भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

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अब तक संतानो के पास कोई रण-वाद्य नही था। अब न मालूम कहां से हजारो नगाड़े, ढोल, भेरी, शहनाई, तुरी, रामसिंघा, दमामा आ गये। तुमुल ध्वनि से नदी, तटभूमि और जंगल कांप उठा। इस प्रकार संतानो ने बहुत देर तक विजय का उत्सव मनाया। उत्सव के उपरांत सत्यानन्द स्वामी ने कहा-‘‘आज भगवान सदय हुए है; संतानो की विजय हुई है; धर्म की जय हुई है। लेकिन अभी एक बात बाकी है। जो हमलोगो के साथ इस उत्सव में शरीक न हो सके, जिन्होने हमारे उत्सव के लिए प्राण उत्सर्ग किए किए है, उन्हे हम लोगो को भूलना न चाहिए-विशेषतः उस वीराग्रगण्य भवानन्द को, जिसके अदम्य रण-कौशल से आज हमारी विजय हुई है। चलो, उसके प्रति हमलोग अपना अन्तिम कर्त्तव्य कर आएं।‘‘ यह सुनते ही संतानगण बड़े समारोह से ‘वन्देमातरम‘ आदि जय-ध्वनि करते हुए रणक्षेत्र मे पहुंचे। वहां उन लोगो ने चंदन-चिता सजा कर आदरपूर्वक भवानन्द की लाश सुलाई और आग लगा दी। इसके बाद वे लोग उस वीर की प्रदक्षिणा करते हुए ‘वन्देमातरम्‘ का गीत गाते रहे। संतान-सम्प्रदाय विष्णुभक्त है, वैष्णव सम्प्रदाय नही। अतः इनके शव जलाए ही जाते थे। इसके उपरांत उस कानन मे केवल सत्यानन्द, जीवानन्द, महेंद्र, नवीनानन्द और धीरानन्द रह गए। यह पांचो जन परामर्श के लिए बैठ गए। सत्यानन्द ने कहा-‘‘इतने दिनो से हम लोगो ने अपने सर्वकर्म, सर्वसुख त्याग रखे थे, आज यह व्रत सफल हुआ है। अब इस प्रदेश मे यवन सेना नही रह गयी है। जो थोड़ी-बहुत बच गयी है, वह एक क्षण भी हमारे सामने टिक नही सकती। अब तुम लोग क्या परामर्श देते हो?‘‘ जीवानन्द ने कहा-‘‘चलिये, इसी समय चलकर राजधानी पर अधिकार करे।‘‘ सत्यानन्द-‘‘मेरा भी ऐसा मत है।‘‘ धीरानन्द-‘‘सेना कहां है?‘‘ जीवानन्द-‘‘क्यो, यही सेना!‘‘ धीरानन्द-‘‘यही सेना है कहां? किसी को देख रहे है?‘‘ जीवानन्द-‘‘स्थान-स्थान पर ये लोग विश्राम कर रहे होगे; डंके पर चोट पड़ते ही इकट्ठे हो जाएंगे।‘‘ धीरानन्द-‘‘एक आदमी भी न पा सकेगे।‘‘ सत्यानन्द-‘‘क्यो?‘‘ धीरानन्द-‘‘सब इस समय लूट-पाट मे व्यस्त हैं। इस समय सारे गांव आरक्षित है। मुसलमानो के गांव और रेशम की कोठी लूटने के बाद ही वे लोग घर लौटेंगे। अभी किसी को न पाएंगे, मै देख आया हूं।‘‘ सत्यानन्द दुखी हुए बोले-‘‘जो भी हो, इस समय यह समूचा प्रदेश हमारे अधिकार मे आ गया है। अब यहां कोई हमारा प्रतिद्वन्द्वी नही है। अतएव इस वीरेन्द्र भूमि मे तुम लोग अपना सन्तान-राज्य प्रतिष्ठित करो। प्रजा से कर वसूल करो और सैन्य-संग्रह करो। हिन्दुओ का राज्य हो गया है, यह सुनकर बहुतेरी संतान-सैन्य तुम्हारे झण्डे के नीचे आ जाएगी।‘‘ इस पर जीवानन्द आदि ने सत्यानन्द को प्रणाम किया और कहा-‘‘यदि आज्ञा हो महाराजाधिराज! तो हम लोग इसी जंगल मे आपका सिंहासन स्थापित कर सकते है।‘‘ सत्यानन्द ने अपने जीवन मे यह प्रथम बार क्रोध प्रकट किया बोले-‘‘क्या कहा? क्या मुझे केवल कच्चा घड़ा ही समझ लिया है? हमलोग कोई राजा नही है, हम केवल संन्यासी है। इस प्रदेश के राजा स्वयं बैकुण्ठनाथ है, जहां प्रजातन्त्र-राज्य स्थापित होगा। नगर अधिकारी के बाद तुम्ही लोग कार्यकर्ता होगे। मै तो ब्रह्मचर्य-शक्ति के अतिरिक्त और कुछ भी स्वीकार न करूंगा। अब तुम लोग अपने-अपने काम मे लगो।‘‘