आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
सुसज्जित कर नगर रक्षा के लिए स्थान-स्थान पर नियुक्त किया जाने लगा। नगर के किले मे स्थान-स्थान पर, परिखाओ पर और फाटक पर सिपाही रक्षा के लिए एकत्रित हो गए। नगर के सारे लोग सारी रात जागकर “क्या होगा... क्या होगा?” करते रात बिताने लगे। हिंदू कहने लगे- “आने दो, संन्यासियो को आने दो- हिंदुओ का राज्य- भगवान करे- प्रतिष्ठित हो!” मुसलमान कहे लगे-“इतने रोज के बाद क्या सचमुच कुरानशरीफ झूठा हो गया? हम लोगो ने पांच वक्त नवाज पढ़कर क्या किया, जब हिंदुओ की फतह हुई। सब झूठ है!” इस तरह कोई रोता हुआ, तो कोई हंसता हुआ बड़ी उत्कंठा से रात बिताने लगा। यह खबर कल्याणी के कानो मे भी पहुंची आबाल-वृद्ध-वनिता किसी से भी बात छिपी न रही। कल्याणी ने मन-ही-मन कहा- “जय जगदीश हरे! आज तुम्हारा कार्य सिद्ध हुआ। आज मै स्वामी-दर्शन के लिए यात्रा करूंगी। हे प्रभु! आज मेरी सहायता करो।” गहरी रात को कल्याणी शय्या से उठी और उसने पहले खिड़की खोलकर राह देखी। राह सूनी पड़ी हुई थी- कोई राह मे न था। तब उसने धीरे से दरवाजा खोलकर गौरी देवी का घर त्यागा। शाही राह पर आकर उसने मन-ही-मन भगवान को स्मरण कर कहा- “देव! आज पदचिन्ह का दर्शन करा दो।” कल्याणी नगर के किनारे पहुंची। पहरेवाला ने आवाज दी- “कौन जाता है?” कल्याणी ने डरकर उत्तर दिया- “मै औरत हूं!” पहरेदार ने कहा- “जाने का हुक्म नही है।” वह आवाज जमादार के कान मे पहुंची। उसने कहा- “जाने की मनाही नही है; जाने की मनाही नहीं है।” यह सुनकर पहरेवाले ने कहा- “जाने की मनाही नही है, माई! जाओ, लेकिन आज रात को बड़ी आफत है। कौन जाने माई! किसी आफत मे पड़ जाओ- डाकुओ के हाथ मे पड़ जाओ, मै नही जानता? आज तो न जाना ही अच्छा है।” कल्याणी ने कहा- “बाबा! मै भिखारिन हूं। मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है। डाकू मुझे पकड़ कर क्या करेगे?” पहरेवाले ने कहा- “उम्र तो है, माई जी! उम्र तो है न! दुनिया मे वही तो जवाहरत है। बल्कि हमी डाकू हो सकते हैं!” कल्याणी ने देखा, बड़ी विपद है; वह धीरे से सरक गयी और फिर तेजी से आगे बढ़ी! पहरेदार ने देखा कि औरत रसिक मिजाज नही थी, लाचार होकर पहरे पर बैठा गांजे का दम लगाकर ही संतुष्ट हो गया। उस रात राह मे दल-के-दल घूम रहे थे। कोई मार-मार कहता है, तो कोई भागो-भागो चिल्लाता है। कोई हंसता है, कोई रोता है, कोई राह मे किसी को देखकर पकड़ लेता है। कल्याणी बड़ी विपदा मे पड़ी। राह मालूम नही, और फिर किसी से पूछ भी नही सकती, केवल छिपती हुई राह चलने लगी। छिपते-छिपते एक विद्रोही दल के हाथ मे पड़ गई। वे लोग चिल्लाकर पकड़ने दौड़े। कल्याणी प्राण लेकर जंगल के अंदर घुसकर भागी। वे सब शोर मचाते हुए पकड़ने के लिए पीछे दौड़े। आखिर एक ने आंचल पकड़ लिया, बोला- “वाह री, चंद्रमुखी!” इसी समय एक और आदमी अकस्मात पहुंच गया और अत्याचारी को उसने एक लाठी जमायी; वह आहत होकर भागा। परित्राणकर्ता का वेश संन्यासियो का था और उसकी छाती ढंकी हुई थी! उसने कल्याणी से कहा- “तुम भय न करो। मेरे साथ आओ- कहां जाओगी?” कल्याणी-“पदचिह्न।” आगंतुक चौंक उठा, विस्मित हुआ; पूछा- “क्या कहा? पदचिह्न?” यह कहकर कल्याणी के दोनो कन्थो पर हाथ रखकर गौर से चेहरा देखने लगा। कल्याणी अकस्मात पुरुष-स्पर्श से भयभीत तथा रोमांचित होकर रोने लगी। इतनी हिम्मत नही हुई कि भाग सके। आगन्तुक ने भरपूर देख लेने के बाद कहा- “ओ हो, पहचान गया! तुम्ही डायन कल्याणी हो?” कल्याणी ने भयविह्वल होकर पूछा-“आप कौन है?”
