श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ५ ] सारकाण्डम् ५१
पुनर्वस्त्राणि सम्धाय सुवस्त्रांश्च सदारकम् । धनुर्बाणं करं कृत्वा गथे पञ्चाऽथ बन्धुभिः ॥९६॥
मृगागमौद्यानकं दौरं दृष्ट्वा तु कातुकं च । वीक्ष्य पर्वतनद्यग्न्यां स्वार्थं गृहं पुनः ॥९७॥
सायंमध्यादि मरुत्वं पुनर्नुत्वा महेश्वरम् । शंभुं भक्त्या पुनः पूज्य कृत्वा चैवापहारकम् ॥९८॥
रत्नकांचनमणिस्वर्निर्मितं मञ्चके वरं । दिव्यप्रासादमध्यं च सीतया रघूनायकः । ९९
रात्र्यगातां विनोदेन्योन्या चक्रे ततः परम् । एव नानासमुत्सहैर्दिनेनायारुमनाः सुखम् ॥१००
एकदा राघव राजा ज्ञात्वा मुद्रलयस्ततः । वावष्टककरतश्चापि यत्रत्वं व्याप्यमानुषः ॥१०१॥
साक्षात्तनारायणं विष्णुं मन्वानुच रहः स्थितं । पप्रच्छ विनयेनैव हृदि भयं विधाय च । १०२।
राम नारायणस्त्वं हि भूभारहरणाय च । मत्तो जातोऽसि नै लोका वदन्त्यज्ञानबुद्धयः ॥१०३॥
अतः पृच्छामि ते राम म यया मोहितस्त्वहं । किंचिज्ज्ञानापदेशेन नामयाज्ञानजा मतिम् । १०४।
रागबन्धादिगेहेषु व्यथा नैवोपशाम्यति । तन्निपुत्वचनं श्रुत्वा गजानं रामनोऽब्रवीत् । १०५।
श्रीराम उवाच
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि तव ज्ञानार्थमुत्तमम् । शृणोतु मम मातेयं कौशल्याऽपि तव प्रिया ॥१०६॥
नश्वरं भासते चेतद्विद्य मायाद्भवं नृप । यथा शुक्तौ रौप्यभानः कामभूम्या जलस्य च ॥१०७॥
यथा रज्जौ सर्पभासो मृगतोये जलस्पृहा । तद्वदात्मनि भासोऽय कल्प्यते नश्वरोऽबुधैः १०८॥
अज्ञानादिभिर्नान्यं मन्यते न तु पण्डितैः । आत्मा शुद्धो निर्व्यतीकः सच्चिदानन्दलक्षणः । १०९।
यस्याऽज्ञानेन विधेशा ब्रह्माद्याः सकला वयम् । स्थिति-त्पत्तिविनाशार्थं नानारूपाणि मायया । ११० ।
धार्यंते नटवद्राजन्न लेपामक्त एव सः । यथा पत्रं न स्पृशति जलं मायो तथा नरुः ॥१११॥
आत्मा नित्यो न स्पृशति परमानन्दरिग्रहः । देहागारसुतस्त्रीषु मामकेति च या मतिः ॥११२॥
वस्त्र सम्भालकर भोजन दसरथके बाद साताके साथ आराम करते थे ॥ ९५ ॥ फिर वस्त्र पहिन तथा नाना ग्राम अनुप ज्ञान नगर बन्धुओंके साथ रथपर सवार होकर उद्यान, वन तथा बाका दृश्य, अनेक गान सुनन तथा नाच देखते हुए पुन अपने घर आ सायंमध्यादि नित्य कर्म करते और यथाविधि स्नान करके अनिश शिवजीका पूजा करते थे सायंकालका भोजन कर रत्नकाञ्चन तथा माणिक्यके सुन्दर शय्यापर दिव्य महलमे सीताके साथ हरवखत तथा विनोदपूर्वक शयन करते थे । इस प्रकार नानाप्रकारके सुखपूर्वक बारह वर्ष बीते गये ॥९६-१००। एक समय मुनि मुकुद तथा मुंड वासिष्ठक कह दि- और समझ कर वशिष्ठका दोष राजा दशरथने रामका साक्षात् नारायण समझकर एकान्तमें बुलाकर और भय स्वभाव तथा विनयपूर्वक कहने लगे-॥ १०१ ॥ १०२ ॥ हे राम ! तुम साक्षात् नारायण हो, तुमने भूमिके भार हरण करनेके लिए मेरे घर अवतार लिया है, ऐसा अज्ञानयुक्त बुद्धिवाले लोग कहते हैं। इस कारण हे राम ! तुम्हारी मायासे मोहित मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम ज्ञानका उपदेश देकर मेरा अज्ञान दूर कर दो ॥ १०३ । १०४॥ स्त्री, पुत्र एवं गृह आदिम अनुरागके कारण मेरी बुद्धि कभी शान्ति तथा सुखका अनुभव नहीं करती। पिताके इस वचनको सुनकर राम राजा दशरथसे बोले ॥१०५॥ श्रीरामने कहा- हे राजन् ! मैं आपका अज्ञाननाशके लिए उत्तम उपदेश देता हूँ। उसे आप तथा आपकी प्राणप्रिया और मेरी माता कौसल्या भी श्रवण करें सुनें ॥ १०६ । हे नृप ! मायासे उत्पन्न यह समस्त संसार आत्ममय उसी प्रकार सून भासित होता है जैसे कि सीपीमें चाँदी, रेतामें जल, रज्जुमें सांप तथा धूपमृगतृष्णाका सलिल भासित होता है। अज्ञानी लोग इस आत्म सत्ता को भिन्न तथा अनाश्वर समझते हैं, परन्तु पण्डित लोग तो इससे विपरीत ही मानते हैं। उनके मतमें आत्मा शुद्ध, नित्य तथा सच्चिदानन्दरूप है ॥ १०७ ॥ १०८। उनके अज्ञामात्रसे समस्त विश्वके स्वामी ब्रह्मादि तथा हम सब प्राणी मायाके अधीन होकर जगत्का स्थिति उत्पत्ति तथा विनाशके लिये नटकी तरह विविध रूपोंको धारण करते हैं किन्तु आत्मा स्वयं जिसमें आसक्त नहीं होता। जिस प्रकार कमल-पत्र जलका स्पर्श नहीं करता उसी प्रकार अमल, नित्य और परम आनन्दस्वरूप आत्मा भी मायासे निर्लिप्त