आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहेन्द्र ने कहा-“मरने से यदि रण-विजय हो, तो कोई हर्ज नही, किंतु व्यर्थ प्राण गंवाने से क्या मतलब? व्यर्थ मृत्यु वीर-धर्म नही है।‘‘ जीवानंद-“मै व्यर्थ ही मरूंगा, लेकिन युद्ध करके मरूंगा।‘‘ कहकर जीवानंद ने पीछे पलटकर कहा-‘‘भाईयो ! भगवान की शपथ लो कि जीवित न लौटेगे।‘‘ जीवानंद ने घोड़े की पीठ पर से ही, बहुत पीछे खड़े महेन्द्र से कहा-‘‘भाई महेन्द्र ! नवीनंद से मुलाकात हो तो कह देना कि परलोक मे मुलाकात होगी।‘‘ यह कहकर वह वीरश्रेष्ठ बाएं हाथ मे बलम आगे किए हुए और दाहिने हाथ से बंदूक चलाते, मुंह से 'हरे मुरारे ! हरे मुरारे !!' कहते हुए तीर की तरह उस बरसती हुई आग को चीरते हुए टीले पर बड़े वेग से आगे बढ़ने लगे। इस तरह महान् साहस का परिचय देते हुए और शत्रुक्षय करते हुए जीवानंद अकेले अभिमन्यु की तरह शत्रु-व्यूह मे घुसते चले जा रहे थे, मानो एक मस्त हाथी कमल-वन को रौंदता चला जाता हो। भागती हुई संतान-सेना को दिखाकर महेन्द्र ने कहा-‘‘देखो, कायरो ! भागनेवालो- अपने सेनापति का साहस देखो ! देखने से जीवानंद मर नहीं सकते।‘‘ संतानो ने पलटकर जीवानंद का अद्भुत साहस प्रत्यक्ष देखा। पहले उन सबने देखा, फिर बोले-‘‘स्वामी जीवानंद मरना जानते है, तो क्या हम नही जानते ? चलो जीवानंद के साथ बैकुंठ चले !‘‘ बस, यही से रण ने पलटा खाया। संतान-सेना पलट पड़ी। पीछे भागनेवालो ने देखा कि पलट रहे है, तो उन्होने समझा कि संतानो की विजय हुई है। अतः वे भी तुरत चल पड़े। महेन्द्र ने देखा कि जीवानंद शत्रुओ की सेना मे घुस गए हैं, अब दिखाई नही पड़ते। उन्मत्त संतान-सेना ने टीले से उतरी हुई अंग्रेज-वाहिनी पर प्रचंड आक्रमण किया- अंग्रेजो के पैर उखड़ गए। वे लोग इस आक्रमण को सह न सके, उनकी संगीने पलटकर भागने की तरफ दिखाई दी। पीछे चढ़ती हुई संतान-सेना उनका विनाश करती जा रही थी। भागी हुई संतान-सेना अभी तक बराबर पलटती हुई रण भूमि मे चढ़ती जाती थी। महेन्द्र खड़े यह देख रहे थे। सहसा पर्वत-शिखर पर संतानो की पताका उड़ती दिखाई दी। वहां सत्यानंद महाप्रभु, स्वयं चक्रपाणि विष्णु की तरह बाएं हाथ में ध्वजा लिए हुए और दाहिने मे रक्त से लाल तलवार लिए खड़े थे। वह देखते ही संतानो मे अपूर्व बल आ गया-‘‘हरे मुरारे !‘‘ का गगन मे वह जयनाद हुआ कि वस्तुतः वसुंधरा कांपती हुई नजर आई। इस समय अंग्रेजी सेना दोनो दलो के बीच मे थी- ऊपर प्रभु सत्यानंद ने तोपो पर अधिकार कर लिया था, नीचे से संतान-सेना पलटकर चढ़ती हुई मार रही थी। महेन्द्र ने देखा कि ऊपर से ‘‘वन्देमातरम्‘‘ का निनाद करते हुए सत्यानंद, अवशिष्ट ब्रिटिश वाहिनी के नाश के लिए उतरे। इधर से बची हुई सेना लेकर महेन्द्र ने संतानो को साहस दिलाते हुए भयंकर आक्रमण कर दिया। मध्य टीले पर भयंकर युद्ध हुआ। अंग्रेज चक्की के दो पाटो मे फंसे चने की तरह पिसने लगे। थोड़ी ही देर मे एक भी ब्रिटिश सैनिक खड़ा न दिखाई दिया। धरती लाल हो गई- रक्त की नदी बह गई। वहां ऐसा भी कोई न बचा, जो वारेन हेस्टिंग्स के पास खबर ले जाता। पूर्णिमा की रात है। यह भीषण रणक्षेत्र इस समय स्थिर हैं। वह घोड़ो की टाप की आवाज, बंदूको की गरज और गोलो की वर्षा गायब हो गई हैं। न कोई हुर्रे करता है न कोई हरे मुरारे। आवाज आती हैं, तो केवल कुत्तो और स्यारो की। रह-रहकर घायलो का क्रंदन सुनाई पड़ता है। किसी का पैर कटा है, किसी का हाथ कटा है, किसी का पंजर घायल हुआ है। कोई राम को पुकारता है, कोई गॉड। कोई पानी मांगता है, कोई मृत्यु का