आगन्तुक ने कहा, "मै तुम्हारा दासानुदास हूं। हे सुन्दरी! मुझ पर प्रसन्न हो।" कल्याणी बड़ी तेजी से वहां से हटकर गर्जन कर बोली- "क्या यह अपमान के लिए ही आपने मेरी रक्षा की थी? देखती हूं, ब्रह्मचारियो का क्या यही धर्म है? आज मैं निःसहाय हूं, नही तो तुम्हारे चेहरे पर लात लगाती।" ब्रह्मचारी ने कहा- "अयि स्मितवदने! मैं बहुत दिनो से तुम्हारे पुष्प समान कोमल शरीर के आलिंगन की कामना कर रहा हूं?" यह कहकर दौड़कर ब्रह्मचारी ने कल्याणी को पकड़ लिया और जबर्दस्ती छाती से लगा लिया। अब कल्याणी खिलखिला कर हंस पड़ी, बोली "यह तुम्हारा कपाल है। पहले ही कह देना था- भाई, मेरी भी यही दशा है।" शान्ति ने पूछा- "क्यो भाई! महेन्द्र की खोज मे चली हो?" कल्याणी ने कहा-"तुम कौन हो? तुम तो सब कुछ जानती हो!" शान्ति बोली- "मै ब्रह्मचारी हूं, सन्तान -सेना का अधिनायक -घोरतर वीर पुरुष! मैं सब जानता हूं आज राह मे सिपाहियो का बहुत हुड़दंग ऊधम है, अतः आज तुम पदचिन्ह जा न सकोगी!" कल्याणी रोने लगी। शान्ति ने त्योरी बदलकर कहा-"डरती क्यो हो? हम अपने नयनबाणो से हजारो का वध कर सकते हैं- चलो, पदचिन्ह चले।" कल्याणी ने ऐसी बुद्धिमती स्त्री की सहायता पाकर मानो हाथ बढ़ाकर स्वर्ग पा लिया। बोली- "तुम जहां कहोगी, वही चलूंगी।" शान्ति कल्याणी को लेकर जंगली राह से चल पड़ी। झ्रध्रह्वघ्रजब आधी रात को शान्ति अपना आश्रम त्यागकर नगर की तरफ चली, तो उस समय जीवानंद वहां उपस्थित थे। शान्ति ने जीवानंद से कहा- "मै नगर की तरफ जाती हूं । महेन्द्र की स्त्री को ले आऊंगी। तुम महेन्द्र से कह रखो कि तुम्हारी स्त्री जीवित है।" जीवानंद ने भवानंद से कल्याणी के जीवन की सारी बाते सुनी थी और उसका वर्तमान वास-स्थान भी सुन चुके थे। क्रमशः ये सारी बाते महेन्द्र को सुनाने लगे। पहले तो महेन्द्र को विश्वास न हुआ। अन्त मे अपार आनंद से अभिभूत अवाक हो रहे। उस रात के बीतने पर सबेरे, शान्ति की सहायता से महेन्द्र के साथ कल्याणी की मुलाकात हुई । निस्तब्ध जंगल के बीच अतिघनी शालतस् श्रेणी की अंधेरी छाया के बीच, पशु-पक्षियो की निद्रा टूटने के पहले उन लोगों का परस्पर मिलन हुआ। म्लान अरण्य मे फूटनेवाली पहली आभामयी किरणे और नक्षत्रराज ही साक्षी थे। दूर शिला-संघर्षिणी नदी का कलकल प्रवाह हो रह था तो कही अरुणोदय की लालिमा से प्रफुल्ल-हृदय कोकिल की कुहू ध्वनि सुनाई पड़ जाती थी। क्रमशः एक पहर दिन चढ़ा। वहां शांति और जीवानंद आये। कल्याणी ने शांति से कहा- "मै आप लोगो के हाथ बिना मूल्य के बिक चुकी हूं। मेरी कन्या का पता लगाकर मेरे उस उपकार को पूर्ण कीजिए।" शांति ने जीवानंद के चेहरे की तरफ देखकर कहा- "मै अब सोऊं गा। आठ पहर बीते, मैं बैठा तक नही । आखिर मैं भी पुरुष हूं!" कल्याणी जरा मुस्कुरा दी। जीवानंद ने महेन्द्र की तरफ देखकर कहा- "यह भार मेरे ऊपर रहा। आप लोग पदचिन्ह की यात्रा कीजिए- वही आपकी कन्या पहुंचा दूंगा!" जीवानंद भैरवीपुर-निवासी बहिन के पास से लड़की लाने चले। पर कार्य सरल न था!
पहले तो निमाई बात ही खा गई। इधर-उधर ताका, फिर एक-बारगी उसका मुंह फूलकर कुप्पा हो गया! इसके बाद वह रो पड़ी, बोली-“लड़की न दूंगी।' निमाई अपनी उल्टी हथेलियो से आंसू पोछने लगी। जीवानंद ने कहा- “अरे बहन! तू रोती क्यों? ऐसा दूर भी तो नही है- न हो, बीच-बीच में उन लोगो के घर जाकर लड़की को देख आया करना।' निमाई ने होठ फुलाकर कहा- “तो तुम लोगो की लड़की है, ले क्यो नही जाते? मुझसे क्या मतलब?" यह कहकर निमाई लड़की को उठा लाई और जीवानंद के पैर के पास पटककर वही बैठकर रोने लगी। अतः जीवानंद और कोई फुसलाने की राह न देखकर इधर-उधर की बाते करने लगे। लेकिन निमाई का क्रोध न गया। निमाई उठकर सुकुमारी के पहनने के कपड़े, उसके खेलने के खिलौने- बोझ के बोझ लाकर जीवानंद के सामने पटकने लगी। सुकुमारी स्वयं उन सबको बटोरने लगी। उसने निमाई से पूंछा- “क्यो मां ! मैं कहां जाऊंगी?" अब निमाई सह न सकी। उसने सुकुमारी को गोद मे उठा लिया ओर चली गयी।द्मद्मद्म पदचिन्ह के नये दुर्ग मे आज बड़े सुख से महेन्द्र, कल्याणी, जीवानंद, शांति निमाई के पति और सुकुमारी – सब एकत्र है। सब आज सुख में विभोर है-आनंदमग्न है। शांति जिस रात कल्याणी को ले आयी, उसी रात उसने कह दिया था कि वह अपने पति महेन्द्र से यह न कहे, कि नीवनानंद जीवानंद की पी है। एक दिन कल्याणी ने उसे अंतःपुर मे बुला भेजा! नवीनानंद अतःपुर मे घुस गया। उसने प्रहरियो की एक न सुनी। शांति ने कल्याणी के पास आकर पूछा-“क्यो बुलाया है?" कल्याणी -“पुरुष-वेश मे कितने दिनो तक रहेगी? न मुलाकात हो पाती है, न बाते होती है। मेरे पति के सामने तुम्हे प्रकट होना पड़ेगा।" नवीनानंद बड़ी चिन्ता मे डूब गये- कुछ देर तक बोले ही नही। अन्त मे बोले-“इनमे अनेक विघ्न है, कल्याणी !