आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुसज्जित कर नगर रक्षा के लिए स्थान-स्थान पर नियुक्त किया जाने लगा। नगर के किले मे स्थान-स्थान पर, परिखाओ पर और फाटक पर सिपाही रक्षा के लिए एकत्रित हो गए। नगर के सारे लोग सारी रात जागकर “क्या होगा... क्या होगा?” करते रात बिताने लगे। हिंदू कहने लगे- “आने दो, संन्यासियो को आने दो- हिंदुओ का राज्य- भगवान करे- प्रतिष्ठित हो!” मुसलमान कहे लगे-“इतने रोज के बाद क्या सचमुच कुरानशरीफ झूठा हो गया? हम लोगो ने पांच वक्त नवाज पढ़कर क्या किया, जब हिंदुओ की फतह हुई। सब झूठ है!” इस तरह कोई रोता हुआ, तो कोई हंसता हुआ बड़ी उत्कंठा से रात बिताने लगा। यह खबर कल्याणी के कानो मे भी पहुंची आबाल-वृद्ध-वनिता किसी से भी बात छिपी न रही। कल्याणी ने मन-ही-मन कहा- “जय जगदीश हरे! आज तुम्हारा कार्य सिद्ध हुआ। आज मै स्वामी-दर्शन के लिए यात्रा करूंगी। हे प्रभु! आज मेरी सहायता करो।” गहरी रात को कल्याणी शय्या से उठी और उसने पहले खिड़की खोलकर राह देखी। राह सूनी पड़ी हुई थी- कोई राह मे न था। तब उसने धीरे से दरवाजा खोलकर गौरी देवी का घर त्यागा। शाही राह पर आकर उसने मन-ही-मन भगवान को स्मरण कर कहा- “देव! आज पदचिन्ह का दर्शन करा दो।” कल्याणी नगर के किनारे पहुंची। पहरेवाला ने आवाज दी- “कौन जाता है?” कल्याणी ने डरकर उत्तर दिया- “मै औरत हूं!” पहरेदार ने कहा- “जाने का हुक्म नही है।” वह आवाज जमादार के कान मे पहुंची। उसने कहा- “जाने की मनाही नही है; जाने की मनाही नहीं है।” यह सुनकर पहरेवाले ने कहा- “जाने की मनाही नही है, माई! जाओ, लेकिन आज रात को बड़ी आफत है। कौन जाने माई! किसी आफत मे पड़ जाओ- डाकुओ के हाथ मे पड़ जाओ, मै नही जानता? आज तो न जाना ही अच्छा है।” कल्याणी ने कहा- “बाबा! मै भिखारिन हूं। मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है। डाकू मुझे पकड़ कर क्या करेगे?” पहरेवाले ने कहा- “उम्र तो है, माई जी! उम्र तो है न! दुनिया मे वही तो जवाहरत है। बल्कि हमी डाकू हो सकते हैं!” कल्याणी ने देखा, बड़ी विपद है; वह धीरे से सरक गयी और फिर तेजी से आगे बढ़ी! पहरेदार ने देखा कि औरत रसिक मिजाज नही थी, लाचार होकर पहरे पर बैठा गांजे का दम लगाकर ही संतुष्ट हो गया। उस रात राह मे दल-के-दल घूम रहे थे। कोई मार-मार कहता है, तो कोई भागो-भागो चिल्लाता है। कोई हंसता है, कोई रोता है, कोई राह मे किसी को देखकर पकड़ लेता है। कल्याणी बड़ी विपदा मे पड़ी। राह मालूम नही, और फिर किसी से पूछ भी नही सकती, केवल छिपती हुई राह चलने लगी। छिपते-छिपते एक विद्रोही दल के हाथ मे पड़ गई। वे लोग चिल्लाकर पकड़ने दौड़े। कल्याणी प्राण लेकर जंगल के अंदर घुसकर भागी। वे सब शोर मचाते हुए पकड़ने के लिए पीछे दौड़े। आखिर एक ने आंचल पकड़ लिया, बोला- “वाह री, चंद्रमुखी!” इसी समय एक और आदमी अकस्मात पहुंच गया और अत्याचारी को उसने एक लाठी जमायी; वह आहत होकर भागा। परित्राणकर्ता का वेश संन्यासियो का था और उसकी छाती ढंकी हुई थी! उसने कल्याणी से कहा- “तुम भय न करो। मेरे साथ आओ- कहां जाओगी?” कल्याणी-“पदचिह्न।” आगंतुक चौंक उठा, विस्मित हुआ; पूछा- “क्या कहा? पदचिह्न?” यह कहकर कल्याणी के दोनो कन्थो पर हाथ रखकर गौर से चेहरा देखने लगा। कल्याणी अकस्मात पुरुष-स्पर्श से भयभीत तथा रोमांचित होकर रोने लगी। इतनी हिम्मत नही हुई कि भाग सके। आगन्तुक ने भरपूर देख लेने के बाद कहा- “ओ हो, पहचान गया! तुम्ही डायन कल्याणी हो?” कल्याणी ने भयविह्वल होकर पूछा-“आप कौन है?”