आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
पृष्ठ 10, कुल 78 में से
संदर्भ में पढ़ेंशरीर से धक्का लग सकता था, और झगड़ा बचाने के ख्याल से वे कुछ हटकर जंगल के किनारे खड़े हो गए। इसी समय एक सिपाही बोला--“यह देखो, एक डाकू भागता है!” महेंद्र के हाथ मे बंदूक देखकर उसका विश्वास दृढ़ हो गया। वह दौड़कर पहुंचा और एकाएक महेंद्र का गला पकड़कर साले चोर! कहकर उन्हे एक घूंसा जमाया और बंदूक छीन ली। खाली हाथ महेंद्र ने केवल घूंसे का जवाब घूंसे से दिया। महेंद्र को अचानक इस बर्ताव पर क्रोध आ गया था, यह कहना ही व्यर्थ है! घूंसा खाकर सिपाही चक्कर खाकर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। इस पर अन्य चार सिपहियो ने आकर महेंद्र को पकड़ लिया और उन्हे उस गोरे सेनापति के पास ले गए। अभियोग लगाया कि इसने एक सिपाही का खून किया है। गोरा साहब पाइप से तमाखू पी रहा था, नशे के झोके मे बोला--“साले को पकड़कर शादी कर लो।” सिपाही हक्का-बक्का हो रहे थे कि बंदूकधारी डाकू से सिपाही कैसे शादी कर ले? लेकिन नशा उतरने पर साहब का मत बदल सकता है कि शादी कैसे होगी- यही विचार कर सिपहियो ने एक रस्सी लेकर महेंद्र के हाथ-पैर बांध दिए और गाड़ी पर डाल दिया। महेंद्र ने सोचा कि इतने सिपहियो के रहते जो लगाना व्यर्थ है, इसका कोई फल न होगा; दूसरे स्त्री-कन्या के गायब होने के कारण महेंद्र बहुत दुःखी और निराश थे; सोचा-- अच्छा है, मर जाना ही अच्छा है! सिपहियो ने उन्हे गाड़ी के बल्ले से अच्छी तरह बांध दिया और इसके बाद धीर-गंभीर चाल से वे लोग फिर पहले की तरह चलने लगे। ब्रह्मचारी की आज्ञा पाकर भवानंद धीरे-धीरे हरिकीर्त्तन करते हुए उस बस्ती की तरफ चले, जहां महेंद्र का कन्या-पत्नी से वियोग हुआ था। उन्होने विवेचन किया कि महेंद्र का पता वही से लगना संभव है। उस समय अंग्रेजो की बनवायी हुई आधुनिक राहे न थी। किसी भी नगर से कलकत्ते जाने के लिए मुगल- सम्राटो की बनायी राह से ही जाना पड़ता था। महेंद्र भी पदचिह्न से नगर जाने के लिए दक्षिण से उत्तर जा रहे थे। भवानंद ताल-पहाड़ से जिस बस्ती की तरफ आगे बढ़े, वह भी दक्षिण से उत्तर पड़ती थी। जाते-जाते उनका भी उन धन-रक्षक सिपहियो से साक्षात हो गया। भवानंद भी सिपहियो की बगल से निकले। एक तो सिपहियो का विश्वास था कि इस खजाने को लूटने के लिए डाकू अवश्य कोशिश करेगे, उस पर राह मे एक डाकू- महेंद्र को गिरफ्तार कर चुके थे, अतः भवानंद को भी राह मे पाकर उनका विश्वास हो गया कि यह भी डाकू है। अतएव तुरंत उन सबने भवानंद को भी पकड़ लिया। भवननंद ने मुस्करा कर कहा--“ऐसा क्यो भाई?” सिपाही बोला--“तुम साले डाकू हो!” भवानंद--“देख तो रहे तो, गेरुआ कपड़ा पहने मैं ब्रह्मचारी हूं....... डाकू क्या मेरे जैसे होते हैं?” सिपाही--“बहुतेरे साले ब्रह्मचारी-संन्यासी डकैत रहते है।” यह कहते हुए सिपाही भवानंद के गले पर धक्का दे खींच लाए। अंधकार मे भवानंद की आंखो से आग निकलने लगी, लेकिन उन्होने और कुछ न कर विनीत भाव से कहा--“हुजूर! आज्ञा करो, क्या करना होगा?” भवानंद की वाणी से संतुष्ट होकर सिपाही ने कहा--“लो साले! सिर पर यह बोझ लादकर चलो।” यह कहकर सिपाही ने भवानंद के सिर पर एक गठरी लाद दी। यह देख एक दूसरा सिपाही बोला--“नही-नही भाग जाएगा। इस साले को भी वहां पहलेवाले की तरह बांधकर गाड़ी पर बैठा दो।” इस पर भवानंद को और उत्कंठा हुई कि पहले किसे बांधा है, देखना चाहिए। यह विचार कर भवानंद ने गठरी फेक दी और पहले सिपाही को एक थप्पड़ जमाया। अतः अब सिपहियो ने उन्हे भी बांधकर गाड़ी पर महेंद्र की बगल मे डाल दिया। भवानंद पहचान गए कि यही महेंद्रसिंह हैं।