“ दोनो मे इसी तरह बाते होने लगी। इधर जो प्रहरी नवीनानंद को जोर देकर अन्तःपुर मे जाने से मना कर रहे थे, उन्होने महेन्द्र से जाकर कहा कि नवीनानंद जबरदस्ती, मना करने पर भी अन्दर चले गये हैं। कौतूहलवश महेन्द्र भी अन्तःपुर मे गये। महेन्द्र ने सीधे कल्याणी के कमरे मे जाकर देखा कि नवीनानंद कमरे मे खड़े हैं और कल्याणी उनके शरीर के बाघम्बर की गांठ खोल रही है। महेन्द्र बड़े अचम्भे मे आए- बहुत ही नाराज हुए। नवीनानंद ने उन्हे देख हंसकर कहा- “क्यो, गोस्वामी जी! सन्तान पर अविश्वास? “ महेन्द्र ने पूछा- “क्या भवानंद विश्वासी थे?" नवीनानंद ने आंखे दिखाकर कहा-“कल्याणी क्या भवानंद के शरीर पर हाथ रखकर बाघ की खाल खोलती थी?" यह कहते हुए शांति ने कल्याणी का हाथ दबाकर पकड़ लिया बाघम्बर खोलने न दिया। महेन्द्र -“तो इससे क्या हुआ?" नवीनानंद-“मुझ पर अविश्वास कर सकते है लेकिन कल्याणी पर कैसे अविश्वास कर सकते है?" अब महेन्द्र अप्रतिभ हुए बोले- “कहां, मै अविश्वास कब करता हूं?" नवीनानंद -“नही तो मेरे पीछे अंतःपुर मे क्यो आ उपस्थित हुए?" महेन्द्र - “कल्याणी से कुछ बाते करनी थी, इसलिए आया हूं।" नवीनानंद -“तो इस समय जाइए! कल्याणी के साथ मुझे भी कुछ बाते करनी है। आप चले जाइए, मै पहले बात करूंगा। आपका तो घर है, आप जब चाहे आकर बात कर सकते है। मैं तो बड़े कष्ट से आ पाया हूं।"
महेन्द्र बेवकूफ बन गये। वे कुछ भी समझा न पाते थे- यह सब बात तो अपराधियो जैसी नही है। कल्याणी का भाव भी विचित्र है। वह भी तो अविश्वासिनी की तरह भागी नही, न डरी, न लज्जित ही हुई, वर्न् मृदु भाव से मुस्करा रही है। वही कल्याणी, जिसने पेड़ के नीचे सहज ही विष खा लिया- वह क्या अपराधिनी हो सकती है?.... महेन्द्र के मन मे यही तर्क-वितर्क हो रहा था। इसी समय शांति ने महेन्द्र की यह दुरवस्था देख, कुछ मुस्कराकर कल्याणी की तरफ एक विलोल कटाक्षपात किया। सहसा अंधकार मिट गया- भला ऐसा कटाक्षपात भी कभी पुरुष कर सकते है। समझ गए कि नवीनानंद कोई स्त्री है। फिर भी शक था। उन्होने साहस बटोरा और आगे बढ़कर एक झटके मे नवीनानंद की दाढ़ी खींच ली- दाढ़ी-मूंछ हाथ मे आ गई। इसी समय अवसर पाकर कल्याणी ने बाघम्बर की गांठ खोल दी पकड़ी जाकर शांति शरमा कर सिर नीचा कर खड़ी रह गई। अब महेन्द्र ने शांति से पूछा- ‘‘तुम कौन हो?‘‘ शांति- ‘‘ श्रीमान नवीनानंद गोस्वामी?‘‘ महेन्द्र- ‘‘ वह तो ठगी थी, तुम तो स्त्री हो!‘‘ शांति- ‘‘ यह तो देखते ही हैं आप!‘‘ महेन्द्र- ‘‘ तब एक बात पूछूं- तुम स्त्री होकर जीवानंद के साथ हर समय क्यो रहती थी?‘‘ शांति- ‘‘ यह बात आप को न बताऊंगी।‘‘ महेन्द्र-‘‘तुम स्त्री हो, यह जीवानंद स्वमी जानते है?‘‘ शांति- ‘‘ जानते है।‘‘ यह सुनकर विशुद्धात्मा महेन्द्र बहुत दुखी हुए। यह देखकर अब कल्याणी चुप न रह सकी, बोली- ‘‘ये जीवानंद स्वामी की धर्मपी शांति देवी है?‘‘ एक क्षण के लिए महेन्द्र का चेहरा प्रसन्न हो उठा। इसके बाद ही उनका चेहरा फिर गंभीर हो गया। कल्याणी समझ गई, ‘‘ये पूर्ण ब्रह्मचारिणी है।‘‘ उत्तर बंगाल मुसलमानो के हाथ से निकल गया- यह बात मुसलमान मानते नही, दलील पेश करते है कि बहुतेरे डाकुओ का उपद्रव है- शासन तो हमारा ही हैं। इस तरह कितने वर्ष बीत जाते नही कहा जा सकता। लेकिन भगवान की इच्छा से वारेन हेर्टिंग्स इसी समय कलकत्ते मे गवर्नर- जनरल होकर आए। वारेन हेर्टिंग्स मन ही मन सतोष करने वाले आदमी न थे, अन्यथा भारत मे अंग्रेजी साम्राज्य स्थापित कर न पाते। उन्होने तुरंत संतानो के दमनार्थ मेजर एडवर्ड नाम के एक दूसरे सेनापति को खड़ा कर दिया। मेजर ताजा गोरी फौज लेकर तैयार हो गए। एडवर्ड ने देखा कि यह यूरोपीय युद्ध नही है। शत्रुओ की सेना नही, नगर नही, राजधानी नही, दुर्ग नही, फिर भी सब उनके अधीन है। जिस दिन जहां ब्रिटिश सेना का पड़ाव पड़ा, उस रोज वहां ब्रिटिश अधिकार रहा, दूसरे दिन शिविर टूटते ही फिर ‘वन्देमातरम’ की ध्वनि गूंजने लगी। साहब सर पटककर रह गये, पर यह पता न लगा कि एक क्षण मे कहां से टिड्डियो की तरह विद्रोही सेना इकट्ठी हो जाती, ब्रिटिश अधिकृत गांवो को फूंक देती है और रक्षको की छोटी टुकड़ियो का सफाया करने के बाद फिर गायब हो जाती है? बड़ी खोज के बाद उन्हे मालूम हुआ कि पदचिन्ह मे सन्तानो ने दुर्ग -निर्माण कर रखा है उसी दुर्ग पर अधिकार करना युक्तिसंगत समझा। वह खुफियो द्वारा यह पता लगाने लगा कि पदचिन्ह मे कितनी सन्तान-सेना रहती है। उसे जो समाचार मिला, उससे उस समय उसने दुर्ग पर आक्रमण करना उचित समझा। मन-ही-मन उसने एक अपूर्व कौशल की रचना की।
