भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 78 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 46

शांति- “यदि ऐसी मजाक की बात आपके मन मे है, तो सही, आपका कर्तव्य क्या है?” जीवानंद- “आपके शरीर के कपड़ो को बलपूर्वक हटा देने के बाद अधर-सुधापान!” शांति- “यह आपकी दृष्ट-बुद्धि है, या मेरे प्रति असाधारण भक्तिका परिचय मात्र है! आपने दीक्षा के अवसर पर शपथ ली है कि स्त्री के साथ एकासन पर कभी न बैठूंगा। यदि आपका यह विश्वास हो कि मै स्त्री हूं-ऐसा सर्प-रज्जु भ्रम अनेक को होता है- तो आपके लिए उचित यही है कि अलग आसन पर बैठे। मुझसे तो आपको बात भी नही करनी चाहिए!” यह कहकर शांति ने फिर पुस्तक पाठ मे मन लगाया। अंत मे परास्त होकर जीवानंद पृथक शय्या-रचना कर लेट गए। भगवान की अनुकंपा से 76 वे बंगाब्द का अकाल समाप्त हो गया। बंगाल प्रदेश के छः आना मनुष्यो को-नही कह सकते, कितने कोटि-यमपुरी को भेजकर वह दुर्वत्सर स्वयं काल के गाल मे समा गया। 77वे वर्ष मे ईश्वर प्रसन्न हुए। सुवृष्टि हुई, पृथ्वी शस्यश्यामला हुई; जो लोग बचे थे, उन्होने पेट भरकर भोजन किया। अनेक अनाहार या अल्पाहार से बीमार पड़ गए थे, पूरा आहार सह नही सके। बहुतेरे इसी मे मरे। पृथ्वी तो शस्यश्यामलिनी हुई, लेकिन जनशून्या हो गयी। बंगाल प्रदेश जंगलो से भर गया। जहां हंसती हुई हरियाली भूमि थी, जहां असंख्या गो-महिषो की चरने की भूमि थी, जो गांव की भूमि युवक-युवतियो की प्रमोद-भूमि थी-वह सब महारण्य मे परिणत होने लगी। इसी तरह एक वर्ष गया, दो वर्ष गए, तीन वर्ष गए। जंगल बढ़ते ही जाते थे। जो मनुष्यो के सुख के स्थान थे, वहां हिंसक शेर आदि पशु आकर हरिणो पर धावा बोलने लगे। दल बांधकर जहां सुंदरियां आलता-रंजित चरणो से पायजेब आदि पशु आकर हरिणो पर धावा बोलने लगे। दल बांधकर जहां सुंदरियां आलता-रंजित चरणो से पायजेब आदि की झनकार करती हुई, वृद्धाओ के साथ व्यंग करती हुई, हंसती हुई गुजरा करती थी, वही अब भालुओ ने अपने बच्चो को लालन-पालन शुरू किया है। जहां छोटी उम्र के बालक सांयकाल के समय जुटकर, फूले हुए पुष्प जैसा हृदय लेकर मनमोहक हंसी से स्थान गुंजया करते थे, अब वहां श्रृंगालो के विवर है। नाट्यमंदिरो मे दिन के समय सर्पराजो की भयंकर फुफकार सुनाई पड़ती है। अब बंगाल मे अन्न होता है; लेकिन कोई खाने वाला नही है। बिक्री के लिए पैदा करते है, लेकिन कोई खरीददार नही है। कृषक अनाज पैदा करते है, पर पैसे नही मिलते। जमीदार को वे लगान दे नही सकते। राजा के जमीदारी छीन लेने पर जमीदार सर्वहृत होकर दरिद्र हो गए। वसुमती के बहु-प्रसविनी होने पर भी जनता कंगाल हो गयी। चोर-डाकुओ ने माथा उठाया और साधु पुरुषो ने घर मे मुंह छिपाया। इधर संतान-संप्रदाय नित्य चंदन-तुलसी से विष्णु-पादपद्मो की पूजा करने लगा। जिनके घर मे पिस्तौल- बंदूके थी, संतानगण उससे वह छीन लाए। भवानंद ने सहयोगियो से कह दिया था-“भाई! यदि किसी घर मे मणि-माणिक्य गंजा हो और एक टूटी हुई बंदूक भी हो, तो बंदूक ले आना, धन-रत्न छोड़ देना।” इसके बाद ये लोग गांव-गांव मे अपने गुप्तचर भेजने लगे। पर लोग जहां हिंदू होते थे, कहते थे “भाई! विष्णु-पुजा करोगे!” इसी तरह बीस-पचीस संतान किसी मुसलमान बसती मे पहुंच जाते और उनके घर मे आग लगा देते थे; उनका सर्वस्व लूटकर हिंदू विष्णु-पुजको मे उसे वितरित कर देते थे। लूट का भाग पाने पर लोगो के प्रसन्न होने पर उन्हे संतानगण मंदिर मे लाकर विष्णुचरणो पर शपथ खिलाकर संतान बना लेते थे। लोगो ने देखा कि संतान होने मे बड़ा लाभ है। विशेषतः मुसलमानो राजत्वकाल मे उनकी अराजकता और कुशासन से लोग ऊब उठे थे। हिंदू धर्म की विलोपावस्था के समय अनेक हिंदू अपने देश मे हिंदुत्व-स्थापन के लिए व्यग्र हो रहे थे। अतः दिन-प्रतिदिन संतानो की संख्या बढ़ने लगी। प्रतिदिन सौ-सौ, मास मे हजार- हजार की संख्या मे ग्रामीण लोग संतान बनाकर उनकी संख्या वृद्धि कर मुसलमानो को शासन से विरत करने