भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

इस पर चारो व्यक्ति प्रणाम करने के बाद उठ गए। सत्यानंद ने इशारे से महेन्द्र को बैठे रहने के लिए कहा, अतः वे तीनो चले गए। अब सत्यानंद ने महेन्द्र से कहा- "तुम लोगो ने विष्णुमण्डप मे शपथ ग्रहण का सनातन धर्म स्वीकार किया था। भवानन्द और जीवानंद दोनो ने ही प्रतिज्ञा भंग की है। भवानन्द ने स्वीकृत प्रायश्चित कर लिया। हमे इस बात का भय है कि कही जीवानन्द भी किसी दिन प्रायश्चित न कर बैठे। लेकिन मेरा किसी निगूढ़ कारणवश विश्वास है कि वह अभी ऐसा न करेगा। अकेले तुम्ही ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की है। अब संतानो का कार्योद्धार हो गया है। तुम्हारी प्रतिज्ञा थी कि जब तक संतानो का कार्योद्धार न होगा, स्त्री-कन्या का मुंह न देखोगे। अब कार्योद्धार हो चुका है, अतः तुम फिर संसारी हो सकते हो।" महेन्द्र की आंखो से आंसू की धारा बह निकली। बड़े कष्ट से महेन्द्र ने कहा- "महाराज! किसे लेकर संसारी बनूं? स्त्री ने आत्म हत्या कर ली, कन्या कहां है- पता नही! कहां-कहां खोजता फिरूंगा? कुछ भी तो नही जानता।" इस पर सत्यानंद ने नवीनानंद को बुलाकर कहा- "महेद्र, ये नवीनानंद गोस्वामी है- बहुत ही पवित्रचेता और मेरे परम प्रिय शिष्य है। तुम्हारी कन्या की खोज कर देगे।" कहकर सत्यानंद ने शांति से कुछ इशारे से कहा। शांति समझकर प्रणाम कर विदा होना चाहती थी, इसी समय महेद्र ने कहा-"तुम्हारे साथ कहां मुलाकात होगी?" शांति ने कहा- "मेरे आश्रम मे आइये।" यह कहकर शांति आगे-आगे चली। महेद्र भी सत्यानंद की पदवंदना कर विदा हुए, फिर शांति के साथ-साथ उसके आश्रम मे उपस्थित हुए? उस समय काफी रात बीत चुकी थी। फिर भी विश्राम न कर शांति ने नगर की तरफ यात्रा की। सबके चले जाने पर सत्यानंदन भूमि पर प्रणत होकर भगवान की वंदना और याद करने लगे। पौ फट रही थी। इसी समय किसी ने आकर उनके मस्तक का स्पर्श कर कहा- "मैं आ गया हूं।" ब्रह्मचारी ने उठकर और चकित व्यग्रभाव से कहा- "आप आ गए क्या!" जो आए थे उन्होने कहा- "दिन पूरे हो गए।" ब्रह्मचारी ने कहा- "हे प्रभु! आज क्षमा कीजिए। आगामी माघी पूर्णिका को मै आपकी आज्ञा का पालन करूंगा।" उस रात को हरिध्वनि के तुमुल नाद से प्रदेश भूमि परिपूर्ण हो गई। संतानो के दल-के-दल उस रात यत्र- तत्र 'वंदेमातरम' और 'जय जगदीश हरे' के गीत गाते हुए घूमते रहे। कोई शत्रु-सेना का शस्त्र तो कोई वस्त्र लूटने लगा। कोई मृत देह के मुंह पर पदाघात करने लगा, तो कोई दूसरी तरह का उपद्रव करने लगा, कोई गांव की तरफ तो कोई नगर की तरफ पहुंचकर राहगीरो और गृहस्थो को पकड़कर कहने लगा- "वंदेमातरम कहो, नही तो मार डालूंगा।" कोई मैदा-चीनी की दुकान लूट रहा था, तो कोई ग्वालो के घर पहुंचकर हांडी भर दूध ही छीनकर पीता था। कोई कहता- "हम लोग ब्रज के गोप आ पहुंचे, गोपियां कहां है?" उस रात मे गांव- गांव मे, नगर-नगर मे महाकोलाहल मच गया। सभी चिल्ला रहे थे- " मुसलमान हार गये; देश हम लोगो का हो गया। भाइयो! हरि-हरि कहो!"-गांव मे मुसलमान दिखाई पड़ते ही लोग खदेड़कर मारते थे। बहुतेरे लोग दलबद्ध होकर मुसलमानो की बस्ती मे पहुंचकर घरो मे आग लगाने और माल लूटने लगे। अनेक मुसलमान दाढ़ी मुंढ़वाकर देह मे भस्मी रमाकर राम-राम जपने लगे। पूछने पर कहते- "हम हिंदू है।" त्रस्त मुसलमानो के दल-के-दल नगर की तरफ भागे। राज-कर्मचारी व्यस्त हो गए। अवशिष्ट सिपाहियो को

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