माघी पूर्णिमा सामने उपस्थित थी। उनके शिविर के निकट ही नदी तट पर बहुत बड़ा मेला लगेगा। इस बार मेले की बड़ी तैयारी है। मेले मे सहज ही कोई एक लाख आदमी एकत्र होते हैं। इस बार वैष्णव राजा हुए हैं- शासक हुए हैं, अतः वैष्णवो ने इस बार मेले मे आने का संकल्प कर लिया है। पदचिन्ह के रक्षक भी अवश्य ही मेले मे पहुंचेगे, इसकी कल्पना मेजर ने कर ली। उन्होने निश्चय किया कि पदचिन्ह पर उसी समय आक्रमण कर अधिकार करना चाहिए। यह सोचकर मेजर सने अफवाह उड़ा दी कि वे मेले पर आक्रमण करेगे, उसी दिन वहां तमाम वैष्णव सन्तान इकट्ठे रहेगे, अतः एक बार मे ही उनका समूल विध्वंस होगा- वे वैष्णवो का मेला होने न देगे। यह खबर गांव-गांव मे प्रचारित की गयी। अतः स्वभावतः जो संतान जहां था, वह वही से अस्त्र ग्रहण कर मेले की रक्षा के लिए चल पड़ा। सभी संतानें माघी पूर्णिमा के मेले वाले नदी-तट पर आकर सम्मिलित होने लगे। मेजर साहब ने जो जाल फेका था, वह सही होने लगा। अंगरेजो के सौभाग्य से महेन्द्र ने भी उस जाल मे पांव डाल दिया। महेन्द्र ने पदचिन्ह मे थोड़ी सी सेना छोड़कर शेष सारी सेना के साथ मेले के लिए प्रयाण किया। यह सब होने के पहले ही जीवानंद और शांति पदचिन्ह से बाहर निकल गये थे। उस समय तक युद्ध की कोई बात नही थी, अतः युद्ध की तरफ उनका कोई ध्यान भी न था। माघी पूर्णिमा के दिन पवित्र जल मे प्राण- विसर्जन कर वे लोग अपना प्रायश्चित करेगे, यह पहले से निश्चित हो चुका था। राह मे जाते-जाते उन्होने सुना कि मेले मे समस्त संतानो पर अंगरेजो का आक्रमण होगा तथा भयानक युद्ध होगा। इस पर जीवानंद ने कहा- ‘‘तब चलो, युद्ध मे ही प्राण-विसर्जन करेगे।‘‘ वे लोग जल्दी-जल्दी चले। एक जगह रास्ता टीले के ऊपर से गया था। टीले पर चढ़कर वीर-दम्पति ने देखा कि नीचे थोड़ी दूर पर अंगरेजो का शिविर पड़ा हुआ है। शांति ने कहा- ‘‘मरने की बात इस समय ताक पर रखो, बोली - वन्देमातरम!‘‘ इस पर दोनो ने ही चुपके-चुपके कुछ सलाह की। फिर जीवानंद पास के एक जंगल मे छिप गए। शांति एक दूसरे मे घुसकर अद्भुत काण्ड मे प्रवृत्त हुई। शांति मरने जा रही थी, लेकिन उसने मृत्यु के समय स्त्री-वेश धारण करने का निश्चय किया था। महेन्द्र ने कहा था कि उसका पुरुष वेश ठगैती है, ठगी करते हुए मरना उचित नही। अतः वह साथ मे अपना पिटारा लाई थी। उसमे उसकी पोशाक रहती थी। इस समय नवीनानंद पिटारा खोलकर अपना वेश परिवर्तन करने बैठे। चिकने बालो को पीठ पर फहराए हुए, उस पर खैंर का टीका-फटीका लगाकर नवीन लता-पुष्पो से सर ढंककर शांति खासी-वैष्णवी बन गई। सारंगी उसने हाथ मे ले ली। इस तरह का वह अंगरेज-शिविर पहुंच गई। काली मूंछोवाले सिपाही उसे देखकर पागल हो उठे। चारो तरफ से लोगो ने उसे घेरकर गवाना शुरू किया। कोई ख्याल गवाता, तो कोई टप्पा, कोई गजल। किसी ने दाल दिया, किसी ने चावल, तो किसी ने मिठाई। किसी ने पैसे दिए, तो किसी ने चवन्नी ही दे दी। इसी तरह वैष्णवी अपनी आंखे से शिविर का हाल-चाल देखती घूमने लगी। सिपाहियो ने पूछ-‘‘अब कब आओगी?‘‘ वैष्णवी ने कहा-‘‘कैसे बताऊं, मेरा घर बड़ी दूर है।‘‘ सिपाहियो ने पूछा-‘‘कितनी दूर?‘‘ वैष्णवी ने कहा-‘‘मेरा घर पदचिन्ह मे है।‘‘
एक सिपाही ने सुना था कि मेजर साहब पदचिन्ह की खबर लिया करते है, तुरंत वह वैष्णवी को मेजर साहब के शिविर मे ले गया। मेजर साहब को देखकर वैष्णवी ने मधुर कटाक्ष का बाण छोड़ा। मेजर साहब का तो सर चक्कर खा गया। वैष्णवी तुरंत खंजड़ी बजाकर गाने लगी- ‘ ‘म्लेच्छ निवहनितमे कलयसि करवालम्‘‘ साहब ने पूछा-‘‘ओ बीबी! तोमारा घड़ कहां?‘‘ बीबी बोली-‘‘मै बीबी नही हूं, वैष्णवी हूं। मेरा घर पदचिन्ह मे है।‘‘ साहब -‘‘ह्रेयर इज दैट एडसिन पेडसिन? होआं ऐ ठो घर हाय?‘‘ बैष्णवी बोली-‘‘घर? है।‘‘ साहब-‘‘घर नई-गर-गर-नई-गड़-‘‘ शांति-‘‘साहब! मै समझ गई, गढ़ कहते हो?‘‘ साहब-‘‘येस-येस, गर-गर....हाय?‘‘ शांति-‘‘गढ़ है-भारी किला है।‘‘ साहब-‘‘केहा आडमी?‘‘ शांति-‘‘गढ़ मे कितने लोग रहते है? करीब बीस-पचीस हजार।‘‘ साहब-‘‘नान्सेस- एक ठो केल्ला मे दो-चार हजर होने सकता। अबी हुई पर हाय कि सब चला गया?‘‘ शांति-‘‘वे सब मेले मे चले जाएंगे!‘‘ साहब-‘‘मेला मे टोम कब आया होआं से?‘‘ शांति-‘‘कल आए है साहब!‘‘ साहब-‘‘ओ लोग आज निकेल गिया होगा?‘‘ शांति मन-ही-मन सोच रही थी कि-‘‘तुम्हारे बाप के श्राद्ध के लिए यदि मैने भात न चढ़ाया, तो मेरी रसिकता व्यर्थ है। कितने स्यार तेरा मुंड खाएंगे, मै देखूंगी।‘‘ प्रकट रूप मे बोली-‘‘साहब! ऐसा हो सकता है, ऐसा हो सकता है। आज चला गया हो सकता है। इतनी खबर मै नही जानती। बैष्णवी हूं, मांगकर खाती हूं-गाना गाती हूं, तब आधा पेट भोजन पाती हूं। इतनी खबर मै क्या जानूं? बकते-बकते गला सूख गया- पैसा दो, मै जाऊं। और अच्छी तरह बख्शीश दो, तो परसो खबर दूं।‘‘ साहब ने झन से एक रुपया फेकते हुए कहा-‘‘परसो नही, बीबी!‘‘ शांति बोली-‘‘दुर बेटा, बैष्णवी कहो, बीबी क्या?‘‘ साहब-‘‘परसू नही, आज रात को खबर मिलने चाही।‘‘ शांति-‘‘बंदूक माथे के पास रखकर नाक मे कड़वा तेल छुड़वाकर सोओ। आज ही मै दस कोस रहा तय कर जाऊं और आज ही फिर लौट आऊं- और तुम्हे खबर दूं? घासलेटी कही के!‘‘ साहब-‘‘घासलेटी किसको बोलता?‘‘ शांति-‘‘जो भारी वीर, जेनरल होता है।‘‘ साहब-‘‘ग्रेट जेनरल हाम होने सकता। हाम-क्लाइव का माफिक। लेकिन आज ही हमको खबर मेलना चाही। सौ रूपी बख्शीश देगा।‘‘ शांति-‘‘सौ दो, हजार दो, बीस हजार दो-पर आज रात भर मे मै इतना नही चल सकती।‘‘ साहब-‘‘घोड़े पर?‘‘ शांति-‘‘घोड़ा चढ़ना जानती तो तुम्हारे तंबू मे आकर भीख मांगती?‘‘
