श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५
इत्युक्त्वा नृपतिं पूज्य विससर्ज मुनिसत्तमः । आलिंग्य रामं सौमित्रि मेने च कृतकृत्यताम् ॥४१॥
तदा राजा स्वसैन्येन महता हर्षसमन्वितः । अयोध्यां प्रययौ द्रष्टुं गोपुशालमवेक्षिताम् ॥४२॥
नृपस्यागमनं ज्ञात्वा मन्त्रिणः परया मुदा । पताकातोरणाद्यैश्च दिव्यचन्दनसेचनैः ॥४३॥
नगरीं भूषयित्वा ते नृत्यवाद्यादिमंगलैः । निर्गताः सम्भ्रमात्तूर्णं गच्छन्तं नगरीं प्रति ॥४४॥
गम्यमानममात्याय गोपुशाङ्गलपंक्तिषु । कट्यां विधाय बाह्वग्रं स्त्रियः स्थित्वा निजं करैः ॥४५॥
सुवर्णकुसुमाद्यैश्च वर्षैः पुष्पववृष्टिभिः । काश्चिन्मार्गोपरि स्थित्वा कंचरीपादिदर्शकैः ॥४६॥
आर्तिक्याद्यैश्च राजानं सगर्भ शांतिकारकःै । पूजयन्ति स्म ताः सर्वा राजमार्ग पृथक् पृथक् ॥४७॥
एवं नानामृदंगहैनर्तकीभिश्चिताप्सु । दृश्यमाना विलोकैश्च गायकानां च गायनैः ॥४९॥
सौधोद्भवरवाद्यैश्च स्त्रीमुक्तपुष्पवृष्टिभिः । ययौ स्वशिबिरं राजा वीज्यमानः सुचामरैः ॥५०॥
सम्पूज्य जनकस्यापि भ्रातॄनलंकारवाहनेः । सन्तर्क्य योजनाद्यैश्च प्रेषयामास मैथिलम् ॥५१॥
एवं सर्वोत्सवेषु जनको वार्षिकेषु सः । निनाय मिथिलां राममनुभिः पार्थिवेन च ॥५२॥
उत्सवान्तः पूज्य तोषयामास राघवम् । रामोऽपि रमयामास लीलाभिर्नृपतिं तदा ॥५३॥
प्राप्तं षष्ठमिदं तेजञ्छ्री श्रीराघवस्य लक्ष्मणा । लग्नाभिषेकाद्वादशे वर्षे रजोधूता बभूव ह ॥५४॥
तद्वार्तां जनकः श्रुत्वा परमेष्ठिम॑मन्त्रिभिः सह । अयोध्यागमच्छीघ्रं राजा प्रत्युज्जगाम तम् ॥५५॥
परस्परं समालिङ्ग्य साकेतमिथिलाधिपौ । नृत्यवाद्यमहोत्साहैर्योध्यौ विविशुः सुखम् ॥५६॥
ततो महासभामध्येनानामण्डपपोरणैः । कदलीस्तंभमालाभिरिक्षुदंडैः सुचामरैः ॥५७॥
चतुर्द्वारैर्मण्डपैश्च घटाघोषैः सददैर्ध्वजैः । किंकिणीजालघोषैश्च विश्रान्तीवरराजिभिः ॥५८॥
बोले कि ऐसा कहकर मुनिने राजाकी पूजा की और सब विदा किया । राम लक्ष्मणका आलिङ्गन करके उन्होंने अपनेको कृतकृत्य समझा ॥४१॥ तब राजा दशरथ अत्यन्त हर्षित अपनी सेनाके साथ पुरद्वार तथा अटरियोंमे लगे हुए रमणीक अयोध्यापुरीको गये । ४२ ॥ राजाका आगमन सुनकर मन्त्रियोंने तथा पुरवासियोंने पताकाओं तथा तोरणोंसे नगरको सजा मया मण्डपोंपर चन्दन छिड़कवाकर नृत्य और मांगलिक बाजे बाजनेके साथ मुष्टाव राजाको नगरके ले अया ॥४३॥४४॥ गमको आया जानकर स्त्रियं अपने बाल्मोंका कप्परपर उठाकर पुरद्वार तथा अटरियोंका अमियोंपर जाकर खड़ा हो गयीं और अपने हाथस उनपर सुवर्ण-पुष्पोंकी वृष्टि करने लगीं । कुछ स्त्रियों मार्ग से आग मागलिक कलश और कुछ मांगलिक दीप लेकर रास्ते में सामने खड़ी हो गयीं और वह राजमार्गमे जगह-जगह ऋत्विकाम अपनी आदिस रामके सहित राजाकी पूजा करने लगीं ॥४५-४८॥ इस प्रकार अनेक मृदङ्गराम युक्त वेश्याओंके नृत्य तथा नगाड़ोंके शब्दों एवं गायकोंके गानाके साथ अवलोक डरनेवाले स्त्रियों डंग को दया पुष्पवृष्टिम आच्छादित तथा सुन्दर चमरौँसे वीज्यमान हुए राजा दशरथ अपने शिविरम गये ॥४९॥५०॥ तदनन्तर वस्त्र, अलङ्कार, अश्वगजादि वाहन तथा भोजन आदिसे राज जनकक मन्त्रियोंका सत्कार करके उन्हें मिथिला भेज दिया ॥५१॥ इस प्रकार राजा जनक प्रत्येक वार्षिक उत्सवमें रामको उनकी माताओं तथा राजा दशरथको मिथिलापुरीमें बुलाते थे ॥५२॥ राजा जनक रामको सदा सन्तुष्ट रखनकी चेष्टा करत थ । राम भी अनेक लीलाओं द्वारा राजाको आनन्दित करते थे, सुन्दरी तथा शुभा जानकी रामसे छः महीना छोटी थी। विवाहके ग्यारहवें वर्षमें वे रजस्वला हुईं ॥५३॥५४॥ यह समाचार सुनकर राजा जनक अपनी स्त्रियों तथा मन्त्रियोंके साथ अयोध्या गये। राज दशरथने भी उनका अगवानी की ॥५५॥ अयोध्यापति तथा मिथिलाधिपति दोनों परस्पर जी भरकर गले मिले। सदनन्तर नृत्य वाद्य आदि उत्सवपूर्वक सुखस अयोध्यामें प्रविष्ट हुए ॥५६॥ पश्चात् विविध मण्डपों, तोरणों, केलके स्तम्भों, पुष्पोंकी मालाओं, ईखके दण्डों, चामरों, चार दरवाजेवाले मण्डपों, घण्टा-घड़ियालके शब्दों, छोटी-छोटी घंटियोंके समुदायके शब्दों, शीशी, चंदोवों तथा दीपपंक्तियों द्वारा