भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५

उपसंहृत्य बुद्ध्या मन्मयं ब्रह्मणि क्षिपेत् । यद्यत्कर्मावसानेऽथ तन्मन्मत्तोऽभवत्स्मरेत् ॥११३॥
एवं त्वं सर्वभावेन मुच्यसे भवसंकटात् । सत्यं शौचं दया शांतिः क्षमा चेन्द्रियनिग्रहः ॥११४॥
अहिंसा मत्पदद्वन्द्वमार्गालोकनमेव च । इत्याद्या ये गुणांस्तांस्तान् भजस्व निरन्तरम् ॥११५॥
शौर्यं द्यूतं विवादं च मात्सर्ये दंभमेव च । द्रोहेर्ष्यासंश्रयं चैव लोकनिन्द्यप्रवर्तनम् ॥११६॥
संतविप्रसतां चैव भक्तानां मानभंजनम् । निंदा पैशुन्यनृशंसं त्यज दूरं स्वतो नृप ॥११७॥
एवं मया नृपश्रेष्ठ पूर्वत्वं यत्कृतं मम । जन्मज्ञानोपसम्पन्नोऽहं कौशल्यायां नृपोद्भव ॥११८॥
यन्मया कथितं चैतदज्ञानमलनाशनम् । गोपनीयं प्रयत्नेन त्वयेदं न कुत्रचित् ॥११९॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा नष्टमोदस्ततो नृपः । सञ्जातपरितोषस्तु रोमांचितवपुस्ततः ॥१२०॥
प्रणनाम राघवस्य पादौ दृढभावतः । ततो रामः पुनः प्राह पितरं निर्मलाशयम् ॥१२१॥
नेदं वाच्यं त्वया राजन् वदनादि शिशुं प्रति । मायया मानवेषस्य मम उपहासकारणात् ॥१२२॥
मन्मयं च मां नित्यं भज भावेन सादरम् । मयि न्यस्ते महन्प्राणो मयि भक्तिं दृढां कुरु ॥१२३॥
इत्युक्त्वा पितरौ नत्वा गृहाद्याज्ञां तयोः प्रभुः । ययौ सभगवद्रूपः श्रीरामः स्वनिकेतनम् ॥१२४॥
कदा मातुर्गृहं गत्वा सीतया भोजनं व्यधात् । कदा भ्रातृगृहेष्वेव कदा पर्यंक पितुः स्वयम् ॥१२५॥
कदा दशरथं तातं भोजनार्थं निजे गृहे । भार्यापुत्रादिसंयुक्तं षड्रसैर्विप्रैः समन्वितम् ॥१२६॥
हृष्टो रामः समाहूय भोजयामास सादरम् । श्रीरामदर्शनार्थं ते तपोवननिवासिनः ॥१२७॥
अयोध्या नगरीमेत्य द्वारपालैरनिवारिताः । शतशः प्रत्यहं रामं दृष्ट्वा स्तुत्वा पुनः पुनः ॥१२८॥
आतिथ्यं रघुनाथस्य गृहीत्वा तुष्टमानसाः । सपद्मनादनाम्यैव रथन्त्या पुष्पकादिभिः ॥१२९॥
रमयित्वा सप्ताहादिं जग्मुः स्वं स्वं मदाश्रमम् । यत्र यत्र हि संपश्येत्प्रीत्या लीलां विदेहजा ॥१३०॥

रहते हैं। उपसंहृत्य उस ब्रह्म का विचार करके जब तक ब्रह्म का ज्ञान न हो जाय, समस्त वासनाओंको छोड़-
कर यह जो दृश्यमान संसार है उसको चिद्धन ब्रह्ममें अर्पित कर, यह सब जान गया और ईश्वरको सबमें
व्याप्त देखकर आप इस भवसङ्कटसे मुक्त हो जायेंगे, हे राजन् ! पहिले आप सत्यभाषण, पवित्रता, दया
शान्ति, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह, अहिंसा, अमल ज्ञान तथा हमारे स्वरूप के दर्शन आदि गुणोंका निरन्तर धारण
करें ॥ १०६-११५ ॥ हे नृप ! मार, जुआ, द्यूतो, परिवाद, ममता, द्रोह, मद, काम, अन्य निन्द्यवान् कामके
दृष्टान्त, संत-विप्र-साधु-सज्जनोंके धार्मिक कार्योंका भंजन, निन्दा और चुगलखोरी आदिको अपने चित्तसे दूर कर दें
॥ ११६ व ११७ ॥ हे नृप ! आपने पूर्वजन्ममें जो कुछ पूजन, गुणगान किया था। इसी कारण से आपके
द्वारा कौशल्याके गर्भसे पुत्ररूपमें जन्मवान् हुआ हूँ ॥११८॥ यह जो मैंने आपको अज्ञानरूपी मल नष्ट करने-
वाला उपदेश दिया है, उसे आप अपने मनमें ही गोपनीय रखना किसीसे कहिएगा नहीं ॥ ११९ ॥ रामके इस
उपदेशको सुनते ही राजाके मनका मायाकृत मोह दूर हो गया और वे इस समय परिपूर्ण तथा रोमांचित शरीर
होकर हर्षातिरेकसे राजा दशरथने रामके चरणोंको वन्दन किया । इस प्रकार निर्मल हृदयवाले पितासे
राम फिर कहने लगे - ॥ १२० ॥ १२१ ॥ हे राजन् ! मुझको प्रणाम करना आपका उचित नहीं है। मायासे
मनुष्यदेहधारी मेरा इससे उपहास होगा। इस कारण आप सदा आदरभावसे मनमें ही मेरा भजन किया
करें। मन तथा प्राणको मुझे अर्पण करके मेरी दृढ़ भक्ति करें ॥ १२२ ॥ ऐसा कह तथा माता पिताकी
आज्ञा लेकर श्रीरामने उनको नमस्कार किया और सादर सवार होकर अपने भवनको चले गये ॥ १२४ ॥
वे सीताके साथ कभी माताके महलमें आकर भोजन करते, कभी भाइयोंके भवनमें और कभी पिताके साथ
पंक्तिमें बैठकर भोजन करते थे। कभी स्त्रियों पुत्रों ब्राह्मणों तथा नागरिकोंके साथ पिता दशरथको अपने भवनमें
बुलाकर सादर हर्षपूर्वक भोजन कराते थे। प्रतिदिन सैकड़ोंकी संख्यामें वनवासी मुनिजन भी श्रीरामचन्द्रका
दर्शन करनेके लिये अयोध्या आते रहते थे। वे बिना रोकटोक भीतर जाकर रामका दर्शन तथा स्तुति करके
और रामके द्वारा किये हुए सत्कारको ग्रहण करके प्रसन्नतापूर्वक पाँच-सात दिन वहीं रहकर अपने-अपने