साहब-“एक दूसरा आदमी ले जाएगा।” शांति-“गोद मे बैठाकर ले जाएगा? मुझे लज्जा नही है?” साहब-“केया मुस्किल! पान सौ रूपी देगा।” शांति-“कौन जाएगा-तुम खुद जाएगा?” इस पर एडवर्ड ने पास मे खड़े एक युवक अंग्रेज को दिखाकर कहा-“लिंडले, तुम जाओ!” लिंडले ने शांति का रूप-यौवन देखकर कहा-“बड़ी खुशी से!” इसके बाद बड़ा जानदार अरबी घोड़ा सजकर आ गया, लिंडले भी तैयार हो गया। शांति को पकड़कर वह घोड़े पर बैठने चला। शांति ने कहा-“छिः, इतने आदमियो के सामने? क्या मुझे लज्जा नही है? आगे चलो, बाहर चलकर घोड़े पर चढ़ेगे।” लिंडले घोड़े पर चढ़ गया। घोड़ा धीरे-धीरे चला, शांति पीछे-पीछे पैदल चली। इस तरह वे लोग छावनी के बाहर आए। शिविर के बाहर एकांत आने पर शांति लिंडले के पैर पर पांव रखकर एक छलांग मे पीठ पर पहुंच गई। लिंडले ने हंसकर कहा-“तुम तो पक्क घुड़सवार है!” शांति-“हम लोग ऐसे पक्के घुड़सवार है कि तुम्हारे साथ चढ़ने मे लज्जा लगती है। छीः, रकाब के सहारे तुम लोग चढ़ते हो?” मारे शान के लिंडले ने रकाब से पैर निकाल लिया। इसी समय शांति ने पीछे से लिंडले को गला पकड़ कर छक्क दिया। वह तड़ाक से घोड़े पर से गिरा। घोड़ा भी भड़क उठा। फिर क्या था! शांति ने एक एंड लगाई और घोड़ा हवा से बाते करने लगा। शांति चार वर्ष तक सन्तानो के साथ रहकर पक्की घुड़सवार हो गई थी। बिना सीखे क्या जीवानंद का साथ दे सकती थी? लिंडले का पैर टूट गया और वह कराहने लगा। शांति हवा मे उड़ती जाती थी। जिस वन मे जीवानंद छिपे हुए थे, वहां पहुंचकर शांति ने जीवानंद को सारा समाचार सुनाया। जीवानंद ने कहा-“तो मै शीघ्र जाकर महेंद्र को सतर्क करूं। तुम मेले मे जाकर सत्यानंद को खबर दो। तुम घोड़े पर जाओ, ताकि प्रभु शीघ्र समाचार पा सके।” इस तरह दोनो आदमी दो तरफ रवाना हुए। यह कहना व्यर्थ है कि शांति फिर नवीनानंद के रूप मे हो गई। एडवर्ड भी पक्क अंग्रेज जनरल था। छोटी घाटी मे उसके आदमी थे-शीघ्र ही उन्हे खबर मिली कि उस वैष्णवी ने लिंडले को घोड़े से गिराकर स्वयं रास्ता लिया। सुनते ही एडवर्ड ने हुक्म दिया-“टेट उखाड़ो-उस शैतान का पीछा करो!” खटाखट तम्बुओ के खूंटो पर हथौड़े पड़ने लगे। मेघरचित अमरावती की तरह सवार घोड़ो पर और पदातिक पैदल चलने को तैयार हो गए। हिंदू, मुसलमान, मद्रासी, गोरे, बंदूक कंधे पर लिए मच-मच चल पड़े। तापे खच्चरो द्वारा खींची जाकर घर्र-घर्र करती चल पड़ी। इधर महेंद्र संतान-सेना के साथ मेले की तरफ अग्रसर हुए। उसी दिन शाम को महेंद्र ने सोचा अंधेरा हो चला, अब शिविर डलवा देना चाहिए। उसी समय पड़ाव डाल देना ही उचित जान पड़ा। संतानो का शिविर कैसा? पेड़ के तनो से लगकर छाया मे सब चित-पट सो रहे। हरिचरणामृत पान कर डकार ली उन्होने। जो कुछ भूख बाकी थी, स्वप्न मे वैष्णवी के अधर-रस का पान कर उसे पूरा करने लगे। जहां पड़ाव पड़ा था, वहां बहुत सुंदर आम-कानन के पास ही एक बड़ा टीला था। महेंद्र ने सोचा कि इसी टीले पर यदि पड़ाव पड़े तो कितना सुखद हो! मन मे हुआ कि टीले
को देख लेना चाहिए। यह सोचकर महेंद्र घोड़े पर चढ़कर धीरे-धीरे टीले पर चढ़ने लगे। अभी तक टीले पर आधा ही चढ़े थे, कि उनकी संतान-सेना मे एक युवक वैष्णव आ पहुंचा। उसने संतानो से कहा-"चलो, टीले पर चढ़ चले।" उसके समीप जो सैनिक खड़े थे, उन्होने पूछा-"क्यो?" यह सुनकर वह योद्धा एक छोटी चट्टान पर खड़ा हो गया, उसने ललकारकर कहा-"आओ, वीरो ! आज इसी टीले पर चढ़कर चांदनी का आनंद और मधुर वन्य पुष्पो का सौरभ-पान करते हुए शत्रुओ से बदला ले....युद्ध करे।" संतानो ने देखा कि यह योद्धा और कोई नही, हमारे सेनापति जीवानंद है। इस पर सारी सेना-"हरे मुरारे!" कहती हुई गगनभेदी जयोल्लास से हुंकार करती हुई, भालो पर बोझा दे उठ खड़ी हुई और जीवानंद के पीछे-पीछे टीले पर चढ़ने लगी। एक ने सजा हुआ घोड़ा जीवानंद को लाकर दिया। दूर से महेंद्र ने जो यह देखा, तो विस्मित हुए। सोचने लगे- यह क्या? बिना कहे ये सब क्यो चले आ रहे है। यह सोचकर महेंद्र ने तुरंत घोड़े का मुंह फिराया और एंड लगाते ही धूल बादल उड़ाते हुए नीचे आए। संतान-वाहिनी के अग्रवर्ती जीवानंद को देखकर उन्होने पूछा-"यह क्या आनंद?" जीवानंद ने हंसकर उत्तर दिया-"आज बड़ा आनंद है। टीले के उस पार एडवर्ड पहुंच गए है। टीले पर जो पहले पहुंचेगा, उसी की जीत होगी।" इसके बाद जीवानंद ने संतान सेना से कहा-"पहचानते हो? मैं जीवानंद हूं। मैने सहस्र-सहस्र शत्रुओ का वध किया है।" तुमुल निनाद से दिगन्त कांप उठा। सैनिको ने एक स्वर से कहा-"पहचानते है, हम अपने सेनापति को पहचानते है।" जीवानंद-"बोलो, हरे मुरारे!" जंगल का कोना-कोना कांप उठा, प्रतिध्वनित हुआ-"हरे मुरारे" जीवानंद-"वीरो ! टीले के उस पार शत्रु है। आज ही इस स्तूप के ऊपर, विमल चांदनी मे संतानो का महार ण होगा। जल्दी चढ़ो- जो पहले चढ़ेगा, उसी की जीत होगी। बोलो-बन्देमातरम्" फिर प्रतिध्वनि हुई-"वन्देमातरम्-" धीरे-धीरे संतान-सेना पर्वत शिखर पर चढ़ने लगी। किंतु उन लोगो ने सहसा देखा कि महेंद्र बड़ी ही तेजी से उतरे चले आ रहे हैं। उतरते हुए महेंद्र ने महानिदान किया। देखते- देखते पर्वत-शिखर पर नीलाकाश मे अंग्रेजो की तोपे आ लगी। उच्च स्वर में वैष्णवी सेना ने गाया- "तुमी विद्या तुमी भक्ति, तभी मां बाहुते शक्ति, त्वं हि प्राणः शरीरे!"