भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 66

५० आनन्दरामायणे [ सर्ग ५

स्फटिकस्य च लिङ्गस्य कर्ममार्गं यथाविधि । लोकानां शिक्षणार्थाय कृत्वा पूजनकन्त्वभूत् ॥७७॥ जानक्या दत्तपक्कान्नैर्नैवेद्यादि समर्प्य च । ब्राह्मणान्पूज्य दारांश्चन्तोष्य दृष्ट्वा तदाशिषः ॥७८॥ तुलसीं च गुरुं धेनुमश्वत्थं मुनिपादपम् । पूजयित्वा रविं देवं ब्रह्मयज्ञं विधाय च ॥७९॥ गुरोर्मुखाच्च पौराणीं कथां श्रुत्वा तु सीतया । गुरुं पुनः प्रपूज्याथ बन्धुभिः परिवेष्टितः ॥८०॥ प्रातराशं मृदुः पत्न्या ब्राह्मणैः परिवेषितः । नारिकेलकपित्थाम्रगुळभाण्डाम्लदधिभिः ॥८१॥ सजंब्रिक्षीपसंयवैः पक्वान्नैर्नूतनाशनैः । उपहारं मुखे कृत्वा ताम्बूलं परिगृह्य च ॥८२॥ दिव्यवस्त्राणि संगृह्य रङ्ग्याऽऽदर्शं निजं मुखम् । निरीक्ष्यैनाथ वैदेह्याऽऽरुह्य स्यन्दनमुत्तमम् ॥८३॥ वेष्टिता मन्त्रिदूताद्यैस्तूर्यध्वनिनुरःसरम् । मातृगेहं ततो गत्वा ताः प्रणम्यावेति मनः ॥८४॥ मध्या प्रदक्षिणां कृत्वा गत्वा गजगृहं ततः । सिंहासनस्थं राजानं नत्वा स्थित्वा तदाज्ञया । ८५॥ योजयामासत्यानेकानि कृत्वा गङ्गां विसर्जितः । ययौ स्यन्दनमारुह्य नृपं नत्वा पुनः पुनः ॥८६ । तूर्यगीतनिनार्दैश्च नर्तनैर्वारयोषिताम् । ययौ स्वीयं गृहं रामः स्यन्दनादवरुह्य च ॥८७॥ भूमिजादत्तपादाद्याचमनाद्यामनादिकम् । गृहीत्वा तद्धडिम्बौघा कृतं चेष्टां न्यवेदयन् ॥८८॥ सर्वं वृत्तं कौतुकेन हास्यगीतादिमङ्गलैः । रमयित्वा भूमिकन्यां दिव्यवस्त्रादिभूषिताम् ॥८९॥ ततो मध्याह्नसमये सय्यां वाऽथ सखीवृतेः । स्नात्वा माध्याह्निकं कर्म सकलं रघुनन्दनः ॥९०॥ नित्यं यत्राकरोत्स्नानं सरयूनिर्मले जले । तदाख्याऽऽभूत्तत्तीर्थे रामतीर्थमिति स्फुटम् ॥९१॥ तद्विष्टस्यानं त्रिशुबने चैत्रमासि विशेषतः । माध्याह्निकं च सप्ताद्यं ब्राह्मणैर्मित्रादिभिः ॥९२॥ इष्टैः सुवर्णपात्रेषु षिवडान्ने घृतेषु च । परिष्कृतेषु जानक्या सीतया गनिलक्षणान् ॥९३॥ कनककणमञ्जीरकिङ्किणीनपुरैरपि । नटन्त्य भोजनं चक्रे राघवो हर्षपूरितः ॥९४॥ करशुद्धिं विधायोच्चै भुक्त्वा ताम्बूलमुत्तमम् । ततः द्यूतपदं गत्वा निद्रां कृत्वा तु सीतया ॥९५॥

करते थे ॥ ७६॥ स्फटिकका कर्म करना यथार्थ उपलब्ध कर ... ने इसलिये शिवलिङ्गका पूजन करना और सीताके दिये हुए पक्वान्नादिकोंका भोग लगाते थे । तदनन्तर ब्राह्मणोंको प्रसन्न करके उन्हें दान आदिके द्वारा सन्तुष्ट करके उनका अनेक आशीर्वाद लेते थे ॥७७-७८॥ तदनन्तर तुलसी, गुरु, गौ, पीपल, शमी तथा सूर्यदेवकी पूजा और ब्रह्मयज्ञका विधान करके मादिके साथ गुरुमुखसे पौराणिक कथा सुनते थे फिर गुरुकी पूजा करके पश्चात् परिजन, बान्धवोंसे युक्त तथा बन्धुओंके साथ भोजन करते थे, जिसमें नारियल, कपित्थ, जामुन, अनार, खजूर, मट्ठा, दाल, आंवले और विविध प्रकारके पक्वान्नमें खीरवर भोजन करते थे ॥ ७९-८२॥ तत्पश्चात् दिव्य वस्त्र धारण करके शीशेमें मुख देख वैदेहीके सहित उत्तम रथपर चढ़ मन्त्री, दूत और मन्त्रिगणके साथ में भेरी आदि वाद्योंके साथ माताके महलमें गये और भूमिपर गिरकर उन्हें प्रणाम करते थे ॥८३-८४॥ फिर दाहिने आकर प्रदक्षिणा कर के राजा दशरथके महलमें जाते और वहां सिंहासनपर बैठे हुए राजाको प्रणाम करके उनका आज्ञासे बैठ जाते थे ॥ ८५ ॥ तब तदनन्तर राजसम्बन्धी अनेक कार्योंको समाप्त करके राजा उनको लौटा देते थे। तब फिर राजाको प्रणाम करके और रथपर सवार हो जाते रास्ते में तथा नाचनेके छन्दोंको सुनते हुए चले जाते तब रथसे उतरकर अपने घरमें जाते और सीताके हाथों प्रदत्त जलसे पाद हाथ मुंह आदि धोकर जो कुछ कार्य कर आये थे, वह सब सीताको कह सुनाते ॥ ८६-८८ ॥ पश्चात् दिव्य वस्त्रांग भूषित सीताको सुन्दर हास्यगान आदिके द्वारा प्रसन्न करते थे ॥ ८९ ॥ इसके बाद राम दोपहरको सरयू या घर ही में स्नान करके मध्याह्न कृत्य करते थे ॥ ९०। जिस जगह वे नित्यप्रति स्नान करते थे, उस स्थानका नाम रामतीर्थ पड़ गया ॥ ९१ ॥ तीनों लोक में वह स्थान प्रसिद्ध हो गया। विशेष करके चैत्रमासमें उसका बड़ा माहात्म्य है। मध्याह्नकृत्य करनेके बाद ब्राह्मणों, पण्डितों तथा मित्रजनोंके साथ नियत आदर रखते हुए सुन्दर परिष्कृत सुवर्णपात्रोंमें अन्नशालिदाली तथा जिनके अङ्ग-प्रत्यङ्गमें कंकण, झांझर, नूपुर और करधनी आदि गहने बज रहे थे, ऐसी सीताके साथ रघुपति राम हर्षपूर्वक भोजन करते थे ॥ ९२-९४॥ पश्चात् हाथ धो

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 66, कुल 811 में से · BharatKosha