भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 65

सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ४९


वसिष्ठो मुनिभिः सार्द्धं गर्भाधानविधिं शुभम् । कारयामास रामेण सीतयाश्चातिहर्षितः ॥५९॥

ततो वस्त्रालङ्कारैर्जनको नृपतिं मुदा । पूजयामास सब्रातं स्नुषापुत्रसमन्वितम् ॥६०॥

मासमेकमतिक्रम्य ययौ स्वंनगरं सुखम् । रामोऽपि सीतया सार्द्धं नानाभोगान्मुहुन्मुदान् ॥६१॥

बुभुजे हेमरत्नौघनिर्मितेषु गृहेषु सः । कस्तूरीकुङ्कुमालिप्तो रामयोर्जनितः सुखम् ॥६२॥

एवं तासां नृपसुतपत्नीनां च पृथक् पृथक् । यथाकाले विधानेषु गर्भाधानादिकेषु च ॥६३॥

आगत्य जनकश्चक्रे नानारत्नांशुकादिभिः । अयोध्यानगरीयं वै वाद्यघोषो गृहे गृहे ॥६४॥

मङ्गलानि च सर्वत्र न कुत्राप्यप्यमङ्गलम् । न दरिद्रो क्षुधा नार्त्तो नाऽऽधिव्याधिप्रपीडितः ६५।

गवादिभिश्चतुर्भिर्येपृथग्भिन्नदशारथम् । पृथग्गेहेषु भार्याभिर्गार्हस्थ्यमध्वनुष्ठितम् ॥६६।

रामः प्रातः समुत्थाय कृतशौचादिक्रियः । आरुह्य शिबिकां दिव्यां स्नानार्थं सरयू नदीम् ॥६७॥

गत्वा कूले वाहनादि विसृज्य रघुनन्दनः । गरुडस्याग्रतः पावनार्थं सरय्वाः पुलिनं मुदा । ६८।

सविधिर्विहितो गत्वा नत्वा तां सरयूनदीम् । स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा ब्राह्मणैः परिवारितः । ६९॥

दत्त्वा दानान्यनेकानि गोधून्याम्बरादिभिः । संपूज्य सरयू पुण्यां ब्राह्मणान् पूज्य सादरम् । ७०॥

ययौ रथे समारूह्य शुक्लवस्त्रनयोधितम् । हयैर्मनोजवाऽश्वैश्च सर्वतः परिवेष्टितम् ॥७१॥

पट्टकूलादिवसनैर्वरंगच्छंश्चादितं शुभम् । राजितारं भार्गवता सुखात्नेन प्रबोदितम् ॥७२॥

किङ्किणीजालसम्भिन्नैर्घण्टाभिर्निनादितम् । रुक्मदण्डधरैर्दृप्तैरग्रे दर्शितसम्पथम् ॥७३॥

पथि पौरजनैः सर्वैरर्चितः पुष्पवृष्टिभिः । प्राप स्वाय गृहं रामः सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥७४॥

अवतीर्य रथाद्रामः पादयोर्धृत्य पादुके ददर्श सीतामदनपादाभ्यामाचमनां गृहम् ॥७५॥

गत्वाऽग्निहोत्रशालायां सीतयाऽऽसनमास्थितः । वाग्दौत्रादार्श्विना वह्निं हुत्वा ततः परम् । ७६॥


महान् उत्सवके साथ गुरु वसिष्ठने मुनियोंको साथ लेकर प्रसन्नचित्त सीतासहित रामका शुभ गर्भाधान-संस्कार किया । ५९-६० ।। तदनन्तर राजा जनकने स्त्रियों युक्त तथा पुत्रवधुओं सहित राजा दशरथको वस्त्र-अलङ्कार आदिसे प्रसन्नतापूर्वक पूजा क० ।। ६० ।। इस प्रकार एक मास अयोध्यामें रहकर आनन्दसे वे अपने नगरको लौट गये । राम भी सीताके साथ सुवर्ण-रत्नों आदिसे निर्मित भवनोंमें अनेक प्रकारके भोगोंको भोगते तथा उस समय रामके वदनपर सुगन्धित केशर लगा हुआ था ॥ ६१ ॥ ६२ ।। इसी प्रकार प्रत्येक राजपुत्रका व्याह गर्भाधानादिकालीन आनन्द राजा जनकने विशेष उत्सव किये और अयोध्या नगरीमे घर-घर बाजे बजे । ६३ । ६४ । सारी अयोध्या मङ्गलमयी हो गयी। कहीं भी अमङ्गलका नाम न था। उस समयमें कोई दरिद्र, ऋणी, मानसिक तथा शारीरिक दुःखसे पीडित नहीं था ।। ६५ । पश्चात् राम आदि चारों भाई अपना-अपना गिरोह हाय अलग-अलग महलोंमें गृहस्थधर्मका पालन करने लगे ।। ६६। राम प्रतिदिन प्रातः उठते तथा शौचादि कृत्यसे निवृत्त हो दिव्य पालकीपर सवार होकर स्नान करनेके लिये सरयू नदीपर जाते थे। सवारी आदिको किनारे छोड़ आनन्दसे सरयूको पवित्र करनेके लिये बालूकापर होत हुए वहीं जाते थे । ६७ ॥ ६८ ।। विधि पूर्वक सहित होकर वे सरयू नदीको नमस्कार करके स्नान तथा नित्यकर्म करते और ब्राह्मणोंका गौ भूमि, धान्य तथा सुवर्ण आदिका दान देकर पवित्र सरयू और ब्राह्मणोंकी सादर पूजा करते थे । ६९ . ७० ।। तदनन्तर सोनेके वचनोंसे बँधे हुए सुवर्णके कलगी जडितोंसे युक्त रेशम तथा मखमलके मुख्य वस्त्र द्वारा चारों ओरसे आच्छादित एवं वायुके वेगसे प्रेरित अति शोभन रथपर सवार होकर लौटते थे ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ घुंघुरूंकी आवाजों तथा घण्टियोंके शब्दसे मण्डित उस रथके आगे सोनेकी छडियोंवाले छडीदार दौड़कर मार्ग दिखलाते चलते थे । ७३ ॥ रास्तेमें शिष्यों द्वारा पूजित तथा पुष्पवृष्टिसे आच्छादित राम करोड़ों सूर्यके समान प्रभावसम्पन्न अपने गृहमें पधारते ७४ जहाँ रथसे उतरकर चरणपादुका हाथ में पहिनकर चरण धरते। यहाँ सीताजी सदा उन्हें पवित्र तथा हाथ मुँह धोनेका जल देती थी । ७५ । पश्चात् सीता समेत राम अग्निहोत्रशालामें जा तथा आसनपर बैठकर अग्निहोत्रकी विधिसे अग्निमें हवन