... लेकिन इसी समय अंग्रेजो की तोपे गर्जन कर उठी- आग उगलने लगी, उस महानिनाद मे गीत की आवाज गायब हो गई। बार-बार 'गुड़म-गुड़म' करती हुई अंग्रेजो की तोपे गर्जन पर संतान-सेना का नाश करने लगी। खेत मे जैसे फसल काटी जाती है, उसी तरह संतान-सेना कटने लगी। यह ऊपर की भयानक मार संतान-सेना न सह सकी, तुरंत भाग खड़ी हुई- जिसे जिधर राह मिली, वह उधर ही भागा। इस पर "हुर्र, हुर्र" करती हुई ब्रिटिश वाहिनी संतानो का समूल नाश करने के लिए उतरने लगी। संगीने चढ़कर, पर्वत से गिरनेवाली भयंकर शिला की तरह, शिक्षित गोरी फौज संतानो को खदेड़ती हुई तीव्र वेग से उतरने लगी। जीवानंद ने महेंद्र को सामने देखकर कहा-"बस आज अंतिम दिन है। आओ यही मरे।"
महेन्द्र ने कहा-“मरने से यदि रण-विजय हो, तो कोई हर्ज नही, किंतु व्यर्थ प्राण गंवाने से क्या मतलब? व्यर्थ मृत्यु वीर-धर्म नही है।‘‘ जीवानंद-“मै व्यर्थ ही मरूंगा, लेकिन युद्ध करके मरूंगा।‘‘ कहकर जीवानंद ने पीछे पलटकर कहा-‘‘भाईयो ! भगवान की शपथ लो कि जीवित न लौटेगे।‘‘ जीवानंद ने घोड़े की पीठ पर से ही, बहुत पीछे खड़े महेन्द्र से कहा-‘‘भाई महेन्द्र ! नवीनंद से मुलाकात हो तो कह देना कि परलोक मे मुलाकात होगी।‘‘ यह कहकर वह वीरश्रेष्ठ बाएं हाथ मे बलम आगे किए हुए और दाहिने हाथ से बंदूक चलाते, मुंह से 'हरे मुरारे ! हरे मुरारे !!' कहते हुए तीर की तरह उस बरसती हुई आग को चीरते हुए टीले पर बड़े वेग से आगे बढ़ने लगे। इस तरह महान् साहस का परिचय देते हुए और शत्रुक्षय करते हुए जीवानंद अकेले अभिमन्यु की तरह शत्रु-व्यूह मे घुसते चले जा रहे थे, मानो एक मस्त हाथी कमल-वन को रौंदता चला जाता हो। भागती हुई संतान-सेना को दिखाकर महेन्द्र ने कहा-‘‘देखो, कायरो ! भागनेवालो- अपने सेनापति का साहस देखो ! देखने से जीवानंद मर नहीं सकते।‘‘ संतानो ने पलटकर जीवानंद का अद्भुत साहस प्रत्यक्ष देखा। पहले उन सबने देखा, फिर बोले-‘‘स्वामी जीवानंद मरना जानते है, तो क्या हम नही जानते ? चलो जीवानंद के साथ बैकुंठ चले !‘‘ बस, यही से रण ने पलटा खाया। संतान-सेना पलट पड़ी। पीछे भागनेवालो ने देखा कि पलट रहे है, तो उन्होने समझा कि संतानो की विजय हुई है। अतः वे भी तुरत चल पड़े। महेन्द्र ने देखा कि जीवानंद शत्रुओ की सेना मे घुस गए हैं, अब दिखाई नही पड़ते। उन्मत्त संतान-सेना ने टीले से उतरी हुई अंग्रेज-वाहिनी पर प्रचंड आक्रमण किया- अंग्रेजो के पैर उखड़ गए। वे लोग इस आक्रमण को सह न सके, उनकी संगीने पलटकर भागने की तरफ दिखाई दी। पीछे चढ़ती हुई संतान-सेना उनका विनाश करती जा रही थी। भागी हुई संतान-सेना अभी तक बराबर पलटती हुई रण भूमि मे चढ़ती जाती थी। महेन्द्र खड़े यह देख रहे थे। सहसा पर्वत-शिखर पर संतानो की पताका उड़ती दिखाई दी। वहां सत्यानंद महाप्रभु, स्वयं चक्रपाणि विष्णु की तरह बाएं हाथ में ध्वजा लिए हुए और दाहिने मे रक्त से लाल तलवार लिए खड़े थे। वह देखते ही संतानो मे अपूर्व बल आ गया-‘‘हरे मुरारे !‘‘ का गगन मे वह जयनाद हुआ कि वस्तुतः वसुंधरा कांपती हुई नजर आई। इस समय अंग्रेजी सेना दोनो दलो के बीच मे थी- ऊपर प्रभु सत्यानंद ने तोपो पर अधिकार कर लिया था, नीचे से संतान-सेना पलटकर चढ़ती हुई मार रही थी। महेन्द्र ने देखा कि ऊपर से ‘‘वन्देमातरम्‘‘ का निनाद करते हुए सत्यानंद, अवशिष्ट ब्रिटिश वाहिनी के नाश के लिए उतरे। इधर से बची हुई सेना लेकर महेन्द्र ने संतानो को साहस दिलाते हुए भयंकर आक्रमण कर दिया। मध्य टीले पर भयंकर युद्ध हुआ। अंग्रेज चक्की के दो पाटो मे फंसे चने की तरह पिसने लगे। थोड़ी ही देर मे एक भी ब्रिटिश सैनिक खड़ा न दिखाई दिया। धरती लाल हो गई- रक्त की नदी बह गई। वहां ऐसा भी कोई न बचा, जो वारेन हेस्टिंग्स के पास खबर ले जाता। पूर्णिमा की रात है। यह भीषण रणक्षेत्र इस समय स्थिर हैं। वह घोड़ो की टाप की आवाज, बंदूको की गरज और गोलो की वर्षा गायब हो गई हैं। न कोई हुर्रे करता है न कोई हरे मुरारे। आवाज आती हैं, तो केवल कुत्तो और स्यारो की। रह-रहकर घायलो का क्रंदन सुनाई पड़ता है। किसी का पैर कटा है, किसी का हाथ कटा है, किसी का पंजर घायल हुआ है। कोई राम को पुकारता है, कोई गॉड। कोई पानी मांगता है, कोई मृत्यु का
