माघ इन चारो महीनोंमें प्रातःकाल स्नान करके तुम एकादशीका व्रत और तुलसीका पूजन करो ब्राह्मण, गौ तथा वैष्णवभक्तोंकी सेवामें तत्पर रहा करो ॥ ३२ । ३३॥ मसूर, सोवीर तथा बैंगन आदिका खाना छोड़ दो। हे धर्मदत्त ! ऐसा करनेसे तुम भी जय-विजय तथा पुण्यशील-सुशील आदि हम लोगोंकी तरह विष्णुके उस परम पदको उनकी भक्तिभावसे ही प्राप्त होजाओगे ॥ ३४ । ३५ ॥ हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो क्योंकि तुमने जगद्गुरु विष्णुको सन्तुष्ट करनेवाला यह व्रत किया है, जिसके अमोघ पुण्यफलके प्रभावसे हमलोग भी मुरारि भगवान्की सलोकताको (समानलोकको) प्राप्त हुए हैं ॥ ३६ ॥ **मुद्गल बोले—**इस प्रकार वे दोनों धर्मदत्तको उपदेश दे तथा विमानमें बैठकर कलहाके साथ वैकुण्ठधामको चले गये ॥ ३७॥ हे राजन् ! वह धर्मदत्त भी प्रतिवर्ष उस व्रतको करके देहान्त होनेके बाद दोनों स्त्रियोंके साथ परमपदको प्राप्त हुआ ॥ ३८ ॥ बहुत वर्षों पर्यन्त वैकुण्ठ-धाममें रहकर पुण्यक्षय होनेके बाद यहाँ आकर वही तुम इतने बड़े राजा बने हो ॥ ३९ ॥ तुम अपनी तीनों स्त्रियोंके साथ यहाँ आये। विष्ण भगवान् तुम्हारे पुत्र राम बने, शेष लक्ष्मण बने, ब्रह्मा भरत बने तथा चक्र शत्रुघ्न बना ॥ ४० ॥ जो तुमने पूछा था, वह सब मैंने तुमको कह सुनाया। तुम धन्य हो। क्योंकि साक्षात् नारायण तुम्हारे पुत्र हुए हैं ॥ ४१ ॥ श्रीशिवजी