आह्वान करता है। उस चांदनी रात मे श्याम भूमि लाल वसन पहनकर भयानक हो गई थी। किसकी हिम्मत थी कि वहां जाता? साहस तो किसी का नही है लेकिन उस निस्तब्ध भयंकर रात मे भी एक रमणी उस अगम्य रणक्षेत्र मे विचरण कर रही है। वह एक मशाल लिए रणक्षेत्र मे किसी को खोज रही है- हरेक शव का मुंह रोशनी मे देखकर दूसरे के पास चली जाती है। कही कोई मृत देह अश्व के नीचे पड़ी है, तो वही मुश्किल से मशाल रख, दोनो हाथो से अश्व को हटाकर शव देखती और हताश हो आगे बढ़ जाती है। वह जिसे खोज रही थी, उसे न पाया। अब वह मशाल छोड़, रक्तमय जमीन पर पछाड़ खा गिरकर रोने लगी। पाठको ! यह शांति है वीर जीवानंद के शव को खोज रही है। शांति जिस समय जमीन पर गिरकर रो रही थी, उसी समय उसे एक मधुर करुण शब्द सुनाई पड़ा-‘‘उठो, बेटी!, रोओ नही !‘‘ शांति ने देखा, चांदनी रात मे सामने एक जटाजूटधारी विराट महापुरुष खड़े है। शांति उठकर खड़ी हो गई ! जो आए थे, उन्होने कहा-‘‘रोओ नही, बेटी ! जीवानंद शांति ने पहचाना-वह जीवानंद की देह थी। सर्वांग क्षत-विक्षत, रुधिर से सने हुए थे। शांति यह कहकर वे महापुरूष शांति को रणक्षेत्र के मध्य मे ले गए। वही शवो का एक स्तूप लगा हुआ था। शांति उसे हटा न सकी थी। उस महापुरुष ने स्वयं शवो को हटाकर एक शव बाहर निकाला। शांति ने पहचाना- वह जीवानंद की देह थी। सर्वांग क्षत-विक्षत रुधिर से सने हुए थे। शांति सामान्य स्त्री की तरह जोरो से रो पड़ी !‘‘ महापुरुष ने फिर कहा-‘‘रोओ नही बेटी! क्या जीवानंद मर गए है ? शांत होकर उनका शरीर देखो, नाड़ी की परीक्षा करो !‘‘ शांति ने शव की नाड़ी देखी, नाड़ी का पता न था। वे बोले-‘‘छाती पर हाथ रखकर देखो !‘‘ शांति ने छाती पर हाथ रखकर देखा, गतिहीन ठंडा था ! फिर महापुरुष ने कहा-‘‘नाक पर हाथ रखकर देखो, कुछ भी श्वास नही है?‘‘ शांति ने देखा, किंतु हताश हो गई। महापुरुष ने फिर कहा-‘‘मुंह मे उंगली डालकर देखो, कुछ गरमी मालूम पड़ती है?‘‘ आशामुग्धा शांति ने वह भी किया, बोली-‘‘मुझे कुछ पता नही लगता है !‘‘ महापुरुष ने बायां हाथ शव पर रखकर कहा-‘‘बेटी, तुम घबरा गई हो। देखो अभी देह मे हलकी गरमी है !‘‘ अब शांति ने फिर नाड़ी देखी- देखा कि मन्द, अतिमन्द गति है। विस्मित होकर उसने छाती पर हाथ रखा- मृदुधड़कन है। नाक पर हाथ रखकर देखा- हल्की सांस है। शांति ने विस्मित होकर पूछा-‘‘क्या प्राण था? या फिर से आ गया है?‘‘ उन्होने कहा-‘‘भला ऐसा कभी हुआ है, बेटी! तुम इन्हे उठाकर तालाब के किनारे तक ले चल सकोगी? मैं चिकित्सक हूं, इनकी चिकित्सा करूंगा !‘‘ शांति जीवानंद को तालाब पर ले जाकर घाव धोने लगी। इसी समय उन महापुरुष ने लता आदि का प्रलेप लाकर घावो पर लगा दिया। इसके बाद वे जीवानंद का शरीर सहलाने लगे। अब जीवानंद के श्वास-प्रश्वास तेज हो गए। कुछ ही क्षण मे उठ बैठे। शांति के मुंह की तरफ देखकर उन्होने पूछा-‘‘युद्ध मे किसकी विजय हुई?‘‘ शांति ने कहा-‘‘तुम्हारी विजय ! इन महात्मा को प्रणाम करो?‘‘ अब दोनो ने देखा कि वहां कोई नही है, किसे प्रणाम करे ! समीप ही संतान-सेना का विजयोल्लास सुनाई पड़ रहा था। लेकिन शांति या जीवानंद मे से कोई भी न उठा।
दोनो विमल ज्योस्तना मे पुष्करिणी-तट पर बैठे रहे। जीवानंद का शरीर अद्भुत औषध बल से जल्द ही ठीक हो गया। जीवानंद ने कहा-“शांति! चिकित्सक की दवा मे गुण है। अब मेरे शरीर मे जरा भी ग्लानि या कष्ट नही है। बोलो, अब कहां चले संतान सेना का जयोल्लास सुनाई पड़ रहा है!‘’ शांति बोली-“अब वहां नही। माता का कार्योद्धार हो गया है। अब यह देश संतानो का है। अब वहां क्या करने चले?‘’ जीवानंद-“जो राज्य छीना है उसकी बाहुबल से रक्षा तो करनी होगी।‘’ शांति-‘’रक्षा के लिए महेंद्र है। तुमने प्रायश्चित कर संतान-धर्म के लिए प्राण-त्याग दिया था। अब पुनः प्राप्त इस जीवन पर संतानो का अधिकार नही है। हमलोग संतानों के लिए मर चुके है। अब हमे देखकर संतान लोग कह सकते है कि प्रायश्चित के भय से ये लोग छिप गए थे, अब विजय होने पर प्रकट हो गए है- राज्य-भाग लेने आए है।‘’ जीवानंद-“यह क्या शांति? लोगो के अपवाद-भय से अपना कर्त्तव्य छोड़ दे। मेरा कार्य मातृसेवा है। दूसरा चाहे जो कहे, मै मातृ-सेवा करूंगा।‘’ शांति-“अब तुम्हे इसका अधिकार नही है, क्यो कि तुमने मातृ-सेवा के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। अब-यदि सेवा करोगे, तो तुमने उत्सर्ग क्या किया? मातृ-सेवा से वंचित होना ही प्रधान प्रायश्चित है। अन्यथा जीवन त्याग देना क्या कोई बड़ा काम है?‘’ जीवानंद-“शांति! तुमने ठीक समझा। लेकिन मै अपने प्रायश्चित को अधूरा न रखूंगा। मेरा सुख संतान-धर्म मे है, लेकिन कहां जाऊंगा? मातृ-सेवा त्यागकर घर जाने में क्या सुख मिलेगा?‘’ शांति-“यह तो मै कहती नही हूं। हम लोग अब गृहस्थ नही है, हम दोनो ही संन्यासी रहेगे- फिर ब्रह्मचर्य का पालन करेगे। चलो हम लोग देश-पर्यटन कर देव-दर्शन करे।‘’ जीवानंद-“इसके बाद?‘’ शांति-“इसके बाद हिमालय पर कुटी का निर्माण कर हम दोनो ही देवाराधना करेगे- जिससे माता का मंगल हो, यही वर मांगेगे।‘’ इसके बाद दोनों ही उठकर हाथ मे हाथ दे, ज्योत्स्नामयी रात्रि मे अन्तर्हित हो गए। हाय मां ! क्या फिर जीवानंद सदृश पुत्र और शांति जैसी कन्या तुम्हारे गर्भ मे आएंगे? स्वामी सत्यानंद रणक्षेत्र मे किसी से कुछ न कहकर आनंदमठ मे लौट आए। वहां वे गंभीर रात्रि मे विष्णु-मंडप मे बैठकर ध्यानमग्न हुए। इसी समय उन चिकित्सक ने वहां आकर दर्शन दिया। देखकर सत्यानंद ने उठकर प्रणाम किया। चिकित्सक बोले-“सत्यानंद! आज माघी पूर्णिमा है।‘’ सत्यादंन-“चलिए मै तैयार हूं। किंतु महात्मन् ! मेरे एक संदेह को दूर कीजिए। मैने क्या इसीलिए युद्ध- जय कर संतान-धर्म की पताका फहरायी थी?‘’ जो आए थे, उन्होने कहा-“तुम्हारा कार्य सिद्ध हो गया, मुस्लिम राज्य ध्वंस हो चुका। अब तुम्हारी यहां कोई जरूरत नही, अनर्थक प्राणहत्या की आवश्यकता नही!‘’ सत्यानंद-“मुस्लिम राज्य ध्वंस अवश्य हुआ है, किंतु अभी हिंदु राज्य स्थापित हुआ नही है। अभी भी कलकत्ते मे अंग्रेज प्रबल है।‘’ वे बोले-“अभी हिंदु-राज्य स्थापित न होगा। तुम्हारे रहने से अनर्थक प्राणी-हत्या होगी, अतएव चलो !‘’ यह सुनकर सत्यानंद तीव्र मर्म-पीड़ा से कातर हुए, बोले-“प्रभो ! यदि हिंदू-राज्य स्थापित न होगा, तो कौन
राज्य होगा? क्या फिर मुस्लिम-राज्य होगा?‘‘ उन्होने कहा-‘‘नही, अब अंगरेज-राज्य होगा‘‘ सत्यानंद की दोनो आंखो से जलधारा बहने लगी। उन्होने सामने जननी-जन्मभूमि की प्रतिमा की तरफ देख हाथ जोड़कर कहा-‘‘हाय माता! तुम्हारा उद्धार न कर सका। तू फिर म्लेच्छो के हाथ मे पड़ेगी। संतानो के अपराध को क्षमा कर दो मां! रणक्षेत्र मे मेरी मृत्यु क्यो न हो गई?‘‘ महात्मा ने कहा-‘‘सत्यानंद कातर न हो। तुमने बुद्धि विभ्रम से दस्युवृत्ति द्वारा धन संचय कर रण मे विजय ली है। पाप का कभी पवित्र फल नही होता। अतएव तुम लोग देश-उद्धार नही कर सकोगे। और अब जो कुछ होगा, अच्छा होगा। अंगरेजो के बिना राजा हुए सनातन धर्म का उद्धार नही हो सकेगा। महापुरुषो ने जिस प्रकार समझाया है, मैं उसी प्रकार समझाता हूं- ध्यान देकर सुनो! तैंतिस कोटि देवताओ का पूजन सनातन-धर्म नही है। वह एक तरह का लौकिक निकृष्ट-धर्म, म्लेच्छ जिसे हिंदू-धर्म कहते है- लुस हो गया। प्रकृति हिंदू-धर्म ज्ञानात्मक- कार्यात्मक नही। जो अन्तर्विषयक ज्ञान है- वही सनातन-धर्म का प्रधान अंग है। लेकिन बिना पहले बहिर्विषयक ज्ञान हुए, अन्तर्विषयक ज्ञान असंभव है। स्थूल देखे बिना सूक्ष्म की पहचान ही नही हो सकती। बहुत दिनो से इस देश मे बहिर्विषयक ज्ञान लुस हो चुका है- इसीलिए वास्तविक सनातन-धर्म का भी लोप हो गया है। सनातन-धर्म के उद्धार के लिए पहले बहिर्विषयक ज्ञान-प्रचार की आवश्यकता है। इस देश मे इस समय वह बहिर्विषयक ज्ञान नही है- सिखानेवाला भी कोई नही, अतएव बाहरी देशो से बहिर्विषयक ज्ञान भारत मे फिर लाना पड़ेगा। अंगरेज उस ज्ञान के प्रकाण्ड पंडित है- लोक-शिक्षा मे बड़े पटु है। अतः अंगरेजो के ही राजा होने से, अंगरेजी की शिक्षा से स्वतः वह ज्ञान उत्पन्न होगा! जब तक उस ज्ञान से हिंदु ज्ञानवान, गुणवान और बलवान न होगे, अंगरेज राज्य रहेगा। उस राज्य मे प्रजा सुखी होगी, निष्कंटक धर्माचरण होगे। अंगरेजो से बिना युद्ध किए ही, निरस्त्र होकर मेरे साथ चलो!‘‘ सत्यानंद ने कहा-‘‘महात्मन्! यदि ऐसा ही था- अंगरेजो को ही राजा बनाना था, तो हम लोगो को इस कार्य मे प्रवृत्त करने की क्या आवश्यकता थी?‘‘ महापुरुष ने कहा-‘‘अंगरेज उस समय बनिया थे- अर्थ संग्रह मे ही उनका ध्यान था। अब संतानो के कारण ही वे राज्य-शासन हाथ मे लेगे, क्योकि बिना राजत्व किए अर्थ-संग्रह नही हो सकता। अंगरेज राजदण्ड ले, इसलिए संतानो का विद्रोह हुआ है। अब आओ, स्वयं ज्ञानलाभ कर दिव्य चक्षुओ से सब देखो, समझो!‘‘ सत्यानंद-‘‘हे महात्मा! मैं ज्ञान लाभ की आकांक्षा नही रखता-ज्ञान की मुझे आवश्यकता नही। मैने जो व्रत लिया है, उसी का पालन करूंगा। आशीर्वाद कीजिए कि मेरी मातृभक्ति अचल हो!‘‘ महापुरुष-‘‘व्रत सफल हो गया- तुमने माता का मंगल-साधन किया- अंगरेज राज्य तुम्ही लोगो द्वारा स्थापित समझो! युद्ध-विग्रह का त्याग करो- कृषि में नियुक्त हो, जिससे पृथ्वी श्स्यशालिनी हो, लोगो की श्रीवृद्धि हो!‘‘ सत्यानंद की आंखो से आंसू निकलने लगे, बोले-‘‘माता को शत्रु-रक्त से शस्यशालिनी करूं?‘‘ महापुरुष-‘‘शत्रु कौन है? शत्रु अब कोई नही। अंगरेज हमारे मित्र है। फिर अंगरेजो से युद्ध कर अंत मे विजयी हो- ऐसी अभी किसी की शक्ति नही?‘‘ सत्यानंद-‘‘न रहे, यही माता के सामने मैं अपना बलिदान चढ़ा दूंगा!‘‘ महापुरुष -‘‘अज्ञानवश! चलो, पहले ज्ञान-लाभ करो। हिमालय-शिखर पर मातृ-मंदिर है, वही तुम्हे माता की मूर्ति प्रत्यक्ष होगी!‘‘ यह कहकर महापुरुष ने सत्यानंद का हाथ पकड़ लिया। कैसी अपूर्व शोभा थी! उस गंभीर निस्तब्ध रात्रि मे
विराट चतुर्भुज विष्णु-प्रतिमा के सामने दोनो महापुरुष हाथ पकड़े खड़े थे। किसको किसने पकड़ा है? ज्ञान ने भक्ति का हाथ पकड़ा है, धर्म के हाथ मे कर्म का हाथ है, विसर्जन ने प्रतिष्ठा का हाथ पकड़ा है। सत्यानंद ही शांति है- महापुरुष ही कल्याण है- सत्यानंद प्रतिष्ठा है- महापुरुष विसर्जन है। विसर्जन ने आकर प्रतिष्ठा को साथ ले लिया। ॥ इति ॥